बॉम्बे हाईकोर्ट ने नीट-यूजी (NEET-UG) री-एग्जाम के न्यूनतम क्वालिफाइंग अंकों (कट-ऑफ) को कम करने की मांग करने वाली छात्रों की याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रवेश पात्रता के नियम और कट-ऑफ तय करना पूरी तरह से प्रशासनिक व नियामक संस्थाओं के विवेकाधिकार का विषय है, और अदालतें ऐसे निर्णयों के गुण-दोष में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं।
जस्टिस अनिल एस. किलोर और जस्टिस रजनीश आर. व्यास की खंडपीठ ने 21 सितंबर को यह फैसला सुनाया। पीठ ने रेखांकित किया कि रिट याचिका को विचारणीय बनाने के लिए याचिकाकर्ताओं को यह साबित करना आवश्यक होता है कि उनके किसी वैधानिक अधिकार का हनन हुआ है और संबंधित प्राधिकरण अपने कानूनी दायित्व को निभाने में विफल रहा है। अदालत ने पाया कि इस मामले में छात्र ऐसा कोई आधार सिद्ध नहीं कर सके।
विदेश और देश में मेडिकल शिक्षा के लिए एक समान मानक जरूरी
याचिकाकर्ता छात्रों का कहना था कि न्यूनतम कट-ऑफ हासिल न कर पाने के कारण वे न केवल भारत में, बल्कि विदेश में भी मेडिकल की पढ़ाई करने के अयोग्य हो गए हैं। इस दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि रेगुलेशन 9 के तहत देश और विदेश दोनों के लिए एक समान पात्रता अंक निर्धारित करने का उद्देश्य चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखना है।
अदालत ने टिप्पणी की कि जो छात्र विदेश जाकर चिकित्सा की डिग्री लेते हैं और बाद में भारत लौटकर प्रैक्टिस करते हैं, उनके स्वास्थ्य सेवा मानकों में कोई अंतर नहीं होना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता, इसलिए दोनों श्रेणियों के छात्रों के लिए समान मानक अनिवार्य हैं। उल्लेखनीय है कि विदेशी संस्थानों से एमबीबीएस करने के इच्छुक भारतीय छात्रों के लिए नीट-यूजी उत्तीर्ण करने की यह शर्त 2018 में लागू की गई थी।
री-एग्जाम में छात्रों की अनुपस्थिति और याचिकाकर्ताओं के तर्क
नीट-यूजी 2026 की मूल परीक्षा प्रश्नपत्र लीक के आरोपों के बाद रद्द कर दी गई थी, जिसके बाद 21 जून को री-एग्जाम कराया गया था। याचिकाकर्ता छात्रों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत और अधिवक्ता एम. डी. राउत ने पैरवी की। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि न्यूनतम कट-ऑफ अंकों की दोबारा गणना मूल परीक्षा में शामिल हुए छात्रों की कुल संख्या के अनुपात में की जाए।
छात्रों के वकीलों ने तर्क दिया कि पहली परीक्षा में अनुपस्थिति की दर केवल 3.27 प्रतिशत थी, जो 21 जून की दोबारा परीक्षा में उछलकर 12.27 प्रतिशत हो गई। इस परीक्षा में अनारक्षित सीटों के लिए न्यूनतम अर्हक अंक 213 और आरक्षित वर्ग के लिए 117 निर्धारित किए गए थे।
छात्रों का पक्ष था कि परीक्षा रद्द होने या दोबारा परीक्षा में छात्रों के अनुपस्थित रहने में उनकी कोई गलती नहीं थी। उन्होंने नियामक प्राधिकरण द्वारा 20 अगस्त को कट-ऑफ में छूट देने की मांग ठुकराए जाने को मनमाना करार दिया। छात्रों ने दलील दी कि यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में शामिल उच्च शिक्षा पाने के उनके अधिकार का उल्लंघन करता है।
प्राधिकरण के विवेकाधिकार में अदालत के दखल की सीमा
प्राधिकरण की ओर से पेश डिप्टी सॉलिसिटर जनरल के. एन. शुकुल और अधिवक्ता गौरव खटवानी ने याचिका की विचारणीयता का विरोध किया। उन्होंने कहा कि न्यूनतम अंकों में छूट देने का विवेकाधिकार केवल संबंधित संस्था के पास है और उसने इस अधिकार का विवेकपूर्ण इस्तेमाल किया है। इसके अलावा, अंकों में छूट का प्रावधान केवल तभी लागू किया जा सकता है जब किसी विशिष्ट श्रेणी में निर्धारित सीटों के लिए पर्याप्त संख्या में छात्र न्यूनतम अंक हासिल न कर पाए हों।
सरकारी पक्ष की दलील को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब कानून किसी नियामक संस्था को विवेकाधीन शक्तियां देता है, तो निर्णय लेने का दायित्व उसी संस्था का होता है, अदालत का नहीं। अदालत ने माना कि प्राधिकरण ने किसी वैधानिक कर्तव्य की अनदेखी नहीं की है और छात्रों के पक्ष में कोई विधिक अधिकार नहीं बनता। इन आधारों के साथ खंडपीठ ने याचिका खारिज कर दी।

