पति की सहमति के बिना भी हिंदू विधवा को गोद लेने का पूरा अधिकार, 42 साल पुराना संपत्ति विवाद सुलझा:बॉम्बे हाई कोर्ट

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम (HAMA), 1956 के तहत एक हिंदू विधवा को बच्चा गोद लेने का पूर्ण और स्वतंत्र अधिकार है। कोर्ट ने साफ किया कि इसके लिए उन्हें अपने दिवंगत पति की किसी भी तरह की पूर्व अनुमति या सहमति की कोई आवश्यकता नहीं है। इस दूरगामी फैसले के साथ ही अदालत ने पिछले 42 वर्षों से चले आ रहे एक बेहद जटिल कानूनी और पारिवारिक संपत्ति विवाद का भी पटाक्षेप कर दिया है।

यह अहम फैसला जस्टिस रोहित डब्ल्यू. जोशी (Justice Rohit W Joshi) की एकल पीठ ने 22 मई को सुनाया। कोर्ट ने टिप्पणी की, “गोद लेने का सीधा कानूनी परिणाम यह होता है कि दत्तक बच्चा गोद लेने वाली मां (विधवा) के साथ-साथ उसके दिवंगत पति का भी बच्चा बन जाता है। वह बच्चा कानूनन गोद लेने की तारीख से ही अपने दिवंगत पिता का भी दत्तक पुत्र मान लिया जाता है। दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया केवल विधवा के लिए या केवल उसके दिवंगत पति के लिए नहीं, बल्कि दोनों के संयुक्त हित के लिए होती है।”

क्या है 42 साल पुराने इस कानूनी विवाद की कहानी?

इस पारिवारिक और कानूनी लड़ाई की शुरुआत साल 1984 में हुई थी। यह मामला एक ऐसे व्यक्ति की पैतृक संपत्तियों से जुड़ा था, जिनकी मृत्यु 1935 में बिना किसी संतान के हो गई थी। उनकी मृत्यु के दशकों बाद, साल 1971 में उनकी विधवा ने एक पंजीकृत विलेख (Registered Deed) के माध्यम से एक लड़के को गोद ले लिया।

इस गोद लेने की प्रक्रिया को मृतक की बहन के बच्चों (याचिकाकर्ताओं) ने अदालत में चुनौती दी। वे पैतृक संपत्ति पर अपना पूर्ण मालिकाना हक पाना चाहते थे। उनका तर्क था कि चूंकि यह परिवार हिंदू कानून के पारंपरिक ‘बनारस स्कूल’ (Banaras School of Hindu Law) के नियमों से बंधा है, इसलिए दिवंगत पति की स्पष्ट और लिखित अनुमति के बिना विधवा का बच्चा गोद लेना पूरी तरह से अवैध है।

दूसरी ओर, गोद लिए गए बेटे (प्रतिवादी) ने तर्क दिया कि गोद लेने की यह प्रक्रिया पूरी तरह से वैध थी और इसमें सभी धार्मिक अनुष्ठानों का पालन किया गया था। उनका सबसे मजबूत पक्ष यह था कि चूंकि यह दत्तक ग्रहण वर्ष 1971 में, यानी हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम (HAMA), 1956 के लागू होने के बाद हुआ था, इसलिए पुरानी रूढ़ियां और पारंपरिक नियम इस पर लागू नहीं होते।

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पुरानी प्रथाओं पर क्यों भारी पड़ा 1956 का आधुनिक कानून?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि देश के आधुनिक कानून ने सदियों पुरानी रूढ़िवादी प्रथाओं को पीछे छोड़ दिया है:

  • HAMA की धारा 4 का प्रभाव: कोर्ट ने रेखांकित किया कि अधिनियम की धारा 4 स्पष्ट रूप से पुराने किसी भी पाठ, नियम, व्याख्या या प्रथा को निष्प्रभावी घोषित करती है (अधिनियम के अंतिम प्रावधानों SA 234.15 और 143.15 का विशेष संदर्भ देते हुए)।
  • धारा 8 की शक्ति: यह धारा किसी भी अविवाहित या विधवा हिंदू महिला को बच्चा गोद लेने का पूर्ण कानूनी अधिकार देती है। इस धारा में पति की पूर्व मंजूरी जैसी किसी भी शर्त का उल्लेख नहीं है।
  • धारा 5 का नियम: इसके तहत वर्ष 1956 के बाद होने वाले सभी दत्तक ग्रहण केवल और केवल इसी अधिनियम (HAMA) के प्रावधानों के अनुरूप ही मान्य होंगे।
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इसके अलावा, अदालत ने कानून की धारा 12 का भी हवाला दिया, जिसके अनुसार गोद लिया गया बच्चा अपने जन्म के परिवार से पूरी तरह से अलग होकर अपने नए दत्तक परिवार का कानूनी सदस्य बन जाता है।

‘पति का नाम चलाने’ वाले शब्दों का असली मतलब

याचिकाकर्ताओं ने 1971 के दत्तक विलेख में लिखे उन शब्दों को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश की, जहां विधवा ने लिखा था कि वह “अपने पति के नाम और परिवार को आगे बढ़ाने के लिए” बच्चे को गोद ले रही हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि इससे साबित होता है कि उन्होंने यह गोद केवल अपने पति के लिए लिया था, खुद के लिए नहीं।

जस्टिस जोशी ने निचली अदालत के विवेक की सराहना करते हुए इस तर्क को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये शब्द केवल एक महिला की व्यक्तिगत भावना और गोद लेने के पीछे की प्रेरणा को दर्शाते हैं। इसे किसी भी तरह से उनके कानूनी अधिकार को सीमित करने वाली शर्त के रूप में नहीं देखा जा सकता।

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दशकों लंबे मुकदमे को जल्द समाप्त करने का निर्देश

गोद लेने की वैधता को पूरी तरह सही ठहराते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि यह मामला 1984 से अदालतों में खिंच रहा है। इससे पहले नवंबर 2014 में नागपुर के जिला न्यायाधीश के एक फैसले को नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 100 के तहत हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद को अंतिम रूप देने के लिए, जस्टिस जोशी ने नागपुर की संबंधित ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह संपत्ति के बंटवारे (Partition) से जुड़े इस मामले का जल्द से जल्द और प्राथमिकता के आधार पर निपटारा करे।

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