रिट कोर्ट जीएसटी शुद्धिपत्र की प्रकृति पर तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकती: दिल्ली हाईकोर्ट ने वैकल्पिक कानूनी उपचार के अभाव में याचिका खारिज की

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि एक रिट कोर्ट, ‘सर्टिओरारी’ (Certiorari) क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए, जीएसटी शुद्धिपत्र (Corrigendum) की वैधता निर्धारित करने के लिए तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकती, विशेषकर तब जब कानून में एक प्रभावी वैकल्पिक उपचार उपलब्ध हो। जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे और जस्टिस अजय दिगपॉल की पीठ ने कहा कि सीजीएसटी अधिनियम की धारा 161 के तहत सुधार की सीमा के संबंध में निर्णय लेने वाले अधिकारी के निष्कर्षों से केवल असहमति होना, अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण क्षेत्राधिकार का उपयोग करने का आधार नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, मनपार आइकन टेक्नोलॉजीज (Manpar Icon Technologies), ने 29 दिसंबर, 2025 के ‘ऑर्डर-इन-ओरिजिनल’ को चुनौती दी थी, जिसके माध्यम से ₹42,66,108/- की मांग की पुष्टि की गई थी। विवाद तब शुरू हुआ जब कर अधिकारियों ने 28 जून, 2025 को एक कारण बताओ नोटिस (SCN) जारी किया। इसमें एक गैर-मौजूद फर्म, ‘मैसर्स एडवांटा सेल्स’ (M/S Advanta Sales) से इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के गलत उपयोग का आरोप लगाया गया था, जो केवल वित्तीय वर्ष 2018-2019 से संबंधित था।

जब याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि उन्होंने वित्तीय वर्ष 2018-2019 में नहीं, बल्कि 2019-2020 में आपूर्ति प्राप्त की थी, तो विभाग ने 22 दिसंबर, 2025 को एक शुद्धिपत्र (Corrigendum) जारी कर दिया। इस शुद्धिपत्र के जरिए जांच के दायरे में वित्तीय वर्ष 2018-2019 के साथ-साथ 2019-2020 को भी शामिल कर लिया गया। याचिकाकर्ता ने इसे अवैध बताते हुए तर्क दिया कि यह समय-सीमा समाप्त होने के बाद कार्यवाही शुरू करने का एक प्रयास था।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता की दलीलें: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि शुद्धिपत्र कानून की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण था क्योंकि:

  • इसने वित्तीय वर्ष 2019-2020 को शामिल करके एक नई देनदारी पैदा करने की कोशिश की, जो धारा 161 के सीमित दायरे (लिपिकीय या गणितीय त्रुटियों तक सीमित) से बाहर है।
  • यह वित्तीय वर्ष 2019-2020 के लिए वैधानिक समय-सीमा (जो 30 सितंबर, 2025 को समाप्त हो गई थी) से बचने का एक दुर्भावनापूर्ण प्रयास था।
  • समय-सीमा समाप्त होने के बाद अधिकारी ‘फंकटस ऑफिशियो’ (Functus Officio) हो गए थे और वे कार्यवाही को पुनर्जीवित नहीं कर सकते थे।
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उत्तरदाता की दलीलें: विभाग की ओर से तर्क दिया गया कि धारा 107 के तहत अपील का विकल्प होने के कारण रिट याचिका विचारणीय नहीं है। योग्यता के आधार पर कहा गया कि:

  • शुद्धिपत्र ने कोई नया लेनदेन पेश नहीं किया, बल्कि केवल ‘कर अवधि’ को सही किया ताकि जांच के तहत वास्तविक लेनदेन को दर्शाया जा सके।
  • वित्तीय वर्ष के संबंध में टाइपोग्राफिकल त्रुटियों को सुधारना नया कारण बताओ नोटिस जारी करने के समान नहीं है।
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हाईकोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने अनुच्छेद 226 के तहत अपने पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार की सीमाओं पर ध्यान केंद्रित किया। कोर्ट ने कहा कि हालांकि उसके पास पूर्ण अधिकार हैं, लेकिन जब वैधानिक उपचार मौजूद हो, तो उसे तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि कानून की स्पष्ट त्रुटि या क्षेत्राधिकार का उल्लंघन न हो।

चुनौती की प्रकृति पर कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

“सर्टिओरारी की रिट का प्रयोग करते हुए यह कोर्ट एक पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार में है, न कि एक अपीलीय अदालत के रूप में। यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कोर्ट उन तथ्यों के पुनर्मूल्यांकन में प्रवेश नहीं कर सकता, जिनका निर्णय ट्रायल कोर्ट या ट्रिब्यूनल द्वारा किया गया है।”

धारा 160 और 161 के तहत शुद्धिपत्र की वैधता पर कोर्ट ने कहा:

“याचिकाकर्ता का यह तर्क कि शुद्धिपत्र कानूनन गलत है, सुधार की प्रकृति और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के परीक्षण की मांग करता है। इस तरह के अभ्यास में तथ्यों की सराहना शामिल होगी और इसे अनुच्छेद 226 के तहत कार्यवाही में नहीं किया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने आगे कहा कि निर्णायक प्राधिकारी ने पहले ही इन पहलुओं पर आदेश में विचार किया है, और उन निष्कर्षों से असहमति को उचित अपीलीय माध्यम से संबोधित किया जाना चाहिए।

फैसला

पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि सीजीएसटी अधिनियम की धारा 107, नियम 109A के साथ मिलकर, ऐसी शिकायतों के लिए “सामान्य वैधानिक मार्ग” प्रदान करती है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया:

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“ऐसी परिस्थितियों में, निर्णायक प्राधिकारी द्वारा निकाले गए निष्कर्षों के साथ केवल असहमति होना, अपने आप में वैधानिक उपचार को दरकिनार करने और इस कोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग करने का आधार नहीं होगा।”

इसके साथ ही, रिट याचिका खारिज कर दी गई और याचिकाकर्ता को अपीलीय प्राधिकारी के पास जाने की स्वतंत्रता दी गई। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष (Merits) पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।

केस विवरण

केस शीर्षक: मनपार आइकन टेक्नोलॉजीज थ्रू इट्स पार्टनर, श्री पराग गर्ग बनाम असिस्टेंट कमिश्नर, सीजीएसटी डिवीजन कीर्ति नगर एवं अन्य 

केस संख्या: डब्ल्यूपी(सी) 1993/2026 एवं सीएम एपली. 9688/2026

पीठ: जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे और जस्टिस अजय दिगपॉल

दिनांक: 13 अप्रैल, 2026

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