मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई अधिवक्ता (वकील) अपने आवासीय परिसर से दफ्तर (ऑफिस) संचालित करता है, तो उससे कमर्शियल (व्यावसायिक) दरों पर बिजली बिल नहीं वसूला जा सकता।
न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के की एकल पीठ ने माना कि ‘व्यावसायिक गतिविधि’ का अर्थ व्यापार, क्रय-विक्रय (खरीद-बिक्री) या माल की आपूर्ति से है, जबकि वकालत का पेशा पूरी तरह से व्यक्ति के व्यक्तिगत कौशल और बौद्धिक क्षमता पर निर्भर करता है। इस आधार पर कोर्ट ने बिजली विभाग के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके तहत एक अधिवक्ता के घरेलू कार्यालय पर व्यावसायिक दरें लागू करने की कोशिश की गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला ग्वालियर में वकालत करने वाले अधिवक्ता संतोष अग्रवाल (याचिकाकर्ता) से जुड़ा है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की थी। इस याचिका में बिजली विभाग (मैनेजर, नगर केंद्रीय संभाग ग्वालियर) द्वारा 31 दिसंबर 2020 को जारी किए गए उन आदेशों (अनुलग्नक P/1 और P/1A) को चुनौती दी गई थी, जिनमें उनके घरेलू कार्यालय को ‘व्यावसायिक गतिविधि’ मानकर कमर्शियल दरों पर बिल थमा दिया गया था।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से:
स्वयं पैरवी करते हुए याचिकाकर्ता संतोष अग्रवाल ने तर्क दिया कि चूंकि उनका कार्यालय उनके घर के भीतर ही स्थित है, इसलिए इसे व्यावसायिक गतिविधि की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने निम्नलिखित कानूनी मिसालें पेश कीं:
- धीरज सिंह बनाम हेमंत कुमार शर्मा (Second Appeal No. 2617 of 2024): याचिकाकर्ता ने इस फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ‘वाणिज्य’ या ‘व्यावसायिक’ शब्द का सीधा संबंध व्यापारिक गतिविधियों जैसे वस्तुओं की खरीद-फरोख्त या आपूर्ति से है। उन्होंने दलील दी कि “वकालत के पेशे में इस तरह की कोई खरीद-बिक्री या व्यापारिक लेन-देन नहीं होता, इसलिए कानूनी पेशे की तुलना व्यापार या व्यवसाय से करना पूरी तरह से गलत और अनुचित है।”
- के. कनगासबाई बनाम सुपरिटेंडिंग इंजीनियर, कन्याकुमारी बिजली वितरण सर्कल (W.P. No. 21731 of 2003): मद्रास उच्च न्यायालय के इस फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि घर से चलने वाले दफ्तर पर अतिरिक्त कमर्शियल शुल्क तभी लगाया जा सकता है, जब वकील किसी स्वतंत्र व्यावसायिक परिसर (कमर्शियल बिल्डिंग) से काम कर रहा हो।
बिजली विभाग (प्रतिवादी) की ओर से:
बिजली विभाग की ओर से उपस्थित अधिवक्ता नरोत्तम शर्मा ने विभाग की कार्रवाई को सही ठहराया। उन्होंने उच्चतम न्यायालय के एक फैसले पर भरोसा जताया:
- चेयरमैन, एम.पी. इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड और अन्य बनाम शिव नारायण और अन्य (Civil Appeal No. 1065 of 2000): प्रतिवादी पक्ष का तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट ने वकील के दफ्तर को ‘गैर-घरेलू’ (Non-Domestic) श्रेणी में माना है। इस वर्गीकरण के तहत, गैर-घरेलू श्रेणी में आने के कारण उपभोक्ता को कमर्शियल दरों पर ही भुगतान करना होगा।
न्यायालय का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों द्वारा पेश किए गए अदालती फैसलों का गहन अध्ययन किया ताकि यह तय किया जा सके कि क्या घर से चलने वाले कानूनी कार्यालय को व्यावसायिक प्रतिष्ठान माना जा सकता है।
शिव नारायण मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर स्पष्टीकरण
न्यायमूर्ति फड़के ने स्पष्ट किया कि एम.पी. इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बनाम शिव नारायण मामले में बिजली विभाग के पास केवल दो ही श्रेणियां उपलब्ध थीं: (क) घरेलू उद्देश्य, और (ख) व्यावसायिक और/या गैर-घरेलू उद्देश्य।
हाई कोर्ट ने रेखांकित किया कि सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला केवल ‘परिसर के गैर-घरेलू उपयोग’ पर आधारित था, न कि इस बात पर कि वकालत एक व्यावसायिक गतिविधि है:
“सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर विचार करते समय इस पहलू पर ध्यान नहीं दिया कि क्या एक अधिवक्ता को व्यावसायिक गतिविधि करने वाला कहा जा सकता है या नहीं; बल्कि केवल परिसर के उपयोग के आधार पर इसे ‘गैर-घरेलू उपयोग’ माना और अधिवक्ता को व्यावसायिक दर पर बिजली शुल्क का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी ठहराया था।”
पेशा बनाम व्यावसायिक गतिविधि
अदालत ने व्यापार और पेशे के बीच के बुनियादी अंतर को स्पष्ट करने के लिए धीरज सिंह बनाम हिमांशु कुमार शर्मा (याचिका में ‘हेमंत कुमार शर्मा’ के रूप में संदर्भित) मामले की महत्वपूर्ण टिप्पणी को उद्धृत किया:
“वाणिज्य (commerce) या व्यावसायिक (commercial) शब्द में अनिवार्य रूप से व्यापारिक गतिविधि की अवधारणा शामिल होती है। व्यापारिक गतिविधि में किसी भी प्रकार का काम शामिल हो सकता है, चाहे वह परिवहन हो या वस्तुओं की आपूर्ति। इसका सामान्य अर्थ खरीद और बिक्री से है। लेकिन वकालत के पेशे में इस तरह की कोई खरीद या बिक्री नहीं होती है और न ही किसी प्रकार का व्यापार होता है। इसलिए, कानूनी पेशे की तुलना व्यापार और व्यवसाय से करना पूरी तरह से गलत दृष्टिकोण है और यह पूरी तरह अनुचित होगा।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“एक पेशेवर गतिविधि ऐसी गतिविधि होनी चाहिए जो किसी व्यक्ति द्वारा अपने व्यक्तिगत कौशल और बुद्धि के माध्यम से की जाती है। इसलिए, एक पेशेवर गतिविधि और व्यावसायिक प्रकृति की गतिविधि के बीच एक मौलिक अंतर है।”
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि डॉक्टरों के संदर्भ में भी देवेन्द्र एम. सुरती (डॉ.) बनाम गुजरात राज्य मामले में इसी तरह का सिद्धांत अपनाया गया था, जहां डॉक्टर के क्लिनिक को बॉम्बे शॉप्स एंड एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत ‘व्यावसायिक प्रतिष्ठान’ नहीं माना गया था।
आवासीय बनाम व्यावसायिक भवन में कार्यालय
हाई कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के के. कनगासबाई मामले और राजस्थान हाई कोर्ट की खंडपीठ के जे.वी.वी.एन. लिमिटेड बनाम श्रीमती परिनितू जैन (AIR 2009 Rajasthan 110) के फैसलों का संदर्भ दिया, जिन्होंने एक स्पष्ट सीमा रेखा खींची है:
“उच्चतम न्यायालय की वृहद पीठ ने फैसला सुनाया था कि अपने घर से दफ्तर चलाने वाले अधिवक्ता से व्यावसायिक आधार पर अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जा सकता। हालांकि, यदि कार्यालय किसी स्वतंत्र व्यावसायिक स्थान (Commercial Place) पर चलाया जा रहा है, तो अधिवक्ता को इससे छूट नहीं दी जा सकती। आवासीय कार्यालय और व्यावसायिक भवन में स्थित कार्यालय के बीच एक स्पष्ट अंतर किया गया है।”
इस कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए न्यायमूर्ति फड़के ने कहा:
“इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि यद्यपि अधिवक्ता के कार्यालय को व्यावसायिक गतिविधि नहीं कहा जा सकता, बशर्ते वह आवासीय परिसर में स्थित हो; लेकिन जहां अधिवक्ता का कार्यालय किसी व्यावसायिक भवन (Commercial Building) में स्थित है, वहां वह व्यावसायिक दर पर उच्च बिजली शुल्क के भुगतान से छूट की मांग नहीं कर सकता।”
अदालत का निर्णय
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अधिवक्ता के निवास से चलने वाले कार्यालय के लिए व्यावसायिक दरों पर बिजली शुल्क वसूलना कानूनन एक “गंभीर अवैधता” (Material Illegality) है।
तदनुसार, न्यायालय ने बिजली विभाग के 31 दिसंबर 2020 के विवादित आदेशों (Annexure P/1 और P/1A) को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता के घरेलू कार्यालय के लिए केवल घरेलू/आवासीय दरों (Residential Rates) पर ही बिजली बिल जारी करें। इन निर्देशों के साथ रिट याचिका का निपटारा कर दिया गया।
मामले का विवरण
- मामले का शीर्षक: संतोष अग्रवाल बनाम मध्य प्रदेश मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड और अन्य
- याचिका संख्या: रिट याचिका संख्या 1507 / 2021
- पीठ: न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के
- निर्णय तिथि: 11 मई, 2026

