इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने सगे भाई की कुल्हाड़ी मारकर हत्या करने के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा और उम्रकैद के आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस पदम नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब घर में परिवार के अन्य सदस्य भी मौजूद हों, तो केवल इस आधार पर भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 लागू नहीं की जा सकती कि घटना घर के भीतर हुई है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष परिस्थितियों की कड़ियों को पूरी तरह साबित करने में नाकाम रहा है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए छोटू वर्मा को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
27 जुलाई 2016 को दर्ज एफआईआर के अनुसार, शिकायतकर्ता पीडब्ल्यू-1 लल्लू वर्मा का सबसे बड़ा बेटा चंदन था। चंदन की शादी करीब पांच साल पहले केसकली से हुई थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि शादी के बाद केसकली का अपने देवर यानी अपीलकर्ता छोटू वर्मा के साथ अवैध संबंध बन गया, जिसके चलते दोनों भाइयों में विवाद रहता था। घटना से करीब एक हफ्ते पहले हुए झगड़े के बाद चंदन ने केसकली को उसके मायके भेज दिया था। आरोप के मुताबिक, 27 जुलाई 2016 की रात करीब 3 बजे छोटू वर्मा ने सुनियोजित तरीके से कुल्हाड़ी से वार कर चंदन की हत्या कर दी। इस कथित साजिश में केसकली को भी शामिल बताया गया था।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 और 34 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया। बांदा की फास्ट ट्रैक कोर्ट में ट्रायल के दौरान पिता लल्लू वर्मा (पीडब्ल्यू-1), चाचा कल्लू वर्मा (पीडब्ल्यू-2) और छोटे भाई मिथुन (पीडब्ल्यू-3) अपने बयानों से मुकर गए और उन्हें पक्षद्रोही (होस्टाइल) घोषित कर दिया गया। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने 2 अप्रैल 2019 को केसकली को बरी करते हुए छोटू वर्मा को धारा 302 के तहत दोषी पाया और उम्रकैद व 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इस फैसले के खिलाफ छोटू वर्मा ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) विमलेंदु त्रिपाठी ने दलील दी कि जब सभी प्रत्यक्षदर्शी और तथ्यात्मक गवाह मुकर चुके हैं, तो ऐसे में कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य न होने के कारण यह सजा टिकने योग्य नहीं है। उन्होंने कहा कि कथित अवैध संबंध और हत्या के मकसद को साबित नहीं किया जा सका है। इसके अलावा, शिकायतकर्ता पिता ने गवाही दी कि उनसे सादे कागज पर अंगूठा लगवाया गया था, जबकि तहरीर लिखने वाले गवाह ने कहा कि यह पुलिस (दारोगा जी) के कहने पर लिखी गई थी; ऐसे में एफआईआर कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। यह भी तर्क दिया गया कि कथित कुल्हाड़ी अपीलकर्ता के बयान या निशानदेही पर बरामद नहीं हुई थी, इसलिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 लागू नहीं होती। बचाव पक्ष ने कहा कि घर में अन्य परिजन मौजूद थे, इसलिए धारा 106 का सहारा लेकर सारा भार अपीलकर्ता पर नहीं डाला जा सकता, और सीआरपीसी की धारा 313 के तहत भी उससे इन परिस्थितियों पर सवाल नहीं पूछे गए।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता अर्चना सिंह ने अपील का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि घटना घर के भीतर हुई और शव भी वहीं मिला, इसलिए ये तथ्य सीधे तौर पर आरोपी की विशेष जानकारी में थे और धारा 106 के तहत घटना स्पष्ट करने की जिम्मेदारी उसी की थी। उन्होंने यह भी कहा कि एफआईआर तुरंत दर्ज कराई गई थी, हथियार पर इंसानी खून पाया गया था और गवाहों के मुकर जाने भर से अभियोजन का पूरा मामला खत्म नहीं हो जाता।
अदालत का विश्लेषण
एफआईआर की कानूनी हैसियत पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम सूचना रिपोर्ट कोई मूल या ठोस साक्ष्य नहीं होती, बल्कि इसका इस्तेमाल केवल समर्थन या खंडन के लिए किया जा सकता है। अदालत ने पाया कि जब पिता ने सादे कागज पर अंगूठा लगवाने की बात कही और लेखक ने दारोगा के निर्देश पर तहरीर लिखने का बयान दिया, तो सिर्फ एफआईआर में नाम होने से अपराध साबित नहीं माना जा सकता।
कुल्हाड़ी की बरामदगी पर अदालत ने स्पष्ट किया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 लागू करने के लिए यह साबित होना जरूरी है कि बरामदगी हिरासत में आरोपी द्वारा दी गई जानकारी के सीधे परिणाम स्वरूप हुई हो। मामले के रिकॉर्ड से सामने आया कि कुल्हाड़ी छोटू वर्मा की निशानदेही पर नहीं, बल्कि उसके भाई मिथुन (पीडब्ल्यू-3) द्वारा पेश की गई थी। इस पर पीठ ने टिप्पणी की:
“घर से केवल एक कुल्हाड़ी का बरामद होना ही अपने आप में इस जब्ती को साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत ‘खोज’ (डिस्कवरी) में तब्दील नहीं कर सकता। धारा 27 को लागू करने के लिए अभियोजन को अभियुक्त द्वारा दी गई सूचना और उसके परिणामस्वरूप खोजी गई वस्तु के बीच एक स्पष्ट और प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करना अनिवार्य है।”
अदालत ने आगे कहा कि कुल्हाड़ी पर इंसानी खून मिलना भी इस कानूनी कमी की भरपाई नहीं कर सकता।
ट्रायल कोर्ट द्वारा धारा 106 के इस्तेमाल पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। सुप्रीम कोर्ट के सदाशिव धोडी राम पाटिल बनाम महाराष्ट्र राज्य [(2025) आईएनएससी 93] फैसले का हवाला देते हुए खंडपीठ ने दोहराया कि धारा 106 अभियोजन को अपना मामला साबित करने के दायित्व से मुक्त नहीं करती। अभियोजन को पहले बुनियादी तथ्य साबित करने होते हैं। पुलिस बयानों से साफ था कि घटना के समय मृतक की बहन सरिता समेत परिवार के अन्य सदस्य भी घर में मौजूद थे। अदालत ने निर्णय दिया:
“भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 ऐसे तथ्य पर लागू होती है जो किसी व्यक्ति विशेष की विशिष्ट जानकारी में हो। यह अदालत को यह अधिकार नहीं देती कि वह घर में मौजूद कई लोगों में से किसी एक व्यक्ति को चुन ले और अपनी बेगुनाही साबित करने का पूरा भार उसी पर डाल दे।”
सीआरपीसी की धारा 313 के तहत बयान दर्ज करने की प्रक्रिया पर अदालत ने माना कि आरोपी से कथित मकसद, बरामदगी और धारा 106 से जुड़ी अहम परिस्थितियां स्पष्ट रूप से नहीं पूछी गईं। पीठ ने कहा:
“सीआरपीसी की धारा 313 का उद्देश्य अभियुक्त को अभियोजन साक्ष्य में उसके खिलाफ आने वाली आपत्तिजनक परिस्थितियों पर अपना स्पष्टीकरण देने का अवसर प्रदान करना है। इसलिए, कानून में दी गई इस सुरक्षा के विपरीत जाकर पहले किसी परिस्थिति के आधार पर दोषसिद्धि दर्ज करना और बाद में यह कहना कि अभियुक्त को इसका स्पष्टीकरण देना चाहिए था, पूरी तरह गलत है।”
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष कथित मकसद, हथियार की बरामदगी और परिस्थितियों की पूरी कड़ी को बिना किसी संदेह के साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता संदेह का लाभ पाने का हकदार है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने अपील मंजूर करते हुए 2 अप्रैल 2019 के दोषसिद्धि आदेश को रद्द कर दिया और छोटू वर्मा को आईपीसी की धारा 302 के आरोप से बरी कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो, तो सीआरपीसी की धारा 437ए (बीएनएसएस की धारा 481) के अनुपालन के अधीन उसे तत्काल जेल से रिहा किया जाए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: छोटू वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या – 3972 / 2019
पीठ: जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस पदम नारायण मिश्रा
निर्णय की तिथि: 24 सितंबर, 2026

