इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऑटोमेट्रिस्ट चयन में नियुक्तियों पर लगाई रोक; संविदा सेवा के वेटेज पर जवाब तलब

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश में ऑप्टोमेट्रिस्ट के पदों पर नियुक्ति पत्र जारी करने पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह आदेश 46 संविदा कर्मचारियों द्वारा दायर एक बहाल की गई रिट याचिका पर आया है। याचिकाकर्ता नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) के तहत अपनी दस साल की सेवा के बदले नियमित नियुक्तियों में वेटेज या वरीयता (preference) की मांग कर रहे हैं।

कानूनी मुद्दा और संक्षिप्त विवरण

मामले का मुख्य कानूनी विवाद यह है कि क्या NHM योजना के तहत कार्यरत संविदा ऑप्टोमेट्रिस्ट नियमित सरकारी नियुक्तियों में “वेटेज” या “वरीयता” के हकदार हैं। इससे पहले एक एकल पीठ ने ऐसे लाभ देने का निर्देश दिया था, लेकिन डिवीजन बेंच ने उस आदेश को रद्द करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया था। 10 अप्रैल, 2026 को जस्टिस राजीव सिंह ने नियुक्तियों को अंतिम रूप देने पर रोक लगा दी ताकि याचिकाकर्ताओं के दावों का अधिकार प्रभावित न हो।

विवाद की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता सुदीप शुक्ला और 45 अन्य, जिनका प्रतिनिधित्व अधिवक्ता आलोक मिश्रा कर रहे हैं, पिछले दस वर्षों से NHM के तहत संविदा पर ऑप्टोमेट्रिस्ट के रूप में कार्य कर रहे हैं। उन्होंने नियमितीकरण या वरीयता के लिए सबसे पहले रिट याचिका संख्या (A) 8621/2023 दायर की थी, जिसमें हाईकोर्ट ने उनके प्रत्यावेदन पर विचार करने का निर्देश दिया था।

21 नवंबर, 2023 को प्रमुख सचिव, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण ने उनके प्रत्यावेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि असिस्टेंट ऑप्टोमेट्रिस्ट सेवा नियमावली, 1993 में आयु सीमा में छूट या वरीयता का कोई प्रावधान नहीं है। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने रिट-ए संख्या 9881/2023 दायर की। 16 जनवरी, 2024 को एकल पीठ ने सीमा सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले के फैसले के आधार पर याचिकाकर्ताओं को वेटेज देने का निर्देश दिया था।

डिवीजन बेंच का विश्लेषण और रिमांड

राज्य सरकार ने एकल पीठ के आदेश को स्पेशल अपील संख्या 21/2026 के माध्यम से चुनौती दी। 10 फरवरी, 2026 को डिवीजन बेंच ने एकल पीठ के फैसले को रद्द कर दिया और टिप्पणी की कि “वेटेज” देने के कानूनी आधार पर पर्याप्त कारण नहीं बताए गए हैं। बेंच ने कहा:

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“यदि वेटेज दिया जाना है, तो एकल पीठ को ऐसे निर्देश जारी करने के आधार के रूप में कुछ कारण बताने चाहिए थे… जहाँ तक सीमा सिंह (सुप्रा) के फैसले का सवाल है… उसमें वेटेज नहीं दिया गया था बल्कि संविदा कर्मचारियों को वरीयता दी गई थी।”

डिवीजन बेंच ने रिट याचिका को बहाल करते हुए एकल पीठ को निर्देश दिया कि वह इस पर नए सिरे से विचार करे कि क्या कानून के तहत “वरीयता” (वेटेज के विकल्प के रूप में) का दावा स्वीकार्य है।

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पक्षकारों की दलीलें और हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाल ही में हुई सुनवाई के दौरान, हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनीं। प्रतिवादी संख्या 3 के वकीलों ने हाईकोर्ट को सूचित किया कि चयन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। उन्होंने दलील दी कि चूंकि पदों के लिए भेजी गई मांग (requisition) में वरीयता का कोई प्रावधान नहीं था, इसलिए याचिकाकर्ताओं को ऐसा कोई लाभ नहीं दिया गया है और अंतिम चयन सूची पहले ही नियुक्तियों के लिए सरकार को भेजी जा चुकी है।

राज्य (प्रतिवादी 1 और 2) की ओर से उपस्थित अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता (Additional Chief Standing Counsel) ने जवाबी हलफनामा (counter affidavit) दाखिल करने के लिए समय माँगा। वहीं, याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि चूंकि वे अभी भी कार्यरत हैं और चयन प्रक्रिया जारी है, इसलिए याचिका के लंबित रहने तक उनके अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए।

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हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने आयोग के इस बयान को संज्ञान में लिया कि परिणाम नियुक्तियों के लिए तैयार हैं। कानूनी मुद्दों पर बहस होने तक यथास्थिति बनाए रखने के लिए जस्टिस राजीव सिंह ने आदेश दिया:

“चूंकि याचिकाकर्ता अभी भी कार्यरत हैं, इसलिए प्रतिवादी संख्या 1 और 2 को निर्देशित किया जाता है कि वे अगली सुनवाई तक संबंधित चयन के संबंध में कोई भी नियुक्ति पत्र जारी न करें।”

हाईकोर्ट ने राज्य को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए समय दिया है और स्पष्ट किया है कि यदि अगली तारीख तक जवाब नहीं दाखिल किया गया, तो आवश्यक आदेश पारित किए जाएंगे। मामले की अगली सुनवाई 21 अप्रैल, 2026 को तय की गई है।

केस विवरण ब्लॉक

  • केस का शीर्षक: सुदीप शुक्ला और 45 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
  • केस संख्या: रिट-ए संख्या 9881/2023
  • बेंच: जस्टिस राजीव सिंह
  • दिनांक: 10 अप्रैल, 2026

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