दिल्ली हाईकोर्ट ने शारीरिक श्रम करने वाले कामगारों की सामाजिक स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि देश में मजदूर वर्ग सबसे कम मेहनताना पाने वाला और सर्वाधिक उपेक्षित तबका है। अदालत ने इस बात पर अफसोस जताया कि पश्चिमी देशों के विपरीत, जहां शारीरिक श्रम का उचित मूल्य और सम्मान मिलता है, हमारे समाज में इस मेहनत को वह दर्जा नहीं मिल सका है।
यह टिप्पणी 18 सितंबर को न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव की पीठ ने 22 साल पुराने एक मारपीट मामले में फैसला सुनाते हुए की। हाईकोर्ट ने मामले के दोषी वीर पाल की पांच साल की सजा को घटाकर तीन साल के कारावास में बदल दिया।
धारा में बदलाव और सजा में राहत
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं कि दोषी का इरादा या जानकारी किसी की जान लेने की थी। इसी आधार पर अदालत ने निचली अदालत द्वारा तय किए गए हत्या के प्रयास के दोष को हटा दिया और वीर पाल को खतरनाक हथियार से स्वेच्छा से चोट पहुंचाने के अपराध में दोषी ठहराया। धारा में हुए इस बदलाव के साथ ही उसकी पांच साल की जेल की सजा भी घटाकर तीन साल कर दी गई।
मजदूरों की समस्याओं पर हाईकोर्ट की चिंता
न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव ने फैसले में कहा कि दिनभर हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले किसी भी श्रमिक को अगले दिन के काम के लिए शारीरिक ऊर्जा जुटाने के वास्ते रात में चैन की नींद मिलना जरूरी है। अदालत ने इसे मजदूरों की अंतहीन परेशानी बताते हुए कहा कि यह बेहद दुखद स्थिति है कि जो वर्ग सबसे ज्यादा शारीरिक मेहनत करता है, उसी को सबसे कम पैसा दिया जाता है और उसकी सबसे कम परवाह की जाती है। समाज अब तक शारीरिक श्रम का सम्मान और मूल्यांकन करना नहीं सीख पाया है।
मार्च 2002 की घटना और विवाद की शुरुआत
यह विवाद 17 मार्च 2002 की रात चांदनी चौक के लाजपत राय मार्केट में हुआ था। पीड़ित राजिंदर कुमार जिस दुकान में काम करते थे, उसी के बरामदे में वह सोने की तैयारी कर रहे थे। उसी दौरान वीर पाल और उसके साथी वहां शोर-शराबा करने लगे। जब राजिंदर कुमार ने उनके इस व्यवधान का विरोध किया और शांत रहने को कहा, तो वीर पाल भड़क गया। उसने राजिंदर को धक्का दिया और चमड़ा काटने वाले औजार (रापी) से उन पर हमला कर दिया।
इलाके में गश्त कर रहे एक पुलिसकर्मी के हस्तक्षेप के बाद घायल राजिंदर को अस्पताल पहुंचाया गया, जबकि वीर पाल को हिरासत में लेकर उसके खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया गया। बाद में निचली अदालत ने वीर पाल को दोषी ठहराते हुए पांच साल की कैद सुनाई थी।
सजा कम करने के आधार
वीर पाल ने निचली अदालत के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उसकी दलील थी कि यह घटना अचानक उपजे गुस्से का परिणाम थी और इसमें किसी प्रकार की पूर्व-योजना या षड्यंत्र नहीं था। उसने अदालत को बताया कि उसने केवल एक बार वार किया था और उसका निशाना राजिंदर कुमार नहीं थे।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों पर गौर करते हुए पाया कि वीर पाल और पीड़ित के बीच न तो पहले से कोई परिचय था और न ही कोई पुरानी रंजिश। पीड़ित ने केवल अपनी नींद में खलल पड़ने के कारण आवाज उठाई थी। इसके साथ ही अदालत ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि घटना वर्ष 2002 की है और रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं है जिससे यह साबित हो कि वीर पाल का इस घटना से पहले या बाद में कोई आपराधिक इतिहास रहा हो। इन सभी पहलुओं को देखते हुए अदालत ने दोषसिद्धि की धारा बदलने और सजा कम करने का फैसला किया।

