इंदौर जिले के बनेड़िया गांव में करीब 1,501 बीघा जमीन से जुड़े 60 साल से भी अधिक पुराने भूमि सीलिंग मामले को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी मृत व्यक्ति के खिलाफ शुरू की गई वैधानिक कार्यवाही कानून की नजर में पूरी तरह शून्य और अमान्य होती है।
जस्टिस संदीप एन. भट्ट की एकल पीठ ने 8 सितंबर को यह फैसला सुनाते हुए इंदौर के जिला कलेक्टर के 27 जून 2025 के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसके जरिए एक निजी निर्माण कंपनी की आपत्तियों को दरकिनार कर दिया गया था। इस विवादित संपत्ति में कृषि भूमि के साथ-साथ बनेड़िया तालाब भी शामिल है।
मृतक के खिलाफ वैधानिक प्रक्रिया का पालन न करना प्राकृतिक न्याय का हनन
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मूल भूस्वामी माधव राव किबे की मौत 12 अक्टूबर 1963 को हो चुकी थी, जबकि राजस्व विभाग ने 15 जुलाई 1964 को उनके नाम पर धारा 10 का सीलिंग नोटिस जारी किया। अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी मृत व्यक्ति को नोटिस जारी करना पूरी कार्यवाही को कानूनन शून्य बना देता है। पीठ ने पाया कि संबंधित अधिकारियों ने बिना सोचे-समझे और यांत्रिक तरीके से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी करते हुए आदेश पारित किए थे।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता कंपनी को वे सभी दस्तावेज पूरे उपलब्ध नहीं कराए गए, जिनके आधार पर यह कार्यवाही चलाई जा रही थी। जस्टिस भट्ट ने कहा कि मध्य प्रदेश कृषि जोत उच्चतम सीमा अधिनियम, 1960 (सीलिंग एक्ट) भले ही एक सामाजिक कल्याणकारी कानून है, लेकिन इसका उद्देश्य प्रशासनिक अधिकारियों को अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी करने की छूट नहीं देता। इसके साथ ही अदालत ने कलेक्टर के जून 2025 के आदेश में ठोस आधार और निष्कर्षों के अभाव पर सवाल उठाते हुए कहा कि उचित और तर्कसंगत कारण ही किसी भी न्यायिक या प्रशासनिक आदेश की आत्मा होते हैं।
बनेड़िया तालाब सीलिंग कानून के दायरे से बाहर, कब्जे की स्थिति पर भी स्पष्टीकरण
मामले के कानूनी पहलुओं की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि कानून लागू होने की निर्धारित तारीख पर मूल स्वामी माधव राव किबे भूमि के ‘धारक’ की श्रेणी में नहीं आते थे। राज्य सरकार ने सीलिंग कानून के प्रभावी होने की तारीख 15 नवंबर 1961 से पहले ही 30 मई 1960 को इस जमीन पर कब्जा ले लिया था।
इसके अलावा, अदालत ने साफ किया कि बनेड़िया तालाब को किसी भी तरह सीलिंग कानून के तहत ‘जमीन’ की वैधानिक परिभाषा में शामिल नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को स्वीकार किया कि सक्षम प्राधिकारी सीलिंग कानून की धारा 11(9) के तहत मामले को आगे बढ़ाने का अधिकार खो चुका था। साथ ही अदालत ने सरकार की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि बाद में जमीन खरीदने वाला पक्षकार वे कानूनी आपत्तियां नहीं उठा सकता जो मूल स्वामी ने नहीं उठाई थीं।
छह दशकों से चल रहा था कानूनी संघर्ष
इस विवाद की शुरुआत जून 1964 में राजस्व अधिकारियों की उस रिपोर्ट से हुई थी, जिसमें सीलिंग की सिफारिश की गई थी। इसके बाद जुलाई 1964 में किबे के नाम पर नोटिस थमाया गया।
सरकार द्वारा जमीन पर कब्जा किए जाने के खिलाफ किबे के कानूनी वारिसों ने 12 नवंबर 1964 को दीवानी मुकदमा दायर किया। 7 मई 1966 को अदालत ने उनके पक्ष में डिक्री जारी करते हुए सरकार को जमीन वापस सौंपने का निर्देश दिया। इसके बाद राज्य सरकार की पहली अपील 1969 में और दूसरी अपील 1982 में खारिज हो गई। आगे चलकर 1991 में सुप्रीम कोर्ट ने वारिसों को 12 प्रतिशत ब्याज के साथ 25,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
साल 1994 में निजी निर्माण कंपनी ने इस मुआवजे की राशि से जुड़े अधिकार खरीद लिए। इसके बाद राजस्व विभाग ने 1999 में सीलिंग की कार्यवाही फिर शुरू की, जिसके तहत अप्रैल 2000 में मसौदा और मई 2000 में अंतिम विवरण जारी किया गया। वारिसों की कानूनी चुनौती 2005 में खारिज हुई, लेकिन 2024 में दायर एक अपील को दिसंबर 2024 में आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया गया।
इसके बाद कंपनी ने सीलिंग कानून के तहत अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। कलेक्टर द्वारा 27 जून 2025 को इन आपत्तियों को खारिज किए जाने के बाद कंपनी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां अदालत ने छह दशक पुराने इस मामले को समाप्त कर दिया।

