उत्तर प्रदेश में सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के तहत अपात्र लोगों को बांटे गए सार्वजनिक धन की धीमी वसूली पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि गलत तरीके से बांटी गई इस राशि की वसूली “प्रभावी और त्वरित” गति से सुनिश्चित की जाए।
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने 10 सितंबर को एक जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि इस मामले को पंचायती राज और समाज कल्याण विभागों के अपर मुख्य सचिवों या प्रमुख सचिवों के समक्ष रखा जाए, ताकि संबंधित अधिकारियों की निगरानी में अपात्रों से धन वापसी का काम बिना किसी देरी के पूरा कराया जा सके।
नोटिस जारी करने के लंबे सिलसिले पर हाईकोर्ट सख्त
प्रशासनिक सुस्ती पर गहरी नाराजगी जताते हुए खंडपीठ ने कहा कि अधिकारियों ने वर्ष 2019 में वसूली नोटिस जारी किए थे और अब इतने साल बीतने के बाद फिर से नए नोटिस जारी किए जा रहे हैं।
अदालत ने सवाल किया कि आखिर नोटिस भेजने का यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा। जजों ने कहा कि यह जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा है और इसकी रक्षा करना राज्य सरकार का संवैधानिक कर्तव्य है। यदि सरकार इस दायित्व को पूरा नहीं करती, तो प्रशासनिक निष्क्रियता के कारणों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अदालत ने साफ किया कि वसूली प्रक्रिया को आगे बढ़ाना और इसमें तेजी लाना सीधे तौर पर शासन का काम था, अदालत का नहीं। हाईकोर्ट ने इस मामले में केवल इसलिए दखल दिया क्योंकि सरकारी खजाने का पैसा उन लोगों को बांट दिया गया जो इसके हकदार नहीं थे।
आवास और पेंशन योजनाओं में गबन की पूरी जानकारी नदारद
हाईकोर्ट ने सरकार के जवाबी हलफनामे में अधूरी जानकारी दिए जाने पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की।
प्रधानमंत्री आवास योजना के मामले में अदालत ने दर्ज किया कि प्रशासन अब तक 9.60 लाख रुपये वसूल कर चुका है। हालांकि, हलफनामे में यह नहीं बताया गया कि इस योजना के तहत अपात्रों से कुल कितनी धनराशि की वसूली की जानी बाकी है।
इसी तरह की लापरवाही उत्तर प्रदेश सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना में भी पाई गई, जिसके तहत 99 अपात्र व्यक्तियों को पेंशन जारी कर दी गई थी। अदालत ने पाया कि सरकार के हलफनामे में न तो वसूली की कुल रकम का उल्लेख किया गया है और न ही यह बताया गया है कि अब तक कोई राशि वसूल हुई भी है या नहीं।
ग्राम पंचायत अधिकारी के खिलाफ जांच पर टिप्पणी से इनकार
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक ग्राम पंचायत अधिकारी के खिलाफ शुरू की गई विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी संज्ञान लिया।
रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पीठ ने पाया कि विभागीय जांच में संबंधित अधिकारी पर लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं हो सके। इस निष्कर्ष को देखते हुए हाईकोर्ट ने उक्त अधिकारी के संबंध में कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

