इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को प्राप्त समय पूर्व रिहाई (रेमिशन) का अधिकार यद्यपि एक संप्रभु कार्यकारी शक्ति है, लेकिन इसका उपयोग मनमाने ढंग से या गलत तथ्यों के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने एक कैदी की समय से पहले रिहाई की अर्जी खारिज करने वाले उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश को रद्द करते हुए मामले पर एक महीने के भीतर नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश दिया है।
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने राम प्रताप सिंह नाम के कैदी द्वारा दायर याचिका पर यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता को फतेहपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 2002 में जानलेवा हमले के मामले में आईपीसी की धारा 307/34 के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल के सश्रम कारावास और ₹2,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट में 2019 में उसकी आपराधिक अपील खारिज हो गई थी और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी उसकी विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज कर दी थी।
सजा की गलत गणना पर रद्द हुआ खारिज करने का आदेश
कानूनी विवाद की शुरुआत 26 जून 2025 को जारी उस आदेश से हुई, जिसे उत्तर प्रदेश जेल प्रशासन एवं सुधार सेवाएं, लखनऊ के संयुक्त सचिव ने जारी किया था। इस आदेश के जरिए याचिकाकर्ता को सूचित किया गया था कि राज्यपाल ने अनुच्छेद 161 के तहत उसकी सजा माफ करने से इनकार कर दिया है।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि सरकार के फैसले में कैदी की जेल अवधि की गणना पूरी तरह गलत थी। सरकारी खारिज आदेश में दर्शाया गया था कि याचिकाकर्ता ने बिना छूट के केवल 2 साल और 6 दिन तथा छूट के साथ 2 साल, 1 महीना और 27 दिन ही जेल में बिताए हैं। जबकि, जेल की वास्तविक रिपोर्ट के अनुसार उसने बिना छूट के 4 साल, 6 महीने और 6 दिन तथा छूट मिलाकर 5 साल और 4 महीने की सजा पूरी कर ली थी। उसका आचरण भी संतोषजनक दर्ज था।
सितंबर 2022 में ही राम प्रताप सिंह की समय पूर्व रिहाई का प्रस्ताव जेल अधिकारियों और जिलाधिकारी, फतेहपुर को भेजा गया था, जो लंबित रहा। इसके बाद फरवरी 2025 में उसने एक नया आवेदन देकर फैसले की गुहार लगाई थी, जिसके जवाब में जून 2025 का यह त्रुटिपूर्ण खारिज आदेश जारी किया गया था।
कानूनी प्रावधान और हाईकोर्ट का रुख
अदालत ने ध्यान दिलाया कि ‘उत्तर प्रदेश बंदियों की प्रोबेशन पर रिहाई नियम, 1938’ के नियम 4 के उप-नियम (iii) के तहत संबंधित श्रेणी का कैदी बिना छूट के अपनी कुल सजा का एक-तिहाई हिस्सा पूरा करने के बाद समय से पहले रिहाई के लिए योग्य हो जाता है।
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि भले ही अनुच्छेद 161 के तहत शक्ति एक संवैधानिक शक्ति है—जो दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 432 के तहत राज्य सरकार की वैधानिक शक्ति से भिन्न है—लेकिन ऐसा फैसला मनमाना या वास्तविक सजा की अवधि जैसी महत्वपूर्ण तथ्यात्मक गलती पर आधारित नहीं होना चाहिए।
अदालत ने माना कि यदि अधिकारियों के समक्ष सही आंकड़े रखे गए होते, तो परिणाम अलग हो सकता था। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 26 जून 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया। राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह 10 अगस्त के अदालती आदेश की प्रति मिलने के एक महीने के भीतर याचिकाकर्ता की समय से पहले रिहाई पर नए सिरे से निर्णय ले।

