कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार को नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा परिसर में स्थित बांकड़ा मस्जिद में नमाज अदा करने की अंतरिम अनुमति देने से इनकार कर दिया। सुरक्षा कारणों और समय की कमी के चलते मस्जिद कमेटी को अदालत से कोई फौरी राहत नहीं मिल सकी। इस मामले की अगली सुनवाई अब 7 अक्टूबर को होगी।
जस्टिस कृष्णा राव की बेंच बांकड़ा मस्जिद कमेटी द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एयरपोर्ट अथॉरिटी की ओर से मस्जिद में प्रवेश पर लगाई गई पाबंदियों को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने नमाज दोबारा शुरू कराने के लिए अदालत से अंतरिम आदेश की गुहार लगाई थी, हालांकि अदालत का समय समाप्त होने के कारण सुनवाई पूरी नहीं हो सकी।
रनवे से निकटता और सुरक्षा पर अधिकारियों की आपत्ति
हवाई अड्डा प्राधिकरण की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल धीरज त्रिवेदी ने सुरक्षा का हवाला देते हुए अंतरिम राहत का विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि यह मस्जिद एयरपोर्ट के ऑपरेशनल एरिया में स्थित है और दूसरे रनवे से इसकी दूरी महज 165 मीटर है। विमानन अधिकारियों ने इसे सुरक्षा के लिहाज से एक बाधा के रूप में दर्ज किया है।
अधिकारियों ने सुरक्षा में पूर्व में हुई उन चूकों का भी उल्लेख किया, जिनमें अनाधिकृत लोग हवाई अड्डे के एप्रन क्षेत्र तक पहुंच गए थे। सुनवाई के दौरान हालिया ‘फ्लाईदुबई’ सुरक्षा प्रकरण का भी संदर्भ आया। इस पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि विमानन सुरक्षा से जुड़े खतरे केवल भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक वैश्विक चुनौती है।
मस्जिद कमेटी की दलील: पूर्ण पाबंदी के बजाय जारी रहे सुरक्षा प्रोटोकॉल
याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता किशोर दत्ता ने तर्क दिया कि नमाज पर पूरी तरह से रोक लगाने के बजाय एक नियंत्रित व्यवस्था कायम की जा सकती थी। उन्होंने अदालत को बताया कि पूर्व में भी नमाजी सुरक्षा जांच से गुजरने के बाद ही मस्जिद में दाखिल होते थे।
दत्ता के अनुसार, नमाज के तय वक्त पर केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) की बस के जरिए श्रद्धालुओं को मस्जिद तक पहुंचाया जाता था। उन्होंने कहा कि अचानक नमाज बंद करने के बजाय इसी तरह की सुव्यवस्थित प्रक्रिया को आगे भी लागू रखा जा सकता था।
स्थानांतरण को लेकर विवाद और राजनीतिक बयानबाजी
130 साल से अधिक पुरानी यह मस्जिद मौजूदा हवाई अड्डे के बुनियादी ढांचे से भी पहले से वहां मौजूद है। सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर हवाई अड्डा प्रशासन ने जुलाई में श्रद्धालुओं के प्रवेश पर रोक लगा दी थी, जिसके बाद से इसके संभावित स्थानांतरण को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं।
जुलाई में इस कदम पर राजनीतिक विवाद भी खड़ा हुआ था। तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत रॉय ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार और हवाई अड्डा प्रशासन मस्जिद को हटाने का दबाव बनाने के लिए सुरक्षा कारणों का सहारा ले रहे हैं। उन्होंने कहा था कि मस्जिद को लेकर कोई भी प्रशासनिक फैसला स्थानीय अल्पसंख्यक समुदाय से मशविरे के बाद ही लिया जाना चाहिए।
वहीं, ममता बनर्जी सरकार के पूर्व मंत्री और बांकड़ा मस्जिद कमेटी के अध्यक्ष सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने स्पष्ट किया था कि मस्जिद किसी को सौंपी नहीं जा सकती। उन्होंने कहा था कि कमेटी ने एयरपोर्ट अधिकारियों से बार-बार आग्रह किया है कि वे इस मामले को दारुल उलूम देवबंद, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसी संस्थाओं के साथ चर्चा में शामिल करें, ताकि इसका एक शांतिपूर्ण और धार्मिक समाधान निकाला जा सके।
हाईकोर्ट इस याचिका पर 7 अक्टूबर को दोबारा सुनवाई करेगा।

