पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 1997 के एक सड़क हादसे में अपनी मां को खोने वाली बेटी के मुआवजे में भारी बढ़ोतरी की है। कोर्ट ने मुआवजा राशि को 1.92 लाख रुपये से बढ़ाकर 57.96 लाख रुपये करने का आदेश सुनाया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दुर्घटना के समय भले ही लड़की नाबालिग थी, लेकिन अब वह वयस्क हो चुकी है, इसलिए यह पूरी रकम सीधे उसके बचत बैंक खाते में जमा कराई जाए।
जस्टिस अमरिंदर सिंह ग्रेवाल ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के 1 नवंबर 2001 के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर 9 सितंबर को यह निर्णय सुनाया।
मूल मुआवजे में 56 लाख से अधिक की बढ़ोतरी और 7.5 फीसदी ब्याज
हाईकोर्ट के इस फैसले से न्यायाधिकरण द्वारा तय किए गए 1.92 लाख रुपये के पुराने मुआवजे में 56.04 लाख रुपये की शुद्ध बढ़ोतरी हुई है। अदालत ने निर्देश दिया कि दावेदार को यह बढ़ी हुई राशि दावा याचिका दायर करने की तिथि से लेकर पूरी रकम के भुगतान तक 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ दी जाएगी।
इसके अतिरिक्त, अदालत ने अन्य मदों के तहत भी राशि तय की। इसमें माता-पिता के स्नेह व संरक्षण के नुकसान (पैरेंटल कंसोर्टियम) के लिए 48,400 रुपये, संपत्ति के नुकसान के एवज में 18,150 रुपये तथा अंतिम संस्कार के खर्च के लिए 18,150 रुपये का भुगतान शामिल है।
कमाई के गलत आकलन को माना कानूनी रूप से गलत
अदालत के समक्ष मुख्य विचारणीय प्रश्न यह था कि क्या न्यायाधिकरण द्वारा मृतका कमलेश कुमारी को केवल एक अकुशल दैनिक मजदूर मानते हुए उनकी अनुमानित मासिक आय महज 2,000 रुपये तय करना उचित था।
जस्टिस ग्रेवाल ने न्यायाधिकरण के इस रुख को कानूनी तौर पर गलत ठहराया। उन्होंने रेखांकित किया कि औपचारिक दस्तावेजी प्रमाण न होने के आधार पर न्यायाधिकरण ने मृतका की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और दर्जी के रूप में दोहरी आय की दलील को खारिज कर दिया था और उन्हें एक सामान्य आकस्मिक मजदूर मान लिया था, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार वह प्रतिमाह लगभग 30,000 रुपये कमाती थीं।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
बेटी की ओर से पेश अधिवक्ता गुरदेव सिंह ने दलील रखी कि मृतका परिवार की एकमात्र कमाने वाली सदस्य थीं। औपचारिक रोजगार का दस्तावेज न होने मात्र से परिवार के प्रति उनके आर्थिक योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायाधिकरण ने मां की देखभाल और प्यार से वंचित होने के एवज में कोई मुआवजा नहीं दिया और न ही अंतिम संस्कार के खर्च का आकलन किया, जबकि हादसे के वक्त बच्ची नाबालिग थी।
दूसरी ओर, बीमा कंपनी का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता शुभम गुप्ता ने न्यायाधिकरण के 2001 के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि पुराना फैसला मौखिक और दस्तावेजी दोनों साक्ष्यों को ध्यान में रखकर दिया गया था और उसमें कोई कानूनी खामी नहीं थी, इसलिए हाईकोर्ट को इसमें दखल नहीं देना चाहिए।
जालंधर-पठानकोट हाईवे पर हुआ था हादसा
यह मामला 13 सितंबर 1997 का है, जब कमलेश कुमारी चंडीगढ़ से पठानकोट जा रही एक बस में यात्रा कर रही थीं। सुबह करीब 10:40 बजे जालंधर-पठानकोट हाईवे पर मिलवां गांव के पास सामने से आ रहे एक ट्रक ने बस को सीधी टक्कर मार दी। इस हादसे में कमलेश कुमारी को जानलेवा चोटें आईं और उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
घटना के संबंध में कांगड़ा जिले के एक थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। न्यायाधिकरण ने 1 नवंबर 2001 को दिए अपने निर्णय में ट्रक चालक को हादसे के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया था।

