विज्ञापन में तय अनिवार्य योग्यता की अनदेखी कर नियुक्ति देना ‘जनता के साथ धोखाधड़ी’: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भर्ती विज्ञापन में तय अनिवार्य पात्रता शर्तों की अनदेखी करके की गई नियुक्ति ‘जनता के साथ धोखाधड़ी’ के समान है। कोर्ट ने कहा कि जब तक नियमों या विज्ञापन में योग्यता में छूट देने का स्पष्ट अधिकार सुरक्षित न रखा गया हो, तब तक चयन प्राधिकारी तय योग्यताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया, जिसमें नासिक जिले में एक आंगनवाड़ी सुपरवाइजर की नियुक्ति को इस आधार पर रद्द कर दिया गया था कि उनका 10 वर्ष का पूर्व सेवा अनुभव किसी दूसरे जिले का था।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता सुनीता लहू पांचपांडे फरवरी 1992 से जलगांव जिले में आंगनवाड़ी सेविका के पद पर कार्यरत थीं। 18 अप्रैल 2013 को जिला परिषद, नासिक ने आंगनवाड़ी सुपरवाइजर सहित विभिन्न पदों पर भर्ती के लिए एक विज्ञापन जारी किया। इस विज्ञापन में निर्धारित योग्यताओं के तहत अभ्यर्थियों के पास आंगनवाड़ी सेविका के रूप में 10 वर्ष या उससे अधिक का कार्य अनुभव होना अनिवार्य किया गया था। विज्ञापन के महत्वपूर्ण निर्देशों में से निर्देश संख्या 1 में साफ तौर पर कहा गया था:

“(केवल) नासिक जिले में एकीकृत बाल विकास सेवा योजना के तहत आदिवासी/ग्रामीण परियोजनाओं में वर्तमान में कार्यरत आंगनवाड़ी सेविकाएं ही उक्त पद के लिए आवेदन कर सकती हैं।”

अपीलकर्ता ने नासिक जिले की किसी भी परियोजना में कभी कार्य नहीं किया था और उनका पूरा अनुभव जलगांव जिले का था। इसके बावजूद उन्होंने आवेदन किया, उनका चयन हुआ और उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) कोटे के तहत वेटिंग लिस्ट में पहले स्थान पर रखा गया। इस बीच, मूल रूप से चयनित उम्मीदवार लता संजय कदम की नियुक्ति अयोग्य पाए जाने के कारण रद्द हो गई। इसके बाद, खाली हुए पद पर 4 मार्च 2014 को अपीलकर्ता को आंगनवाड़ी सुपरवाइजर नियुक्त कर दिया गया।

विज्ञापन की सभी शर्तें पूरी करने वाली छठी प्रतिवादी गीतांजलि सुधाकर शिरसाट वेटिंग लिस्ट में दूसरे स्थान पर थीं। अपीलकर्ता की नियुक्ति के बाद उन्होंने 9 अप्रैल 2014 को प्राधिकारियों को अभ्यावेदन देकर इस चयन को चुनौती दी। जब प्रशासन ने कोई कदम नहीं उठाया, तो उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने 7 अगस्त 2017 को अपीलकर्ता की नियुक्ति रद्द करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह उनके स्थान पर छठी प्रतिवादी को नियुक्त करे। साथ ही हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी भी की कि अपीलकर्ता को जलगांव जिले में आंगनवाड़ी सेविका के रूप में समायोजित किया जा सकता है। इस फैसले से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि मेरिट लिस्ट और वेटिंग लिस्ट तैयार होने के बाद, जिला परिषद, नासिक ने 24 अक्टूबर 2013 को संभागीय आयुक्त, नासिक से 17 नवंबर 2001 के सरकारी संकल्प (जी.आर.) की व्याख्या पर स्पष्टीकरण मांगा था। संभागीय आयुक्त ने 19 नवंबर 2013 को स्पष्टीकरण पत्र जारी करते हुए कहा कि 2001 के जी.आर. में ऐसी कोई स्पष्ट शर्त नहीं है कि आवेदक के पास उसी जिले में 10 वर्ष का अनुभव होना चाहिए।

अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि उनकी नियुक्ति इसी आधिकारिक स्पष्टीकरण के बाद की गई थी। उन्होंने कोई भी जानकारी नहीं छिपाई थी और वे बिना किसी शिकायत के तीन साल से अधिक समय तक इस पद पर कार्य कर चुकी थीं, इसलिए इस चयन में कोई प्रत्यक्ष अवैधता नहीं थी।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि 2001 के जी.आर. में स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था थी कि आंगनवाड़ी सुपरवाइजर पद के लिए उम्मीदवार का उसी जिले में 10 वर्ष तक आंगनवाड़ी सेविका के रूप में कार्य करना अनिवार्य है। इसके अलावा, जी.आर. एक जिले की चयन सूची में शामिल उम्मीदवारों को दूसरे जिले में नियुक्ति के लिए पात्र मानने पर भी रोक लगाता है।

पीठ ने संभागीय आयुक्त के स्पष्टीकरण को पूरी तरह त्रुटिपूर्ण बताते हुए कहा:

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“संभागीय आयुक्त द्वारा दिया गया उपरोक्त स्पष्टीकरण 2001 के जी.आर. की विषय-वस्तु को सही परिप्रेक्ष्य में देखने में पूरी तरह विफल रहता है। 2001 के जी.आर. के क्लॉज 3, 5 और 16-ए को एक साथ पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि आंगनवाड़ी सेविका के रूप में 10 वर्ष का कार्य अनुभव उसी जिले में हासिल किया जाना आवश्यक था। संभागीय आयुक्त, नासिक ने वास्तव में 2001 के जी.आर. की व्याख्या करने में गलती की।”

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि संभागीय आयुक्त के पास सरकारी संकल्प के विपरीत ऐसा कोई स्पष्टीकरण जारी करने का अधिकार क्षेत्र ही नहीं था। यदि किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता थी, तो मामला शासन के संबंधित विभाग को भेजा जाना चाहिए था। इसके साथ ही पीठ ने अपीलकर्ता के दस्तावेजों की गहन जांच न करने के लिए जिला परिषद को भी जिम्मेदार माना:

“यदि सूक्ष्मता से जांच की गई होती, तो अपीलकर्ता पात्रता की सीमा पार कर विचार के दायरे में ही नहीं आ सकती थीं।”

कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिए पीठ ने ‘डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर एंड चेयरमैन, विजयनगरम सोशल वेलफेयर रेजिडेंशियल स्कूल सोसाइटी बनाम एम. त्रिपुरा सुंदरी देवी’ (1990) मामले के नजीर का उल्लेख करते हुए कहा:

“सभी संबंधित पक्षों को यह समझना होगा कि जब किसी विज्ञापन में किसी विशेष योग्यता का उल्लेख होता है और उसकी अनदेखी करके नियुक्ति की जाती है, तो यह केवल नियुक्ति प्राधिकारी और संबंधित नियुक्त व्यक्ति के बीच का मामला नहीं रह जाता। इससे वे सभी लोग व्यथित होते हैं जिनके पास नियुक्त व्यक्ति के समान या उससे भी बेहतर योग्यताएं थीं, लेकिन उन्होंने आवेदन इसलिए नहीं किया क्योंकि उनके पास विज्ञापन में उल्लिखित योग्यताएं नहीं थीं। ऐसी परिस्थितियों में कम योग्यता वाले व्यक्तियों को नियुक्त करना जनता के साथ धोखाधड़ी के समान है, जब तक कि यह स्पष्ट रूप से न कहा गया हो कि योग्यताएं शिथिल की जा सकती हैं। किसी भी अदालत को इस धोखाधड़ीपूर्ण प्रथा को जारी रखने का पक्षकार नहीं बनना चाहिए।”

वर्तमान मामले पर इस सिद्धांत को लागू करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

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“वर्तमान मामले की तुलना में, उपरोक्त व्यवस्था यहां पूरी तरह लागू होती है। अपीलकर्ता की नियुक्ति न केवल विज्ञापन की शर्तों की अनदेखी करती है, बल्कि एक अयोग्य उम्मीदवार को नियुक्त करके जनता के साथ धोखाधड़ी भी करती है। अपीलकर्ता की नियुक्ति केवल तभी बचाई जा सकती थी, यदि विज्ञापन में नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा किसी अनिवार्य शर्त में छूट देने का अधिकार सुरक्षित रखा गया होता। इस मामले में ऐसी कोई छूट उपलब्ध नहीं दिखाई गई है…”

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि न पाते हुए अपील खारिज कर दी।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि हाईकोर्ट के फैसले के तहत मिलने वाले सभी परिणामी लाभ छठी प्रतिवादी को दो महीने के भीतर प्रदान किए जाएं। वहीं, प्रशासनिक कामकाज में अचानक व्यवधान न आए, इसके लिए अपीलकर्ता को अपने शेष कार्यों को पूरा करने हेतु 30 सितंबर 2026 तक का समय दिया गया, जिसके बाद वे आंगनवाड़ी सुपरवाइजर के पद पर नहीं रह सकेंगी। पीठ ने हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को बरकरार रखा कि उन्हें जलगांव जिले में आंगनवाड़ी सेविका के रूप में समायोजित किया जा सकता है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: सुनीता लहू पांचपांडे बनाम डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 6379 / 2023
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 16 सितंबर 2026

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