बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) के एक गंभीर मामले में एक वकील का मामला बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा को रेफर कर दिया है। अदालत को पता चला कि उक्त वकील बिना वैध ‘वकालतनामा’ दाखिल किए ही कई प्रतिवादियों (Respondents) की ओर से पेश हो रहे थे। एक प्लॉट से अवैध निर्माण हटाने संबंधी याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि वकील ने अदालत और संबंधित पक्षों को गुमराह किया है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता पुष्पा संजय गुप्ता ने एक रिट याचिका दायर कर अपने नाम पर लीज पर लिए गए प्लॉट से अनधिकृत निर्माण हटाने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि प्लॉट आवंटित होने के बावजूद अवैध कब्जों के कारण उन्हें अभी तक कब्जा नहीं मिला है। इस मामले की कार्यवाही के दौरान, वकील एस. डी. चांडे प्रतिवादी संख्या 5 से 11 की ओर से पेश हो रहे थे।
9 अप्रैल, 2026 को हुई सुनवाई के दौरान यह खुलासा हुआ कि श्री चांडे ने केवल प्रतिवादी संख्या 7 की ओर से वकालतनामा दाखिल किया था। इसके बावजूद, वे पिछली कई सुनवाइयों में प्रतिवादी संख्या 5 से 11 का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इसी प्रतिनिधित्व के आधार पर अदालत ने 30 मार्च और 2 अप्रैल को आदेश पारित किए थे, जिसमें कथित तौर पर जाली दस्तावेजों का सहारा लेने के लिए प्रतिवादियों को अवमानना नोटिस जारी किए गए थे।
दलीलें और अदालत का विश्लेषण
अदालत ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि वकील के पास उन अधिकांश पक्षों की पैरवी करने का अधिकार ही नहीं था, जिनका वे दावा कर रहे थे। जस्टिस अनिल एल. पानसरे और जस्टिस निवेदिता पी. मेहता की बेंच ने टिप्पणी की:
“इस प्रकार, ऐसा प्रतीत होता है कि श्री चांडे ने अदालत और पक्षों को गुमराह किया है। श्री चांडे द्वारा की गई यह शरारत कदाचार की श्रेणी में आती है।”
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि यह कदाचार वर्तमान सुनवाई के दौरान भी जारी रहा। वकील ने यह तर्क देने की कोशिश की कि दो अलग-अलग दीवानी मुकदमों (RCS No. 177/1975 और SCS No. 285/1975) का फैसला एक ‘साझा फैसले’ (Common Judgment) के जरिए किया गया था, जबकि रिकॉर्ड से स्पष्ट था कि दोनों के अलग-अलग डिक्री थे और एक मुकदमा खारिज हो चुका था।
अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा:
“इसलिए, कदाचार पूरी तरह से स्पष्ट (writ large) है। यह पहला मौका नहीं है जब श्री चांडे का आचरण आपत्तिजनक पाया गया है। पूर्व में कई बार ऐसी घटनाओं को अदालत द्वारा नजरअंदाज किया गया है।”
सुप्रीम कोर्ट के भगवान सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
$$2025 (6) SCC 416$$
मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कानूनी पेशे की गरिमा पर जोर दिया:
“यह मामला तब और गंभीर हो जाता है जब वकील, जो अदालत के अधिकारी होते हैं, अनैतिक मुकदमेबाजी में शामिल होते हैं और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने में शरारती तत्वों की सहायता करते हैं।”
अदालत का फैसला
बॉम्बे हाईकोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित किए:
- अनुशासनात्मक कार्रवाई: अदालत ने श्री एस. डी. चांडे के खिलाफ उचित कार्रवाई के लिए मामला बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा को भेज दिया है। बार काउंसिल को चार महीने के भीतर आरोप तय करने और निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है।
- अतिक्रमण हटाना: नागपुर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट (NIT) ने अदालत को आश्वासन दिया कि याचिकाकर्ता के प्लॉट से छह सप्ताह के भीतर अवैध निर्माण हटा दिया जाएगा। अदालत ने इस बयान को स्वीकार करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।
- अवमानना की कार्यवाही: प्रतिवादी संख्या 5 से 11 के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही को 5 मई, 2026 के लिए ‘सुओ मोटो’ (स्वप्रेरणा) अवमानना याचिका के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
- प्रतिवादियों को छूट: प्रतिवादी संख्या 5, 6 और 8 से 11 को बिना अधिकार उनकी पैरवी करने के लिए वकील श्री चांडे के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई करने की छूट दी गई है।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: पुष्पा बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य
- केस संख्या: रिट याचिका संख्या 7236/2024
- बेंच: जस्टिस अनिल एल. पानसरे और जस्टिस निवेदिता पी. मेहता
- दिनांक: 09-04-2026

