इलाहाबाद हाईकोर्ट ने औरैया में तीन बच्चों को नदी में डुबोकर मार डालने के मामले में मौत की सजा पाने वाली महिला और उम्रकैद की सजा भुगत रहे उसके देवर को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने 22 सितंबर को फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा दी गई दोनों सजाओं को निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन का पूरा ढांचा एक सिखाए-पढ़ाए गए और अंतर्विरोधों से भरे बाल गवाह के बयान, जांच की गंभीर खामियों तथा अहम सबूतों के अभाव पर टिका था। अदालत ने सावधानी के नियम (रूल ऑफ कॉशन) के तहत दोनों अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया, बशर्ते वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।
सिखाए-पढ़ाए गए बाल गवाह के बयान पर भरोसा करना असुरक्षित
हाईकोर्ट के इस फैसले का मुख्य आधार घटना में जीवित बचे आठ वर्षीय बड़े बेटे की गवाही रही, जिसे अभियोजन पक्ष ने अपना मुख्य चश्मदीद बनाया था। अदालत ने पाया कि बच्चे की गवाही न केवल अंतर्विरोधों से भरी थी, बल्कि उस पर बाहरी लोगों के सिखाने-पढ़ाने का साफ प्रभाव दिखाई दे रहा था।
पीठ ने रेखांकित किया कि छोटी उम्र के बच्चों पर जीवित रिश्तेदारों, पुलिसकर्मियों या गांव के प्रभावशाली लोगों का प्रभाव आसानी से पड़ जाता है और उन्हें अपनी मर्जी की कहानी दोहराने के लिए तैयार किया जा सकता है। इसलिए बाल गवाह के बयानों को अत्यधिक सावधानी और परख के साथ देखा जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि बच्चे का बयान काफी बनावटी था और उसमें वह स्वाभाविक आघात या पीड़ा नजर नहीं आई, जो अपनी मां के हाथों सगे भाइयों की मौत देखने वाले आठ साल के मासूम में होनी चाहिए थी। स्थापित कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि जब किसी बाल गवाह की गवाही की मूल बुनियाद ही दूसरों के सिखाने और विरोधाभासों से दूषित हो, तो ऐसे मौखिक बयान को पूरी तरह अविश्वसनीय मानकर खारिज करना अनिवार्य है।
जांच की गंभीर कमियां और ग्राम प्रधान को गवाह न बनाना अभियोजन पर पड़ा भारी
अदालत ने जांच एजेंसी और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष अदालत के समक्ष सर्वोत्तम उपलब्ध साक्ष्य पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा। इसके अलावा घटना की पहली जानकारी देने वाले प्रथम सूचनाकर्ता (पीडब्ल्यू-1) का बयान भी विश्वसनीय नहीं पाया गया।
फैसले में ग्राम प्रधान की गवाही न कराए जाने को सबसे बड़ी चूक माना गया। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस जांच ग्राम प्रधान द्वारा दी गई अर्जी के आधार पर ही शुरू हुई थी। ऐसे में मामले की शुरुआत कैसे हुई और घटना पहली बार किस तरह सामने आई, इसे साबित करने के लिए ग्राम प्रधान से पूछताछ करना सबसे अहम था। इस गवाह को अदालत में पेश न करने से अभियोजन के केस में एक ऐसी खाई बन गई, जिसे भरा नहीं जा सकता।
नदी से मिले थे तीन सगे भाइयों के शव
यह मामला 27 जून 2024 का है, जब औरैया जिले की एक नदी से तीन बच्चों के शव बरामद किए गए थे। अभियोजन के अनुसार, महिला अपने पति के छोटे भाई यानी देवर के साथ मिलकर अपने चारों बेटों को नदी किनारे ले गई थी और वहां उन्हें डुबोने का प्रयास किया था। दावा किया गया था कि आठ साल का सबसे बड़ा बेटा मरने का नाटक करके अपनी जान बचाने में सफल रहा और बाद में उसी ने पूरे मामले की जानकारी अधिकारियों को दी।
निचली अदालत ने बच्चे की इसी गवाही पर भरोसा करते हुए महिला को मृत्युदंड और उसके देवर को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन दोनों आरोपियों का दोष साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है, जिसके बाद दोनों को निर्दोष करार देकर रिहा करने का आदेश जारी किया गया।

