वकील अपने मुवक्किलों के हित के लिए नहीं दाखिल कर सकता जनहित याचिका; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दी ‘प्रोफेशनल मिसकंडक्ट’ की चेतावनी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक वकील द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि एक अधिवक्ता उन मुवक्किलों के हितों को आगे बढ़ाने के लिए जनहित याचिका नहीं दाखिल कर सकता, जिन्होंने उसे अपने कानूनी मामले संभालने के लिए अधिकृत किया है। चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि इस तरह का आचरण पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) की श्रेणी में आ सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका (जनहित याचिका संख्या 874/2026) फिरोजाबाद जिले के एक अभ्यासकर्ता वकील सुरेंद्र कुमार शर्मा द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने भारत सरकार और चार अन्य प्रतिवादियों को पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के आधार पर उद्योगों को प्राकृतिक गैस कनेक्शन देने का निर्देश देने की मांग की थी। इसके साथ ही, याचिका में 22 फरवरी 2026 को याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए आवेदन पर निर्णय लेने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया था।

याचिकाकर्ता का विवरण

सुनवाई के दौरान, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए अपने विवरण (Credentials) पर गौर किया। याचिका के पैराग्राफ 4 में वकील ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था:

“याचिकाकर्ता जिला-फिरोजाबाद में अभ्यासकर्ता वकील है और फिरोजाबाद स्थित कुछ उद्योगों का कानूनी सलाहकार है और फिरोजाबाद के उद्योगपतियों ने याचिकाकर्ता को औद्योगिक अधिकारियों के समक्ष औद्योगिक मामलों को संभालने के लिए अधिकृत किया है।”

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने पाया कि उद्योगों के साथ याचिकाकर्ता के पेशेवर संबंधों के खुलासे ने इस याचिका को ‘जनहित’ के दायरे से बाहर कर दिया है। खंडपीठ ने कहा कि “कानूनी सलाहकार” होने और उद्योगपतियों द्वारा मामलों को संभालने के लिए “अधिकृत” होने का दावा सीधे तौर पर जनहित याचिका की अवधारणा के विपरीत है।

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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

“एक अधिवक्ता द्वारा कथित तौर पर जनहित में इस दावे के साथ याचिका दायर करना कि वह कुछ उद्योगों का कानूनी सलाहकार है और उद्योगों ने उसे औद्योगिक अधिकारियों के समक्ष मामले संभालने के लिए अधिकृत किया है, अनिवार्य रूप से इस याचिका को जनहित के दायरे से बाहर कर देता है।”

अदालत ने कानूनी पेशे की नैतिक सीमाओं पर जोर देते हुए कहा:

“एक अधिवक्ता, जिसके पास उसके मुवक्किल शिकायत के निवारण के लिए आते हैं, उसे याचिकाकर्ता बनने और अपने मुवक्किलों के हितों को आगे बढ़ाने के लिए जनहित याचिका दायर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

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अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि हालांकि वकील का यह आचरण पेशेवर कदाचार की श्रेणी में आ सकता है, लेकिन इस बार अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए उदार रुख अपनाया। हालांकि, अदालत ने कड़ी चेतावनी जारी करते हुए कहा:

“यह आचरण पेशेवर कदाचार के समान हो सकता है, हालांकि, याचिकाकर्ता को भविष्य में इस तरह के साहसिक कार्य में शामिल न होने की चेतावनी के साथ, याचिका वापस लेने के आधार पर खारिज की जाती है।”

यह याचिका 8 अप्रैल, 2026 को वापस लेने के आधार पर खारिज कर दी गई।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: सुरेंद्र कुमार शर्मा बनाम भारत संघ एवं 4 अन्य
  • केस संख्या: जनहित याचिका (PIL) संख्या 874/2026 (2026:AHC:75890-DB)
  • पीठ: चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र
  • दिनांक: 8 अप्रैल, 2026

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