दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महिला को उसके ससुराल के घर से बेदखल करने का आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि सीनियर सिटिजन एक्ट के तहत शुरू की गई कार्यवाही का इस्तेमाल बहू को उस घर में रहने के अधिकार से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता, जिसे वह अपना वैवाहिक या साझा घर बताती है।
जस्टिस अमित महाजन ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों को अपनी संपत्ति में शांति और सम्मान के साथ रहने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार के साथ घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत महिला को मिले निवास के अधिकार का भी संतुलन जरूरी है।
मामले में महिला ने डिविजनल कमिश्नर के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके ससुराल के घर से बेदखली को बरकरार रखा गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि सास एक वरिष्ठ नागरिक हैं और उन्हें अपनी संपत्ति में शांतिपूर्वक तथा सम्मान के साथ रहने का अधिकार है। हालांकि, सीनियर सिटिजन एक्ट की सुरक्षा का इस्तेमाल बहू के साझा या वैवाहिक घर में रहने के दावे को स्वतः समाप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।
परिवार के बीच कई मामले लंबित
विवाद महिला और उसके ससुराल वालों के बीच वैवाहिक मतभेद से जुड़ा है। महिला की शादी दिसंबर 2021 में हुई थी और वह अपने पति तथा नाबालिग बेटे के साथ संबंधित संपत्ति में रह रही थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि परिवार के बीच कई कानूनी मामले पहले से लंबित हैं। इनमें नाबालिग बेटे की ओर से दाखिल निषेधाज्ञा, घोषणा और बंटवारे का सिविल मुकदमा, तलाक का मामला, अभिभावकत्व की कार्यवाही, घरेलू हिंसा का मामला और दहेज मांग तथा क्रूरता के आरोपों से जुड़ी एफआईआर शामिल हैं।
महिला के ससुर की 2018 में मृत्यु हो गई थी और उन्होंने कोई वैध वसीयत नहीं छोड़ी थी। इसके बाद 2019 में महिला के पति और उसके भाई ने एक रजिस्टर्ड रिलिंक्विशमेंट डीड के जरिए संपत्ति में अपने हिस्से अपनी मां के पक्ष में छोड़ दिए थे।
बाद में सास ने सीनियर सिटिजन एक्ट के तहत अपने बेटे और बहू को संपत्ति से बेदखल करने की मांग की।
मार्च 2025 में जिला मजिस्ट्रेट ने यह मानते हुए दोनों की बेदखली का आदेश दिया कि सास संपत्ति की मालिक हैं। महिला ने इस आदेश के खिलाफ अपील की, लेकिन सितंबर 2025 में डिविजनल कमिश्नर ने उसकी अपील खारिज कर दी।
डिविजनल कमिश्नर ने कहा था कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी पति की है, सास की नहीं। आदेश में सास की अधिक उम्र, स्टेज-4 कैंसर और परिवार के बीच जारी मुकदमों के कारण बने तनावपूर्ण माहौल को भी ध्यान में रखा गया था।
महिला ने संपत्ति को बताया साझा वैवाहिक घर
हाईकोर्ट में महिला ने दलील दी कि संबंधित संपत्ति उसका वैवाहिक और साझा घर है। उसका कहना था कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मिले निवास के अधिकार को केवल इस आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता कि पति और उसके भाई ने संपत्ति में अपने हिस्से मां के पक्ष में छोड़ दिए थे।
महिला ने रिलिंक्विशमेंट डीड की वैधता और उसके प्रभाव पर भी सवाल उठाया। उसने यह भी दावा किया कि संपत्ति पैतृक है और उसके नाबालिग बेटे का भी इसमें अधिकार है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सीनियर सिटिजन एक्ट, 2007 और घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 को एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बनाकर पढ़ा जाना चाहिए। एक कानून के तहत मिले अधिकार को दूसरे कानून के तहत मिले अधिकार पर स्वतः हावी नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि परिवार के सदस्यों के बीच निष्पादित रिलिंक्विशमेंट डीड, जिसके जरिए पति और उसके भाई ने अपने हिस्से मां के पक्ष में छोड़ दिए, अपने आप बहू के निवास के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकती, खासकर तब जब उस डीड की वैधता और कानूनी प्रभाव पहले से सिविल कोर्ट में विवाद का विषय हों।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में नाबालिग बच्चे के निवास से जुड़ा पहलू भी महत्वपूर्ण है।
महिला की बेदखली का आदेश रद्द करते हुए कोर्ट ने साफ किया कि उसने संपत्ति के मालिकाना हक, टाइटल या रिलिंक्विशमेंट डीड की अंतिम वैधता पर कोई फैसला नहीं दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ये विवादित मुद्दे सक्षम सिविल और वैवाहिक अदालतों के समक्ष लंबित कार्यवाही में तय किए जाएंगे।

