अयोध्या राम मंदिर के पास जमीन विवाद: हाईकोर्ट का यूपी सरकार को 1.20 करोड़ रुपये 8% ब्याज संग जमा करने का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अयोध्या में राम जन्मभूमि परिसर से सटी मंदिर की जमीन के बकाया भुगतान के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह 1.20 करोड़ रुपये की बकाया राशि 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ चार सप्ताह के भीतर स्थानीय सिविल कोर्ट के नाम पर किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में जमा कराए। इस राशि का अंतिम निपटारा जमीन के स्वामित्व से जुड़े लंबित दीवानी मुकदमे के फैसले पर निर्भर करेगा।

प्रशासन की जल्दबाजी और रवैये पर सख्त टिप्पणी

जस्टिस शेखर बी. सर्राफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने 11 अगस्त को श्री ठाकुर राम जानकी सुग्रीवजी विराजमान मंदिर द्वारा दायर याचिका पर यह फैसला सुनाया। पीठ ने वर्ष 2023 के अंत में सुग्रीव किला स्थित 1,512 वर्ग मीटर जमीन का भौतिक कब्जा लेने के बाद तय राशि न चुकाने पर राज्य सरकार के अधिकारियों की कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना की।

अदालत ने कहा कि बिना भुगतान किए जमीन का कब्जा लेना और बाद में अपना रुख बदलकर जमीन को सरकारी नजूल संपत्ति बता देना न तो निष्पक्ष है, न उचित और न ही तर्कसंगत। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह फिलहाल मालिकाना हक का फैसला नहीं कर रहा है। टाइटल से जुड़े कानूनी प्रश्नों का निर्धारण दीवानी अदालत में साक्ष्यों और पूर्ण सुनवाई के बाद ही संभव है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि वर्ष 2024 में दाखिल इस सिविल मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाई जाए और अधिमानतः एक वर्ष के भीतर इसे पूरा किया जाए।

वित्तीय शर्तें और बकाए का पूरा ब्योरा

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यह विवाद 22 दिसंबर 2023 को निष्पादित एक पंजीकृत बिक्री विलेख से उत्पन्न हुआ है, जो खसरा संख्या 246 और खाता संख्या 44/2 की जमीन से संबंधित है। इस सौदे की कुल तय राशि 1,38,44,559 रुपये थी। इसमें से जमीन पर मौजूद निर्मित संरचनाओं के मद में 17,48,559 रुपये का भुगतान सरकार ने कर दिया था, लेकिन मुख्य भूमि के मूल्य के रूप में निर्धारित 1,20,96,000 रुपये का भुगतान नहीं किया गया।

याचिकाकर्ता मंदिर ट्रस्ट के अनुसार, सरकारी अधिकारियों ने आश्वासन दिया था कि बिक्री विलेख निष्पादन के 15 दिनों के भीतर शेष राशि आरटीजीएस (RTGS) के माध्यम से बैंक खाते में भेज दी जाएगी। इस वादे पर भरोसा करते हुए मंदिर प्रबंधन ने तुरंत कब्जा सौंप दिया था। अदालत के आदेश के अनुसार, 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की गणना 22 दिसंबर 2023 की बिक्री विलेख की तारीख के 15 दिन बीतने के बाद से लेकर बैंक में राशि जमा होने के दिन तक की जाएगी।

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मालिकान हक को लेकर दोनों पक्षों के तर्क

मंदिर ट्रस्ट का पक्ष है कि वर्ष 1858 से लगातार चले आ रहे राजस्व बंदोबस्त दस्तावेजों में उसका मालिकाना हक दर्ज है। दूसरी ओर, राज्य सरकार का कहना है कि मंदिर के पास इस संपत्ति को बेचने का विधिक अधिकार नहीं था और यह जमीन वास्तव में सरकारी नजूल भूमि है। इसी आधार पर सरकार ने इस बिक्री विलेख को रद्द कराने के लिए सक्षम दीवानी अदालत में मुकदमा भी दायर कर रखा है।

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