सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब विश्वसनीय चश्मदीद गवाह घटना के समय के बारे में स्पष्ट बयान देते हैं, तो पेट में मौजूद भोजन के पाचन के आधार पर लगाए गए अनुमान से उनकी गवाही खारिज नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कर्नाटक के 2001 के दोहरे हत्याकांड में आरोपियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखते हुए ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को पलटने वाले हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराया।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने पाया कि मृतकों की पत्नियां घटना की स्वाभाविक और विश्वसनीय चश्मदीद गवाह थीं। उनके बयानों की पुष्टि मेडिकल साक्ष्यों से भी होती थी।
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की अपील खारिज करते हुए उन्हें तत्काल आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
पाचन प्रक्रिया के अनुमान से घटना का समय तय नहीं किया जा सकता
मामले में ट्रायल कोर्ट ने पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर (PW-19) के एक जवाब के आधार पर आरोपियों को बरी किया था।
डॉक्टर ने अदालत के सवाल पर पेट में मौजूद भोजन के आधार पर कहा था कि गुलप्पा की मृत्यु मल्लप्पा की मृत्यु से चार घंटे बाद हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट से सहमति जताई कि डॉक्टर के इस एक जवाब को आरोपियों को बरी करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
बेंच ने Nihal Singh vs State of Punjab और Shivaji Sahabrao Bobade vs State of Maharashtra के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा:
“जब रिकॉर्ड पर स्वीकार्य चश्मदीद गवाह मौजूद हों, जो घटना के समय के बारे में स्पष्ट बयान दे रहे हों, तब केवल पाचन के समय की संभावनाओं के आधार पर कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। किसी भी स्थिति में मौखिक साक्ष्य को खारिज करने का यह एकमात्र आधार नहीं हो सकता।”
बचाव पक्ष की दलील पर कोर्ट ने टिप्पणी की:
“पाचन की अनिश्चित प्रक्रिया का सहारा लेकर अभियोजन के मामले पर संदेह पैदा करने का प्रयास, इस मामले के तथ्यों में, अपने आप में ऐसी दलील है जिसे पचाना बहुत कठिन है।”
मृतकों की पत्नियों को पक्षपाती गवाह मानने से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मल्लप्पा की पत्नी डोड्डासिद्दव्वा (PW-17) और गुलप्पा की पत्नी सिद्दव्वा (PW-18) घटना की स्वाभाविक गवाह थीं।
दोनों आरोपी व्यक्तियों को पहले से जानती थीं और उन्होंने प्रत्येक आरोपी की भूमिका के बारे में स्पष्ट बयान दिया था।
बेंच ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने गवाहों के बयानों में मामूली विरोधाभासों को अनावश्यक महत्व दिया था।
कोर्ट ने कहा:
“ट्रायल कोर्ट ने ऐसे मामूली विरोधाभासों पर जरूरत से ज्यादा जोर दिया, जिनका कोई महत्व नहीं था।”
मृतकों से पारिवारिक संबंध होने के कारण गवाहों को पक्षपाती बताने की दलील भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी।
बेंच ने कहा:
“यह स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि केवल किसी गवाह के रिश्तेदार होने से उसे हितबद्ध या पक्षपाती गवाह नहीं माना जा सकता।”
बैल और बकरी के विवाद में दो भाइयों की हुई थी हत्या
अभियोजन के अनुसार, कर्नाटक के बेलावाटगी गांव में 8 और 9 सितंबर 2001 की दरमियानी रात करीब एक बजे मल्लप्पा और गुलप्पा पर कुल्हाड़ियों से हमला किया गया था।
विवाद की शुरुआत रुद्रप्पा (आरोपी संख्या 2) के बैल द्वारा नागप्पा (PW-25) की बकरी को सींग मारने से हुई थी।
मृतक भाइयों ने इस विवाद में नागप्पा का पक्ष लिया था।
घटना की चश्मदीद गवाह दोनों महिलाओं ने बताया कि आरोपियों ने उन्हें पकड़कर दबाए रखा, जबकि उनके पतियों पर हमला किया गया।
सिद्दव्वा के माथे पर कुल्हाड़ी के पिछले हिस्से से भी वार किया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को बरी कर दिया था, लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह फैसला पलट दिया।
हाईकोर्ट ने आरोपियों को IPC की धारा 143, 148, 302, 323 और 341 के साथ धारा 149 के तहत दोषी ठहराते हुए हत्या के अपराध में उम्रकैद की सजा सुनाई।
मजबूत चश्मदीद साक्ष्य होने पर हत्या का मकसद निर्णायक नहीं
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बसव प्रभु एस. पाटिल ने दलील दी कि दोनों महिलाएं मृतकों की पत्नियां थीं और इसलिए उनकी गवाही को सावधानी से देखा जाना चाहिए।
उन्होंने दोनों मृतकों की मृत्यु के समय में चार घंटे का अंतर बताने वाली डॉक्टर की राय पर भी भरोसा किया।
कर्नाटक सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अविष्कार सिंघवी ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विश्वसनीय प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध होने पर अपराध का मकसद उतना महत्वपूर्ण नहीं रह जाता।
बेंच ने कहा:
“जहां विश्वसनीय प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद हों, वहां अपराध का मकसद महत्वहीन हो जाता है।”
कोर्ट ने यह भी पाया कि वर्तमान मामले में हत्या का मकसद स्थापित था।
पंचनामा में गवाह का नाम न होने से उसकी गवाही खारिज नहीं होगी
सुप्रीम कोर्ट ने Radha Mohan Singh vs State of U.P. के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि CrPC की धारा 174, जो अब BNSS की धारा 194 है, के तहत जांच का उद्देश्य मृत्यु के प्रत्यक्ष कारण का पता लगाना है।
बेंच ने स्पष्ट किया:
“किसी चश्मदीद गवाह की गवाही केवल इस आधार पर खारिज नहीं की जा सकती कि उसका नाम मृत्यु जांच रिपोर्ट में दर्ज नहीं था।”
कोर्ट ने शिकायत दर्ज करने में देरी के संबंध में भी हाईकोर्ट के निष्कर्ष को सही माना।
बेंच के अनुसार, शिकायत लिखने वाले सोमशेखर (PW-20) का बयान डोड्डासिद्दव्वा की गवाही का समर्थन करता था, न कि उसका विरोध।
आरोपियों को तत्काल आत्मसमर्पण करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले के साक्ष्यों से आरोपियों का अपराध स्थापित होता है।
बेंच ने कहा:
“इस मामले में दो दृष्टिकोण संभव नहीं हैं और एकमात्र संभव निष्कर्ष अपीलकर्ताओं का दोषी होना है।”
कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए आरोपियों की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं को तत्काल आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। ऐसा नहीं करने पर ट्रायल कोर्ट को उन्हें हिरासत में लेने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Shekappa And Ors. vs State of Karnataka
केस नंबर: Criminal Appeal No. 2102 of 2011
पीठ: जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली
फैसले की तारीख: 3 नवंबर 2026
