721 दिनों की अकारण देरी पर बिल्डर की अपील खारिज, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाया 2.5 लाख रुपये का हर्ज़ाना और 24% ब्याज का आदेश रखा बरकरार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में जस्टिस प्रशांत कुमार की एकल पीठ ने रियल एस्टेट डेवलपर मैसर्स एम्स मैक्स गार्डेनिया डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड की ओर से दाखिल रेरा (RERA) अपील को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निष्क्रियता और लापरवाही को गैर-पैरवी के कारण खारिज हुई अपील की बहाली में 721 दिनों की देरी माफ करने के लिए “पर्याप्त कारण” नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट अपीलीय ट्रिब्यूनल के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें बिल्डर की रिकॉल अर्ज़ी खारिज कर दी गई थी। इसके साथ ही रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) के उस आदेश को भी बरकरार रखा गया, जिसमें प्रमोटर को होमबायर श्रीमती प्रतिभा गुप्ता को तुरंत फ्लैट का पज़ेशन देने और देरी के लिए 24% वार्षिक दर से ब्याज भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। 13 वर्षों के दौरान बिल्डर द्वारा होमबायर को सात दौर की मुकदमेबाजी में घसीटने पर कड़ा रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता बिल्डर पर 2,50,000 रुपये का भारी हर्ज़ाना भी लगाया।

मामले का बैकग्राउंड

9 अप्रैल 2011 को होमबायर श्रीमती प्रतिभा गुप्ता ने गौतम बुद्ध नगर के सेक्टर-75 स्थित ‘गोल्फ सिटी’ नामक प्रोजेक्ट में 1,150 वर्ग फीट का एक फ्लैट (संख्या C3-402) बुक किया था। बिल्डर-बायर एग्रीमेंट के तहत फ्लैट की कुल कीमत 34,44,250 रुपये तय की गई थी और बिल्डर ने जून 2013 तक पज़ेशन देने का वादा किया था। होमबायर ने बिल्डर की मांग पर कुल 35,90,252 रुपये का भुगतान कर दिया, लेकिन इसके बावजूद बिल्डर ने तय सीमा में फ्लैट का पज़ेशन नहीं दिया।

देरी से व्यथित होकर होमबायर ने रेरा, गौतम बुद्ध नगर के समक्ष शिकायत संख्या 320188450 दर्ज कराई। 26 जुलाई 2018 को रेरा ने बिल्डर को निर्देश दिया कि वह तुरंत फ्लैट का पज़ेशन सौंपे और 30 जून 2013 से पज़ेशन में हुई देरी के लिए 24% वार्षिक दर से ब्याज का भुगतान करे।

जब बिल्डर ने आदेश का पालन नहीं किया, तो होमबायर ने 30 अक्टूबर 2018 को निष्पादन (निष्पादन कार्यवाहियां) याचिका दाखिल की, जिसके बाद 6 मार्च 2019 को 41,21,411.88 रुपये का रिकवरी सर्टिफिकेट जारी किया गया। रिकवरी सर्टिफिकेट जारी होने के बाद बिल्डर ने 234 दिनों की देरी के साथ 16 मई 2019 को यू.पी. रियल एस्टेट अपीलीय ट्रिब्यूनल (REAT) में अपील (विविध मामला संख्या 170 / 2019) दायर की। इसके साथ ही बिल्डर ने रिकवरी पर रोक लगाने की मांग को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका (रिट-सी संख्या 17549 / 2019) भी दाखिल की, जिसे हाईकोर्ट ने 23 मई 2019 को खारिज कर दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP C No. 14282 / 2019) को भी 8 जुलाई 2019 को वापस लेने के आधार पर खारिज कर दिया गया।

अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष बिल्डर के वकील के अनुपस्थित रहने के कारण अपील को बार-बार गैर-पैरवी (non-prosecution) में खारिज किया गया—पहली बार 5 सितंबर 2019 को (जिसे 7 नवंबर 2019 को बहाल किया गया), दूसरी बार 7 फरवरी 2020 को (जिसे उसी दिन बहाल किया गया), और अंततः 10 जुलाई 2020 को खारिज कर दिया गया। ट्रिब्यूनल रजिस्ट्री द्वारा 14 जुलाई 2020 को ईमेल के माध्यम से पक्षों को निरस्तीकरण आदेश भेजा गया था।

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रिकवरी आदेश को लागू कराने के लिए होमबायर ने हाईकोर्ट में याचिका (रिट-सी संख्या 27934 / 2021) दाखिल की। हाईकोर्ट ने 10 नवंबर 2021 को जिला मजिस्ट्रेट, गौतम बुद्ध नगर को एक महीने के भीतर रिकवरी सर्टिफिकेट की तामील कराने का निर्देश दिया। बिल्डर ने इस आदेश के खिलाफ समीक्षा याचिका दाखिल की, जिसे हाईकोर्ट ने 25 फरवरी 2022 को पैरवी न करने के कारण खारिज कर दिया। 8 अप्रैल 2022 को जारी नए रिकवरी सर्टिफिकेट और होमबायर द्वारा दायर अवमानना याचिका के बाद जिला मजिस्ट्रेट ने बिल्डर के बैंक खाते अटैच कर दिए। इसके बाद बिल्डर ने 13 दिसंबर 2022 को डिमांड ड्राफ्ट के जरिए 67,77,518 रुपये जमा कराए।

इस बीच, 28 अगस्त 2022 को—पूरे 721 दिनों की देरी के बाद—बिल्डर ने 10 जुलाई 2020 के निरस्तीकरण आदेश को वापस लेने (रिकॉल) के लिए ट्रिब्यूनल में आवेदन दिया। ट्रिब्यूनल ने 14 सितंबर 2022 को देरी माफ करने और रिकॉल करने की अर्ज़ी को खारिज कर दिया। इससे असंतुष्ट होकर बिल्डर ने रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 2016 की धारा 58 के तहत हाईकोर्ट में यह अपील दायर की।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता बिल्डर की ओर से अधिवक्ता शुचिता सिंह ने तर्क दिया कि बहाली अर्ज़ी दाखिल करने में हुई देरी न तो जानबूझकर थी और न ही दुर्भावनापूर्ण। उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी के कारण नियमित कामकाज बाधित हुआ था और मामला “नज़र से ओझल” हो गया था। उन्होंने दावा किया कि पज़ेशन 8 जुलाई 2017 को ही फिट-आउट के काम के लिए सौंप दिया गया था, जब अंतिम किश्त चुकाई गई थी। यह भी दलील दी गई कि अधिनियम की धारा 43(5) के तहत पूर्व-जमा (pre-deposit) की शर्त 7 नवंबर 2019 को पूरी कर ली गई थी, और रेरा द्वारा निर्धारित 24% ब्याज दर अत्यधिक है जो अधिनियम की धारा 18 सहपठित धारा 2(za) के प्रतिकूल है, जिसमें MCLR + 1% ब्याज का प्रावधान है।

उत्तरदाता होमबायर की ओर से अधिवक्ता अपराजिता बंसल और श्री अनिलेश तिवारी ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि वास्तव में वैधानिक पज़ेशन कभी दिया ही नहीं गया क्योंकि बिल्डर के पास ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) नहीं था और फ्लैट तैयार नहीं था। उन्होंने कहा कि दबाव में आकर फिट-आउट के लिए दस्तखत किए गए प्रस्ताव को कानूनन पज़ेशन नहीं माना जा सकता। इसके लिए उन्होंने पायनियर अर्बन लैंड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम गोविंदम राघवन और लखनऊ विकास प्राधिकरण बनाम सुषमा शुक्ला के फैसलों का हवाला दिया। काउंसिल ने जोर देकर कहा कि ट्रिब्यूनल का आदेश धारा 44(4) के तहत ईमेल द्वारा भेजा गया था और उसके पोर्टल पर भी डाला गया था। चंडी प्रसाद बनाम जगदीश प्रसाद का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि विलय का सिद्धांत (doctrine of merger) यहां लागू नहीं होता क्योंकि ट्रिब्यूनल ने अपील को गुण-दोष के आधार पर नहीं, बल्कि गैर-पैरवी और देरी के आधार पर खारिज किया था।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस प्रशांत कुमार ने अपील में उठाए गए तीन मुख्य कानूनी प्रश्नों पर विचार किया: क्या कोविड-19 की रुकावटें पर्याप्त कारण थीं, क्या महामारी के दौरान ट्रिब्यूनल द्वारा अपील खारिज करना उचित था, और क्या धारा 44(4) के तहत वैधानिक सूचना के प्रावधान पूरे किए गए थे।

सीमा अधिनियम (Limitation Act) की धारा 5 के तहत देरी की माफी के सिद्धांत का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि उचित कारण साबित करने की जिम्मेदारी आवेदक पर होती है। रामलाल बनाम रीवा कोलफील्ड्स लिमिटेड का हवाला देते हुए कोर्ट ने नोट किया कि विवेकाधिकार का उपयोग करने के लिए पर्याप्त कारण का प्रमाण एक पूर्व शर्त है। देरी की प्रवृत्तियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए कोर्ट ने मणीबेन देवराज शाह बनाम म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ ग्रेटर मुंबई, चेन्नई मेट्रोपॉलिटन वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम टी.टी. मुरली बाबू, पाथापति सुब्बा रेड्डी बनाम कलेक्टर (एलए), और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम जहांगीर बहरामजी जीजीभॉय के मामलों का उल्लेख किया और कहा:

“हमें अपीलकर्ताओं की सनक और मर्जी पर छोड़ कर प्रतिवादी के सिर पर अनिश्चित काल के लिए ‘डेमोकल्स की तलवार’ नहीं लटकाए रखनी चाहिए।”

“हालांकि, अदालतों को घोर लापरवाही, जानबूझकर की गई निष्क्रियता या उदासीनता को माफ नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से उस सिद्धांत की नींव कमजोर होगी जिसका उद्देश्य मुकदमों का अंत करना और कानून में निश्चितता लाना है।”

कोर्ट ने माना कि सुप्रीम कोर्ट के In Re: Cognizance for Extension of Limitation के आदेश के तहत 15 मार्च 2020 से 28 फरवरी 2022 तक की अवधि को हटा देने के बाद भी बिल्डर उचित तत्परता दिखाने में विफल रहा। रिकवरी अधिकारी के आने तक मामला “नज़र से ओझल” रहने का बहाना कानून में पर्याप्त कारण नहीं बनता। नरेंद्र बनाम अजाबराव का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने बहाली आवेदन को सही खारिज किया था।

RERA अधिनियम की धारा 44(4) के संबंध में कोर्ट ने माना कि ट्रिब्यूनल ने 1 जून 2020 को सार्वजनिक सूचना जारी की थी, अपना पोर्टल अपडेट किया था और 14 जुलाई 2020 को ईमेल से आदेश भेजे थे, जिससे वैधानिक सूचना संबंधी दायित्व पूरी तरह पूरे हुए थे।

पज़ेशन और ब्याज के गुण-दोष पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट के अभाव में औपचारिक पज़ेशन कानूनी रूप से नहीं दिया जा सकता। दबाव में हस्ताक्षरित एकतरफा करार की शर्तें शुरुआत से ही अमान्य (void ab initio) होती हैं। 9 अप्रैल 2011 के बिल्डर-बायर एग्रीमेंट की क्लॉज 19 का अवलोकन करते हुए कोर्ट ने पाया कि बिल्डर खुद होमबायर की चूक पर 24% दंडात्मक ब्याज वसूलता था। अधिनियम की धारा 2(za) के तहत प्रमोटर द्वारा देय ब्याज वही होगा जो डिफ़ॉल्ट के मामले में ऑलॉटी से वसूला जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय न्यूटेक प्रमोटर्स एंड डेवलपर्स (पी) लिमिटेड बनाम यूपी राज्य तथा जय महाकाली रोलिंग मिल्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, शांति कंडक्टर्स (पी) लिमिटेड बनाम असम SEB, और विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 18 के तहत ब्याज के प्रावधान क्षतिपूर्ति (compensatory) प्रकृति के हैं और अनुबंध की शर्तें वैधानिक दायित्वों को निष्प्रभावी नहीं कर सकतीं।

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कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने RERA अपील संख्या 1 / 2023 को खारिज करते हुए यू.पी. रियल एस्टेट अपीलीय ट्रिब्यूनल के 10 जुलाई 2020 व 14 सितंबर 2022 के आदेशों और RERA के 26 जुलाई 2018 के आदेश में कोई अवैधता या त्रुटि नहीं पाई।

यह देखते हुए कि लगभग पूरी राशि प्राप्त करने के बावजूद बिल्डर ने होमबायर को 13 वर्षों में सात दौर की मुकदमेबाजी में घसीटा, कोर्ट ने टिप्पणी की:

“वर्तमान मामला एक ऐसे होमबायर का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसने अपने सिर पर छत की उम्मीद में अपनी जीवन भर की कमाई का निवेश कर दिया।”

जस्टिस ब्रेनन के शब्दों को उद्धृत करते हुए कोर्ट ने कहा:

“मानव हृदय में अन्याय की कड़वी भावना से अधिक कुछ नहीं चुभता। बीमारी को हम सहन कर सकते हैं। लेकिन अन्याय हमें व्यवस्था को ध्वस्त करने पर मजबूर कर देता है। जब केवल अमीर ही कानून का एक संदिग्ध विलासिता के रूप में आनंद ले सकते हैं, और गरीब—जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है—अपनी पहुंच से बाहर खर्च के कारण इसे प्राप्त नहीं कर सकते, तो स्वतंत्र लोकतंत्र के अस्तित्व को खतरा काल्पनिक नहीं बल्कि बहुत वास्तविक है, क्योंकि लोकतंत्र का जीवन ही न्याय की प्रणाली को इतना प्रभावी बनाने पर निर्भर करता है कि हर नागरिक इसकी निष्पक्षता और न्याय पर विश्वास कर सके और उसका लाभ उठा सके।”

व्यर्थ मुकदमों पर रोक लगाने हेतु भुसावल म्यूनिसिपल काउंसिल बनाम निवृत्ति रामचंद्र फालक, सुब्रत रॉय सहारा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, फूल चंद्र बनाम यूपी राज्य, वरिंदरपाल सिंह बनाम एम.आर. शर्मा, रामरामेश्वरी देवी बनाम निर्मला देवी, गुड़गांव ग्रामीण बैंक बनाम खजानी, और मनोज कुमार बनाम यूपी राज्य का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता बिल्डर को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर उत्तरदाता होमबायर को 2,50,000 रुपये का हर्ज़ाना अदा करे।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मैसर्स एम्स मैक्स गार्डेनिया डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम श्रीमती प्रतिभा गुप्ता
वाद संख्या: रेरा अपील संख्या – 1 / 2023
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार
निर्णय की तिथि: 31 जुलाई 2026

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