इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक पांच वर्षीय बच्ची की कस्टडी अंतरिम रूप से उसके पिता को सौंप दी है। कोर्ट ने पाया कि मां ने बच्ची को अपने पिता के खिलाफ यौन शोषण और शारीरिक मारपीट के झूठे आरोप लगाने के लिए गंभीर रूप से सिखाया-पढ़ाकर तैयार किया था। एकल पीठ के जस्टिस संदीप जैन ने यह अंतरिम आदेश जारी करते हुए टिप्पणी की कि इतनी कम उम्र के बच्चे को माता-पिता के आपसी वैवाहिक विवादों में मोहरे की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, और मां के पास बच्ची का लगातार रहना उसके मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य के लिए बिल्कुल भी अनुकूल नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला पिता द्वारा दायर की गई एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका के जरिए हाईकोर्ट के समक्ष आया था। इस याचिका में पिता ने अपनी नाबालिग बेटी की कस्टडी उसकी मां (जो मामले में प्रतिवादी संख्या 4 हैं) से वापस दिलाने की मांग की थी। यह दूसरी बार है जब पिता ने कस्टडी के लिए अदालत का रुख किया है।
इससे पहले, पिता ने साल 2025 में भी एक हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की थी, जिसका निस्तारण 11 अगस्त 2025 को किया गया था। उस याचिका में कोर्ट ने पिता को हर रविवार सुबह 10:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी बेटी से बातचीत करने और मिलने का अधिकार दिया था।
दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता (पिता) की ओर से पेश वकील देवांग सावला, जिन्हें उत्कर्ष श्रीवास्तव और शुभ मित्तल द्वारा सहयोग प्रदान किया गया, ने तर्क दिया कि वीडियो कॉल के जरिए मिलने के पिछले आदेश का कोई मतलब नहीं रह गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि मां और अन्य निजी प्रतिवादियों ने इस बातचीत को रोकने के लिए लगातार बाधाएं और अड़चनें खड़ी कीं। इसके अलावा, पिता के वकीलों ने दलील दी कि नाबालिग बच्ची को उसकी मां द्वारा ऐसी आपत्तिजनक और यौन बातें बोलना सिखाया जा रहा है, जो उसकी उम्र और तार्किक समझ से कोसों दूर हैं। उन्होंने कहा कि यदि बच्ची निजी प्रतिवादियों की कस्टडी में रही, तो उसका भविष्य पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा, इसलिए उसके बेहतर भविष्य के लिए अंतरिम कस्टडी पिता को सौंपी जानी चाहिए।
दूसरी ओर, मां और अन्य निजी प्रतिवादियों की ओर से पेश सरकारी अधिवक्ता अंजू शुक्ला और वकील शैलेश पांडे ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि पति और पत्नी के बीच गंभीर वैवाहिक विवाद हैं, जिसके कारण वे साथ नहीं रह सकते। उन्होंने पिता द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह से निराधार और झूठा बताया। बच्ची की बेहद कम उम्र का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कानूनी तौर पर कस्टडी मां के पास ही रहनी चाहिए।
कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
बच्ची की वास्तविक मानसिक स्थिति को समझने के लिए कोर्ट ने स्वयं पांच वर्षीय नाबालिग बच्ची से सीधे बातचीत की। इस बातचीत के दौरान, बच्ची ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह अपने पिता के साथ नहीं रहना चाहती। उसने आरोप लगाया कि उसके पिता ने उसके और उसकी मां के साथ मारपीट की थी और उसका यौन शोषण भी किया था।
हालांकि, कोर्ट ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया और इन्हें मां द्वारा बच्ची को गंभीरता से सिखाने-पढ़ाने (ट्यूटर करने) का परिणाम माना। कोर्ट ने रेखांकित किया कि बच्ची द्वारा जिस तरह के जटिल आरोप लगाए गए, वे उसकी उम्र की समझ और मानसिक विकास के बिल्कुल विपरीत थे।
अदालत ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा:
“यह स्पष्ट है कि बच्ची को उसकी मां द्वारा बहुत अधिक सिखाया-पढ़ाकर तैयार किया गया है, इसलिए उसके इस कथन पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं किया जा सकता कि उसके पिता ने उसका यौन शोषण किया था।”
दंपति के आपसी विवाद में बच्चे की दयनीय स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कोर्ट ने आगे कहा:
“यह पूरी तरह से साफ है कि बच्ची की कम उम्र को देखते हुए, उसे पति-पत्नी की लड़ाई में मोहरे की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन प्रतिवादी ने उसे एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया है।”
कोर्ट ने माना कि नाबालिग बच्ची को उसकी मां के पास छोड़ने से उसके मानसिक स्वास्थ्य और विकास पर बेहद बुरा असर पड़ेगा। अदालत ने कहा:
“यदि वह प्रतिवादी संख्या 4 के पास रहती है, तो यह उसके कल्याण के लिए ठीक नहीं है, क्योंकि यदि वह लगातार उसकी कस्टडी में रहती है, तो वह निश्चित रूप से बिगड़ जाएगी।”
कोर्ट का निर्णय
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई तक बच्ची की अंतरिम कस्टडी उसके पिता को सौंपने का आदेश दिया।
साथ ही, मां के संपर्क को बनाए रखने के लिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि वह बच्ची से मिलने के लिए पिता के आवास पर जा सकती हैं। इसके अलावा, वह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भी अपनी बेटी से बातचीत कर सकती हैं, जिसे सुचारू रूप से चलाने का पूरा भरोसा पिता ने कोर्ट को दिया है।
अदालत ने इस मामले को विशेष रूप से अपने पास आंशिक रूप से सुने गए (पार्ट-हर्ड) मामले के रूप में सुरक्षित रखते हुए अगली सुनवाई के लिए 17 अगस्त 2026 की तिथि तय की है। अगली सुनवाई के दिन पिता को बच्ची के साथ व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होना होगा। अदालत ने राज्य और पुलिस अधिकारियों (प्रतिवादी संख्या 2 और 3) को यात्रा के दौरान पिता और बच्ची की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: रिद्धि जायसवाल माइनर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य
वाद संख्या: बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका संख्या 759/2026
पीठ: जस्टिस संदीप जैन
निर्णय की तिथि: 9 जुलाई, 2026

