दिल्ली हाईकोर्ट: बालिग युवक-युवती को विवाह का संवैधानिक अधिकार, समाज या माता-पिता भी रोक नहीं सकते

दिल्ली हाईकोर्ट ने दोहराया है कि बालिग युवक और युवती को आपसी सहमति से विवाह करने का संवैधानिक अधिकार है और इसमें न तो समाज, न ही राज्य तंत्र और न ही उनके माता-पिता हस्तक्षेप कर सकते हैं। अदालत ने लड़की के पिता से मिल रही धमकियों को देखते हुए दंपति को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश दिया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि दो बालिग व्यक्ति आपसी सहमति से विवाह करने के लिए स्वतंत्र हैं और उनके इस निर्णय में कोई भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता—न तो समाज, न राज्य मशीनरी और न ही उनके माता-पिता।

यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने उस याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया जिसमें एक नवविवाहित जोड़े ने लड़की के पिता से जानमाल की धमकी मिलने की बात कहते हुए सुरक्षा की मांग की थी।

अदालत ने अपने 2 फरवरी के आदेश में कहा:

“चूंकि याचिकाकर्ता दोनों बालिग हैं और एक-दूसरे से विवाह करने के अपने अधिकारों के भीतर हैं, और उन्होंने आपसी सहमति से विवाह करके जीवन की यात्रा साथ तय करने का निर्णय लिया है, अतः समाज, राज्य मशीनरी या माता-पिता सहित कोई भी उनके इस निर्णय में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकता।”

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने आपसी समझौते के आधार पर रेप सहित दो एफआईआर रद्द की, कहा– मुकदमा चलाने से सिर्फ मानसिक कष्ट बढ़ेगा

न्यायमूर्ति बनर्जी ने आगे कहा:

“विशेषकर जब याचिकाकर्ता आपसी सहमति से विवाह करने वाले बालिग हैं, तो उनके इस निर्णय को पवित्रता दी जानी चाहिए। यह उनका संवैधानिक अधिकार है कि वे अपने जीवन साथी का चयन करें।”

याचिकाकर्ता दंपति ने जुलाई 2025 में आर्य समाज मंदिर में हिन्दू रीति-रिवाजों से विवाह किया था और बाद में उसे संबंधित उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) के समक्ष पंजीकृत भी कराया था। लेकिन लड़की के पिता इस विवाह से नाखुश थे और कथित रूप से उन्हें धमकी दे रहे थे।

अदालत ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली पुलिस को दंपति को उचित सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया। साथ ही कहा कि:

READ ALSO  पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कर्नल बाथ पर हमले की जांच में देरी पर उठाए सवाल, चंडीगढ़ पुलिस से मांगी रिपोर्ट

“कोई भी व्यक्ति, विशेषकर लड़की का पिता, याचिकाकर्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता को खतरे में नहीं डाल सकता। उनके निजी निर्णयों के लिए किसी सामाजिक स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है।”

इस फैसले के माध्यम से अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि जीवनसाथी का चयन करना प्रत्येक वयस्क नागरिक का मौलिक अधिकार है, और इसमें बाहरी दबाव या सामाजिक हस्तक्षेप की कोई जगह नहीं हो सकती।

READ ALSO  राजस्थान हाईकोर्ट  ने सरकार से हीटवेव से प्रभावित परिवारों को मुआवजा देने को कहा
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles