बॉम्बे हाईकोर्ट ने रिटायर्ड शिक्षिका को पुरानी पेंशन देने का दिया आदेश, पुणे के शिक्षा उपनिदेशक को पद से हटाने के निर्देश

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक सेवानिवृत्त शिक्षिका को पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) के तहत सभी लाभ जारी करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने एक बुजुर्ग नागरिक को बेवजह प्रताड़ित करने और कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी करने पर कड़ा रुख अपनाते हुए महाराष्ट्र सरकार से पुणे के शिक्षा उपनिदेशक गणपत मोरे को पद से तुरंत हटाने को कहा है।

जस्टिस जी. एस. कुलकर्णी और जस्टिस नीला गोखले की खंडपीठ ने पुणे के आबासाहेब गरवारे कॉलेज की पूर्व व्याख्याता प्रेमलता सुरेश गोरे की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। पीठ ने महाराष्ट्र शासन के स्कूल शिक्षा एवं खेल विभाग (मंत्रालय) के सचिव को निर्देश दिया कि वह गणपत मोरे से पुणे संभाग के शिक्षा उपनिदेशक का प्रभार तत्काल वापस लें और उनकी जगह किसी सक्षम अधिकारी की नियुक्ति करें।

अफसर की कार्यशैली पर हाईकोर्ट की कड़ी फटकार

अदालत ने शिक्षा उपनिदेशक के आचरण की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि संबंधित अधिकारी ने बुजुर्ग नागरिकों और पेंशन से जुड़े संवेदनशील मामलों में संवेदनहीनता, मनमानी और कर्तव्य के प्रति उपेक्षा का परिचय दिया है।

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि उनके सामने ऐसे मामले बार-बार आए हैं जहां इस अधिकारी ने कानून की खुलेआम अवहेलना करते हुए फैसले लिए, जिससे शिक्षकों के अधिकारों को गंभीर नुकसान पहुँचा और उन्हें मजबूरन अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। पीठ ने टिप्पणी की कि जो लोक सेवक कानून के शासन और अदालत के आदेशों की अनदेखी करता है, जिसमें संवेदनशीलता व अंतरात्मा का अभाव है और जो नागरिकों को अनुचित रूप से प्रताड़ित करता है, वह इतने जिम्मेदार पद पर बने रहने के योग्य नहीं है।

READ ALSO  जन्म प्रमाणपत्र मुद्दा: हाई कोर्ट ने छात्र को दिल्ली राज्य स्कूल खेलों में क्रिकेट मैच में भाग लेने की अनुमति दी

अदालत ने आगे कहा कि अधिकारी ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है, जिसके चलते कर्मचारियों को अदालतों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

तीन दशकों की सेवा और पेंशन का विवाद

प्रेमलता सुरेश गोरे 20 जून 1992 को पुणे के आबासाहेब गरवारे कॉलेज में एक अनुदानित पद पर अंशकालिक (पार्ट-टाइम) शिक्षिका के रूप में नियुक्त हुई थीं। उन्होंने 30 जून 2010 तक यानी 18 वर्षों तक इसी पद पर अपनी सेवा दी। इसके बाद, 1 जुलाई 2010 को उन्हें पूर्ण अनुदानित पद पर पूर्णकालिक व्याख्याता के पद पर नियुक्त किया गया। लगभग 30 वर्षों की सेवा पूरी करने के बाद वह 31 जनवरी 2022 को सेवानिवृत्त हुईं।

सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने महाराष्ट्र सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1982 के तहत पुरानी पेंशन योजना के लाभ की माँग की। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता कुमुद भाटिया ने दलील दी कि 30 वर्ष की अर्हक सेवा (क्वालीफाइंग सर्विस) की गणना के लिए 1992 से 2010 तक की उनकी अंशकालिक अनुदानित सेवा को जोड़ा जाना चाहिए।

READ ALSO  क्या पांच पदों को भरने की सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की ताजा सिफारिशों से बदलेगा भविष्य का सीजेआई (CJI) उत्तराधिकार क्रम?

अदालत के निर्देश के बावजूद खारिज किया गया था दावा

पुणे के शिक्षा उपनिदेशक ने पूर्व में शिक्षिका के दावे को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि उनकी पूर्णकालिक नियुक्ति 2010 में हुई थी, जो पुरानी पेंशन योजना की तय कट-ऑफ तारीख 1 नवंबर 2005 के बाद की है। विभाग का तर्क था कि वह अंशदायी पेंशन योजना (एनपीएस) के दायरे में आती हैं।

इसके खिलाफ शिक्षिका ने पहले भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। जुलाई 2025 में हाईकोर्ट ने अधिकारियों को अनुदानित शिक्षण संस्थानों के कर्मचारियों के पेंशन लाभ से जुड़े फुल बेंच के एक फैसले के आलोक में मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था।

इसके बावजूद, उपनिदेशक गणपत मोरे ने 30 अक्टूबर 2025 को दोबारा आदेश जारी कर पुराने तर्कों के आधार पर उनका दावा फिर खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने इस 30 अक्टूबर के आदेश को पूरी तरह यांत्रिक, मनमाना और गैर-कानूनी करार देते हुए कहा कि अधिकारी ने अदालत के स्पष्ट निर्देशों की अनदेखी की। इसके बाद पीठ ने शिक्षिका के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें पुरानी पेंशन देने और लापरवाह अधिकारी को पद से हटाने का आदेश दिया।

READ ALSO  महिला को 'रं*' कहना प्रथम दृष्टया धारा 509 के तहत अपराध, 'सा*' जैसी सामान्य गाली नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles