नोएडा छात्र हिरासत मामला: डीएम मेधा रूपम पर लगे 5 लाख जुर्माने और हाईकोर्ट की टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत एक छात्रा को हिरासत में लेने के मामले में गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम के वेतन से 5 लाख रुपये मुआवजा वसूलने का निर्देश दिया गया था। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने छात्रा की हिरासत रद्द करने के हाईकोर्ट के आदेश और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ की गई कड़ी टिप्पणियों के अमल पर भी रोक लगा दी है।

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने जिलाधिकारी मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। पीठ ने मामले में नोटिस जारी किया है और हाईकोर्ट के फैसले के पैरा 27 से 33 तक के निर्देशों पर अगली सुनवाई यानी 7 अक्टूबर तक के लिए रोक लगा दी है।

अदालत में कानूनी दलीलें

वर्चुअल माध्यम से हुई संक्षिप्त सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जिलाधिकारी का पक्ष रखा, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने उत्तर प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व किया। वहीं हिरासत में ली गई छात्रा आकृति चौधरी की ओर से कैविएट पर वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस पेश हुए। दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंस की आवाज म्यूट करते हुए अंतरिम निर्देश दर्ज कराए। पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक मामले की मेरिट के आधार पर पूरी सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक विवादित फैसले के संबंधित हिस्सों पर रोक प्रभावी रहेगी।

हाईकोर्ट का सख्त रुख और मुआवजा आदेश

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ जिम्नास्टिक फेडरेशन ऑफ इंडिया की याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया

यह पूरा विवाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2 सितंबर के फैसले के बाद सामने आया। हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक 25 वर्षीय छात्रा आकृति चौधरी की बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका स्वीकार करते हुए उनकी एनएसए हिरासत को रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि छात्रा को हिरासत में लेने के लिए प्रशासन ने एक “मनगढ़ंत” कहानी तैयार की थी। साथ ही निर्देश दिया था कि यदि छात्रा किसी अन्य मामले में वांछित न हो, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।

हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी द्वारा हिरासत आदेश जारी करने के तरीके की तीखी आलोचना की थी। अदालत ने आगाह किया था कि बेलगाम नौकरशाही का ऐसा “निरंकुश” आचरण उत्तर प्रदेश को एक दमनकारी व्यवस्था (ऑरवेलियन डिस्टोपिया) की ओर धकेल सकता है। इसी के तहत अदालत ने छात्रा को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने और यह राशि आदेश जारी करने वाली डीएम मेधा रूपम के साथ-साथ मामले से जुड़े पुलिस अधिकारियों और एसएचओ तक के वेतन से वसूलने का आदेश सुनाया था। इसके अतिरिक्त संबंधित अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में अदालत की नाराजगी दर्ज करने का भी निर्देश दिया गया था।

READ ALSO  SC Declines to Stay Proceedings Against Gautam Gambhir Foundation, Lodged For Hoarding of COVID19 Medicines

संविधान के प्रति निष्ठा पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए थे। अदालत ने कहा था कि अधिकारियों को असीम शक्तियां इसलिए सौंपी जाती हैं ताकि वे नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों, कानूनी अधिकारों, गरिमा, सम्मान और कल्याण की रक्षा कर सकें।

अदालत ने जोर देकर कहा था कि नौकरशाहों को यह हमेशा याद रखना चाहिए कि उनकी “निष्ठा संविधान के प्रति है, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति।” इसके अलावा यह भी याद दिलाया गया था कि लोकतंत्र में जनता ही “मालिक” होती है और अधिकारी उनकी सेवा के लिए तैनात सेवक मात्र हैं।

प्रदर्शन से लेकर कानूनी लड़ाई तक का घटनाक्रम

READ ALSO  कोर्ट के पास निहित शक्ति है कि वह उस समय को बढ़ा सकता है जो उसने एक कार्य करने के लिए शुरू में तय किया था: हाईकोर्ट

आकृति चौधरी को अप्रैल महीने में नोएडा में कामगारों द्वारा वेतन वृद्धि की मांग को लेकर किए गए विरोध प्रदर्शन से जुड़े मुकदमों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। बाद में 13 मई को उत्तर प्रदेश पुलिस ने उनके और एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकार सत्य वर्मा के खिलाफ एनएसए के तहत कार्रवाई की थी। इस आंदोलन के सिलसिले में कई अन्य कार्यकर्ताओं को भी हिरासत में लिया गया था।

हाईकोर्ट द्वारा हिरासत आदेश रद्द किए जाने के बाद 9 सितंबर को सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया था कि राज्य सरकार इस फैसले को चुनौती देगी, जिसके बाद बुधवार को शीर्ष अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles