स्वंय डिलीट हो चुके सीसीटीवी फुटेज को पेश करने का आदेश नहीं दे सकती अदालत: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवीन्द्र कुमार अग्रवाल शामिल हैं, ने स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस स्टेशन का सीसीटीवी फुटेज 18 महीने की अनिवार्य भंडारण अवधि समाप्त होने के बाद सिस्टम से स्वचालित रूप से डिलीट हो चुका है और उपलब्ध नहीं है, तो ट्रायल कोर्ट द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 94 के तहत उसे पेश करने का निर्देश देने से इंकार करना पूरी तरह से वैध है। एनडीपीएस एक्ट के तहत आरोपी चार व्यक्तियों की याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने स्पेशल जज (एनडीपीएस), बिलासपुर के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें उन्होंने गौरेला पुलिस स्टेशन के सीसीटीवी फुटेज को संरक्षित और पेश करने की मांग वाली अर्जी खारिज कर दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता—बनवारी लाल गुप्ता, रोहित गुप्ता, अंकुल जैतवार और गोपाल पनड़िया उर्फ गोपी पनिका—को थाना गौरेला (जिला गौरेला-पेंड्रा-मरवाही) में दर्ज अपराध क्रमांक 304/2024 के तहत गिरफ्तार किया गया था। उन पर एनडीपीएस एक्ट की धारा 20(b) व 29 तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 111 के तहत गांजा परिवहन का आरोप है।

मामले में 10 मार्च 2025 को चार्जशीट दाखिल होने और आरोप तय होने के बाद, याचिकाकर्ताओं ने 23 मई 2025 को स्पेशल जज (एनडीपीएस), बिलासपुर के समक्ष बीएनएसएस की धारा 94 के तहत आवेदन दाखिल किया। उन्होंने मांग की कि थाना गौरेला के 13 सितंबर 2024 की मध्यरात्रि से 15 सितंबर 2024 की मध्यरात्रि तक (कुल 36 घंटे) के बिना एडिट किए गए सीसीटीवी फुटेज और 14 सितंबर 2024 के 24 घंटे के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) व टावर लोकेशन डेटा पेश करने के निर्देश दिए जाएं।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि जब्तशुदा मादक पदार्थ उनकी गाड़ी से बरामद नहीं हुआ था और उन्हें झूठा फंसाने के लिए कथित घटना से एक दिन पहले, यानी 14 सितंबर 2024 को ही गौरेला पुलिस स्टेशन में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था। उन्होंने कहा कि चूंकि एनडीपीएस एक्ट की धारा 35 और 54 के तहत कानूनी उपधारणा आरोपी के खिलाफ होती है, इसलिए अपनी बेगुनाही और अवैध हिरासत साबित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य बेहद महत्वपूर्ण हैं।

अपनी दलीलों के समर्थन में याचिकाकर्ताओं ने नूर आगा बनाम पंजाब राज्य, डी.के. बासु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, शफी मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह के मुकदमों का हवाला दिया। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के सुनिता शुक्ला बनाम यूपी राज्य और सेकर बनाम पुलिस अधीक्षक फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें पुलिस स्टेशनों में सीसीटीवी प्रणालियों की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और फुटेज के संरक्षण पर जोर दिया गया था।

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दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शशांक ठाकुर ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह याचिका निराधार है और ट्रायल के दौरान समानांतर जांच शुरू करने का प्रयास करती है। राज्य ने स्पष्ट किया कि जब स्पेशल जज ने 5 मई 2026 को रिपोर्ट मांगी, तो थाना प्रभारी गौरेला ने 15 मई 2026 को रिपोर्ट दी कि फुटेज संरक्षण का कोई पूर्व न्यायिक आदेश प्राप्त नहीं हुआ था। इसके अलावा, 13 से 15 सितंबर 2024 का फुटेज 18 महीने की निर्धारित भंडारण अवधि पूरी होने पर सिस्टम से अपने आप डिलीट हो चुका था। राज्य ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ताओं के मोबाइल सीडीआर पहले ही प्राप्त कर ट्रायल कोर्ट में पेश किए जा चुके हैं।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और समीक्षा

बीएनएसएस की धारा 94 के कानूनी दायरे का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यद्यपि दस्तावेज या वस्तु मंगाने की अदालत की शक्ति व्यापक है, लेकिन इसका प्रयोग सामग्री की वास्तविक उपलब्धता और प्रासंगिकता पर निर्भर करता है। पीठ ने टिप्पणी की:

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“अदालत की यह शक्ति निस्संदेह व्यापक है और इसका उद्देश्य निष्पक्ष एवं प्रभावी न्याय प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाना है। हालांकि, ऐसी शक्ति के अस्तित्व का यह अर्थ नहीं है कि केवल इसलिए कि आरोपी यह दावा करता है कि कोई दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड उसके बचाव में सहायक हो सकता है, अदालत हर दस्तावेज को पेश करने का निर्देश देने के लिए बाध्य है।”

जारी विचारण के दौरान अंतरिम साक्ष्य संबंधी आदेशों के खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका की पोषणीयता पर विचार करते हुए जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवीन्द्र कुमार अग्रवाल ने संयम बरतने पर बल दिया और कहा:

“निचली अदालत में लंबित सुनवाई के दौरान किसी साक्ष्य संबंधी विषय पर रिट या पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार का उपयोग समानांतर जांच के तंत्र के रूप में या निचली अदालत के विवेक के स्थान पर अपने विवेक को प्रतिस्थापित करने के लिए नहीं किया जा सकता।”

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पुलिस स्टेशनों में सीसीटीवी अवसंरचना से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन की भी समीक्षा की। राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) ने अपने व्यक्तिगत हलफनामे प्रस्तुत किए। हलफनामों से उजागर हुआ कि राज्य स्तरीय निगरानी समिति (SLOC) और जिला स्तरीय निगरानी समितियां (DLOC) सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं, अनिवार्य मासिक निरीक्षण लागू किए गए हैं, और वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पुलिस आधुनिकीकरण योजना (ASUMP) के तहत राज्य के 550 पुलिस स्टेशनों में सीसीटीवी बुनियादी ढांचे के उन्नयन के लिए 102.10 करोड़ रुपये की परियोजना पर केंद्र सरकार द्वारा विचार किया गया है।

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कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि जो सीसीटीवी फुटेज अब सिस्टम में उपलब्ध ही नहीं है, उसे पेश करने का निर्देश देने से इंकार करके ट्रायल कोर्ट ने कोई अधिकारिता संबंधी त्रुटि नहीं की है। सीडीआर और टावर लोकेशन के संबंध में कोर्ट ने नोट किया कि पुलिस पहले ही ये रिकॉर्ड स्पेशल जज के समक्ष जमा कर चुकी है, इसलिए याचिकाकर्ताओं की यह शिकायत समाप्त हो चुकी है और वे मुकदमा चलाए जाने के दौरान इन रिकॉर्ड्स का लाभ उठाने के लिए स्वतंत्र हैं।

रिट याचिका को खारिज करते हुए पीठ ने पुलिस थानों में सीसीटीवी निगरानी से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी फैसलों का उल्लेख किया और निर्देश दिया:

“यह अदालत आशा और विश्वास व्यक्त करती है कि छत्तीसगढ़ राज्य, संबंधित अधिकारियों और इस उद्देश्य के लिए गठित निगरानी समितियों के माध्यम से, माननीय सर्वोच्च अदालत के उक्त निर्देशों का कड़ाई से, प्रभावी और निरंतर अनुपालन सुनिश्चित करेगा।”

पीठ ने आगे कहा:

“राज्य प्राधिकारियों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सभी पुलिस स्टेशनों में स्थापित सीसीटीवी प्रणाली हर समय क्रियाशील रहे, उनका नियमित निरीक्षण और निगरानी हो, पर्याप्त पावर बैकअप और भंडारण क्षमता उपलब्ध हो, तथा कानून के अनुसार निर्धारित अवधि के लिए फुटेज सुरक्षित रखा जाए, ताकि प्रशासनिक या तकनीकी कमियों के कारण प्रासंगिक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नष्ट न हों।”

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: बनवारी लाल गुप्ता और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य

वाद संख्या: डब्ल्यूपीसीआर नंबर 306/2026

पीठ: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, और जस्टिस रवीन्द्र कुमार अग्रवाल

निर्णय की तिथि: 21/08/2026

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