सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन प्रणाली को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती, 29 मई को होगी सुनवाई

सीबीएसई की कक्षा 12 बोर्ड परीक्षाओं में पहली बार लागू की गई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली अब न्यायिक जांच के दायरे में आ गई है। इस व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है, जिस पर 29 मई 2026 को सुनवाई प्रस्तावित है।

याचिका अधिवक्ता मोहित अशोक ने दायर की है। इसमें केंद्र सरकार, सीबीएसई, परीक्षा नियंत्रक और उत्तर प्रदेश सरकार को पक्षकार बनाया गया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि बिना पर्याप्त तैयारी के डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली लागू करने से देशभर के लाखों छात्रों के परिणाम प्रभावित हुए और मूल्यांकन प्रक्रिया में व्यापक गड़बड़ियां सामने आईं।

याचिका के अनुसार, सीबीएसई ने 9 फरवरी 2026 को एक सर्कुलर जारी कर कक्षा 12 की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली लागू की। उस समय बोर्ड परीक्षाएं पहले से चल रही थीं। याचिकाकर्ता का कहना है कि परीक्षकों को केवल एक ऑनलाइन ओरिएंटेशन वेबिनार और एक मॉक ट्रेनिंग दी गई, जबकि इससे पहले किसी भी परीक्षा चक्र में इस प्रणाली का पायलट प्रोजेक्ट नहीं चलाया गया था।

याचिका में कहा गया है कि पारंपरिक तरीके से कॉपियां जांचने के बजाय उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड किया गया, जहां परीक्षकों ने स्क्रीन पर मूल्यांकन किया। याचिकाकर्ता के मुताबिक इस बदलाव के लिए न तो पर्याप्त तकनीकी तैयारी थी और न ही परीक्षकों को प्रभावी प्रशिक्षण दिया गया।

पिटिशन में दावा किया गया है कि मई 2026 में घोषित परिणामों के बाद बड़ी संख्या में छात्रों ने असामान्य रूप से कम अंक मिलने की शिकायत की। याचिका में कहा गया है कि इस वर्ष केवल 5.3 प्रतिशत छात्र 90 प्रतिशत से अधिक अंक ला सके, जबकि 95 प्रतिशत से ऊपर अंक पाने वालों की संख्या 0.97 प्रतिशत रही, जिसे पिछले सात वर्षों में सबसे कम बताया गया है।

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याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि कई ऐसे छात्र, जिन्होंने जेईई जैसी प्रतिस्पर्धी परीक्षाएं पास कीं, उन्हें बोर्ड परीक्षा के संबंधित विषयों में बेहद कम अंक मिले। इसके अलावा कई स्कूलों के टॉपर्स को भी कुछ विषयों में असामान्य रूप से कम अंक मिलने की शिकायतें सामने आईं।

याचिका में कहा गया है कि सीबीएसई ने मूल्यांकन में हुई कथित त्रुटियों को स्वीकार करने के बजाय छात्रों को प्रति प्रश्न ₹100 शुल्क देकर पुनर्मूल्यांकन कराने का विकल्प दिया। पिटिशन में इस शुल्क को अनुचित और छात्रों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बताया गया है।

याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 21ए का हवाला देते हुए कहा है कि निष्पक्ष और सक्षम मूल्यांकन छात्रों के शिक्षा के अधिकार का हिस्सा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि बिना तैयारी के OSM प्रणाली लागू करना मनमाना और छात्रों के मौलिक अधिकारों के विपरीत है।

पिटिशन में हाईकोर्ट से मांग की गई है कि OSM प्रणाली के क्रियान्वयन की जांच के लिए शिक्षाविदों और तकनीकी विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र समिति गठित की जाए। साथ ही प्रभावित छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं का प्रशिक्षित परीक्षकों से नि:शुल्क पुनर्मूल्यांकन कराने का निर्देश देने की भी मांग की गई है।

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याचिका में यह भी प्रार्थना की गई है कि पुनर्मूल्यांकन शुल्क पर रोक लगाई जाए, छात्रों के कॉलेज प्रवेश हितों की रक्षा की जाए और भविष्य में किसी भी डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली को लागू करने से पहले उसका पायलट परीक्षण तथा परीक्षकों का समुचित प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए।

इसके अलावा अंतरिम राहत आवेदन में सीबीएसई से ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली के लिए दी गई ट्रेनिंग, तकनीकी ढांचे और कथित मूल्यांकन त्रुटियों को दूर करने के लिए उठाए गए कदमों का विस्तृत ब्यौरा कोर्ट में पेश करने की मांग की गई है।

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याचिका में कहा गया है कि 18 मई 2026 को सीबीएसई, शिक्षा मंत्रालय, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और अन्य प्राधिकरणों को प्रतिनिधित्व भेजा गया था, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

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