झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 24 साल बाद हत्या के आरोप से मुक्त हुए दो भाई, कोर्ट ने कहा- ‘सिर्फ चुप्पी गुनाह नहीं’

झारखंड हाईकोर्ट ने अंधविश्वास और ‘डायन-बिसाही’ के संदेह से जुड़े एक दशक पुराने हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने दो सगे भाइयों की उम्रकैद की सजा को निरस्त करते हुए उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया। न्यायमूर्ति रोंगोन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि मामले में पेश किए गए साक्ष्य सच्चाई से कोसों दूर हैं और अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित करने में विफल रहा।

यह मामला 2 नवंबर 2000 का है, जब अल्फोष सोरेन नामक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी। पुलिस और अभियोजन पक्ष के अनुसार, तारसियस सोरेंग और मारियानुस सोरेंग नामक दो भाइयों ने अल्फोष पर लकड़ी के लट्ठे से हमला किया था। इस हमले के पीछे की वजह अंधविश्वास बताई गई थी—आरोपियों को संदेह था कि अल्फोष ने ‘काला जादू’ (witchcraft) के जरिए उनके माता-पिता की जान ली थी।

निचली अदालत ने जनवरी 2004 में दोनों भाइयों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। पिछले 24 वर्षों से दोनों भाई इस कानूनी लड़ाई को लड़ रहे थे।

हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि मामले के मुख्य गवाह—समीर लकड़ा और टिंटस सोरेन—सुनवाई के दौरान अपने बयानों से मुकर गए (Hostile हो गए)। ये वही लोग थे जो घटना के वक्त पीड़ित के साथ ‘हड़िया’ (चावल की शराब) पी रहे थे।

अदालत ने कहा कि मुख्य गवाहों का मुकरना ही एक अलग कहानी बयां करता है। इसके अलावा, मृतक के परिवार के सदस्यों के बयानों में भी काफी विसंगतियां पाई गईं। कोर्ट ने माना कि परिवार के सदस्यों के पास आरोपियों को घटनास्थल से भागते हुए देखने का कोई वास्तविक अवसर नहीं था, जैसा कि उन्होंने बाद में दावा किया था।

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इस फैसले में हाईकोर्ट ने कानून के एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू पर जोर दिया। पीठ ने कहा कि किसी भी मामले को पूरी तरह साबित करने की जिम्मेदारी केवल अभियोजन पक्ष (Prosecution) की होती है।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया:

“अभियुक्त का चुप रहना या किसी आरोप पर स्पष्टीकरण न देना उसकी संलिप्तता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कानून का सिद्धांत यह है कि अभियोजन पक्ष को आरोपियों के अपराध को संदेह से परे (Beyond reasonable doubt) साबित करना ही होगा।”

बचाव पक्ष के वकील ए.के. चतुर्वेदी ने दलील दी कि इस मामले में कोई भी चश्मदीद गवाह नहीं था और शुरुआती सूचना देने वाले (मृतक के बेटे) ने भी ट्रायल के दौरान अपना पक्ष बदल लिया था।

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हालांकि सरकारी वकील ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराने की कोशिश की, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे “कानूनी त्रुटि” करार दिया। अदालत ने माना कि निचली अदालत ने गवाहों के विरोधाभासों को नजरअंदाज कर दिया था। इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही तारसियस और मारियानुस सोरेंग अब जेल से बाहर आ सकेंगे और उनके सिर से दो दशकों पुराना हत्या का कलंक धुल गया है।

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