सिविल जज (जूनियर डिवीजन), 2022 बैच हेतु “न्यायिक कौशल विकास” विषयक एक दिवसीय सम्मेलन का आयोजन आज न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान, उ०प्र० में किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य राज्य न्यायिक सेवा में नव नियुक्त न्यायिक अधिकारियों में व्यावसायिक दक्षता, नैतिक अभिमुखता, न्यायिक संवेदनशीलता तथा तकनीकी जागरूकता को सुदृढ़ करना था।
संस्थान के नालंदा ऑडिटोरियम में आयोजित उद्घाटन सत्र में माननीय न्यायमूर्ति श्री विक्रम नाथ, मुख्य अतिथि तथा माननीय न्यायमूर्ति श्रीमती बी०वी० नागरत्ना विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। इस गरिमामयी अवसर पर माननीय न्यायमूर्ति श्री अरुण भंसाली, मुख्य न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय एवं संरक्षक-प्रमुख, जे०टी०आर०आई०; माननीय न्यायमूर्ति श्री महेश चन्द्र त्रिपाठी तथा माननीय न्यायमूर्ति श्री राजन रॉय, वरिष्ठ न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ एवं अध्यक्ष, पर्यवेक्षण समिति, जे०टी०आर०आई० की भी गरिमामयी उपस्थिति रही।

कार्यक्रम का शुभारम्भ माननीय अतिथिगणों के आगमन एवं औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर से हुआ, जिसके पश्चात दीप प्रज्वलन किया गया।
स्वागत उद्बोधन देते हुए माननीय न्यायमूर्ति श्री राजन रॉय ने कहा कि न्यायिक शिक्षा एक सतत प्रक्रिया है तथा नव नियुक्त न्यायिक अधिकारियों को निष्पक्षता, धैर्य, अनुशासन, विनम्रता एवं संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को अपने कार्य व्यवहार में विकसित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायिक अधिकारी की भूमिका केवल विवादों के निस्तारण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए निरंतर अध्ययन, सहानुभूति एवं संस्थागत उत्तरदायित्व की भावना भी आवश्यक है।
अपने संबोधन में माननीय न्यायमूर्ति श्री महेश चन्द्र त्रिपाठी ने दैनिक न्यायिक कार्यों में न्यायिक नैतिकता एवं संवेदनशीलता के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को सदैव समाज द्वारा उन पर व्यक्त विश्वास के प्रति सजग रहना चाहिए तथा अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी, निष्पक्षता एवं करुणा के साथ करना चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि युवा न्यायिक अधिकारियों को अधिवक्ताओं के साथ व्यवहार करते समय धैर्य एवं निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए।

सभा को संबोधित करते हुए माननीय न्यायमूर्ति श्री अरुण भंसाली, मुख्य न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आधुनिक न्याय वितरण प्रणाली में न्यायिक कौशल के बढ़ते महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि न्याय केवल विधि का अनुप्रयोग नहीं है, बल्कि विधि का विवेक, ईमानदारी एवं सहानुभूति के साथ किया गया अनुप्रयोग है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रभावी न्यायिक प्रशासन के लिए केवल विधिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रभावी न्यायालय प्रबंधन, संवाद कौशल, तकनीकी अनुकूलन क्षमता तथा वादकारियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण भी अत्यंत आवश्यक है।
माननीय न्यायमूर्ति श्रीमती बी०वी० नागरत्ना, न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय ने अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में कहा कि युवा न्यायिक अधिकारियों पर न्यायपालिका के प्रति जनता के विश्वास को बनाए रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि निष्पक्षता एवं स्वतंत्रता एक अच्छे न्यायाधीश की पहचान है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारियों को समयबद्धता, सत्यनिष्ठा एवं धैर्य के साथ कार्य करना चाहिए।
अपने मुख्य वक्तव्य में माननीय न्यायमूर्ति श्री विक्रम नाथ, न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय ने सिविल जज (जूनियर), 2022 बैच के युवा न्यायिक अधिकारियों से संवाद स्थापित किया। उन्होंने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को इस प्रकार न्याय प्रदान करना चाहिए कि स्थानांतरण के पश्चात भी लोग उन्हें स्मरण रखें। उन्होंने कहा कि किसी भी निर्णय से पूर्व न्यायिक अधिकारी को ठहरकर, विचार कर निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने यह भी प्रेरित किया कि चयन के पश्चात आत्मसंतोष की भावना से बचते हुए निरंतर परिश्रम करते रहना चाहिए।

उद्घाटन सत्र का समापन औपचारिक कृतज्ञता ज्ञापन एवं संस्थान की निदेशक सुश्री रेखा अग्निहोत्री द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
तत्पश्चात माननीय अतिथियों द्वारा संस्थान के प्रशिक्षण विंग में स्थापित नवीन ‘आर्यभट्ट’ कम्प्यूटर लैब का उद्घाटन किया गया। उक्त कम्प्यूटर लैब का स्थापना न्यायिक अधिकारियों हेतु डिजिटल एवं तकनीकी प्रशिक्षण सुविधाओं को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से की गई है।
इसके उपरांत कार्यक्रम के दौरान चार तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। प्रथम तकनीकी सत्र “निर्णय लेखन : एक कला एवं विज्ञान” विषय पर माननीय न्यायमूर्ति श्री अतुल श्रीधरन, न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय एवं सदस्य, पर्यवेक्षण समिति, जे०टी०आर०आई० द्वारा आयोजित किया गया। उन्होंने बल दिया कि न्यायिक अधिकारियों को सरल, स्पष्ट एवं सहज भाषा में निर्णय लिखने का प्रयास करना चाहिए तथा प्रकरण की परिस्थितियों की आवश्यकता न होने पर जटिल अथवा कठिन शब्दावली के प्रयोग से बचना चाहिए।
द्वितीय तकनीकी सत्र “निर्णय प्रक्रिया में पूर्वाग्रह” विषय पर माननीय न्यायमूर्ति श्री अजय भनोट, न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय एवं सदस्य, पर्यवेक्षण समिति, जे०टी०आर०आई० द्वारा दिया गया। उन्होंने न्यायिक आत्म-जागरूकता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारियों को अपने अंतर्निहित पूर्वाग्रहों एवं अवधारणाओं के प्रति सजग रहना चाहिए, ताकि निष्पक्ष, न्यायसंगत एवं वस्तुनिष्ठ निर्णय सुनिश्चित किए जा सकें।
तृतीय तकनीकी सत्र “बार के सदस्यों के संदर्भ में न्यायालयीन व्यवहार की सूक्ष्मताएं” विषय पर आयोजित किया गया। इस सत्र में अधिकारियों के साथ व्यवहार करते समय न्यायिक शालीनता, धैर्य एवं संतुलित आचरण बनाए रखने के महत्व पर विशेष बल दिया गया। साथ ही यह भी रेखांकित किया गया कि न्यायिक अधिकारियों को सौहार्दपूर्ण व्यवहार, प्रभावी न्यायालय संचालन एवं अधिवक्ताओं के साथ सम्मानजनक व्यावसायिक संबंधों के माध्यम से संस्थान की गरिमा बनाए रखनी चाहिए तथा साथ ही न्यायिक अनुशासन एवं प्रक्रियात्मक निष्पक्षता के दृढ़तापूर्वक पालन को भी सुनिश्चित करना चाहिए।
चतुर्थ तकनीकी सत्र “आवासीय प्रशिक्षण पर विचार एवं भावी यात्रा” विषय पर आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागी न्यायिक अधिकारियों से फीडबैक भी प्राप्त किया गया। इस सत्र में अधिकारियों ने पीठासीन अधिकारी के रूप में कार्य करते समय अपने अनुभवों एवं चुनौतियों को साझा किया तथा आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम की उपयोगिता एवं प्रभावशीलता के संबंध में अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का संचालन संस्थान के उपनिदेशकों द्वारा किया गया। सम्मेलन में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल, वरिष्ठ रजिस्ट्रार एवं अन्य रजिस्ट्री अधिकारी, उत्तर प्रदेश शासन के प्रमुख सचिव (विधि एवं विधि परामर्श), संस्थान के संकाय सदस्य एवं अधिकारी तथा उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आए सिविल जज (जूनियर डिवीजन), 2022 बैच के न्यायिक अधिकारी उपस्थित रहे।

