DTC बस कंडक्टर को 30 साल बाद मिली राहत, हाईकोर्ट ने रोके गए वेतन का बकाया चुकाने का दिया निर्देश

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) की अपील खारिज करते हुए तीन दशक पुराने एक मामले में बस कंडक्टर के हक में फैसला सुनाया है। अदालत ने डीटीसी को निर्देश दिया है कि वह अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत रोके गए कंडक्टर के वेतन का पूरा बकाया चुकाए। कोर्ट ने यह राहत इसलिए दी क्योंकि परिवहन निगम न तो विभागीय जांच से जुड़े दस्तावेज पेश कर सका और न ही यात्रियों या चेकिंग स्टाफ के जरिए गड़बड़ी के आरोपों को साबित कर पाया।

जस्टिस अमित महाजन की पीठ ने 14 सितंबर को पारित आदेश में अगस्त 2005 के औद्योगिक ट्रिब्यूनल के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया। ट्रिब्यूनल ने 1998 में कंडक्टर पर लगाई गई पेनल्टी को अवैध और अनुचित करार देते हुए उसे रोके गए वेतन के बकाये का हकदार माना था।

जांच रिकॉर्ड और गवाहों के अभाव में कार्रवाई निरस्त

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि डीटीसी 1998 के दंडात्मक आदेश से जुड़ी आंतरिक जांच की कार्यवाही या जांच अधिकारी की रिपोर्ट को ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश करने में पूरी तरह नाकाम रही। अदालत ने कहा कि इन दस्तावेजों के बिना यह तय करना संभव नहीं था कि संबंधित कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिला था या उस पर लगे आरोप वास्तव में साबित हुए थे।

जस्टिस महाजन ने यह भी दर्ज किया कि निगम प्रबंधन ने यह भी नहीं कहा था कि वह आरोपों को अलग से साबित करेगा। इसके अलावा, मामले में चेकिंग अधिकारियों, रिपोर्टर या यात्रियों में से किसी का भी बयान या साक्ष्य पेश नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में ट्रिब्यूनल का यह निष्कर्ष बिल्कुल सही था कि घरेलू जांच प्रक्रिया दूषित थी और कर्मचारी पर लगाया गया दंड गैरकानूनी था।

READ ALSO  मेघालय हाई कोर्ट ने ‘बिधान भवन’ (रॉय विला) को गिराने की प्रस्तावित कार्रवाई पर लगाई रोक

1996 में दिल्ली-पटियाला रूट पर लगे थे अधिक किराया वसूलने के आरोप

विवाद की शुरुआत 31 मई 1996 को जारी आरोप पत्र (चार्जशीट) से हुई थी। कंडक्टर उसी वर्ष डीटीसी से जुड़ा था। आरोप था कि दिल्ली से पटियाला जा रही बस में ड्यूटी के दौरान उसने यात्रियों से अधिक पैसे लेकर कम मूल्य के टिकट दिए।

आरोपों के मुताबिक, उसने कुछ यात्रियों से 13 रुपये लेकर केवल 5 रुपये के टिकट दिए। एक अन्य मामले में यात्री से 18 रुपये लेकर 8 रुपये का टिकट थमाया गया, जबकि 20 रुपये देने वाले एक अन्य यात्री को सिर्फ 15 रुपये का टिकट जारी किया गया। इसके साथ ही कंडक्टर पर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने और बस ड्राइवर के साथ मिलकर चेकिंग स्टाफ को चोट पहुंचाने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया गया था।

विभागीय दंड से लेकर हाईकोर्ट के फैसले तक का घटनाक्रम

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट ने मंदिरों के पास तम्बाकू पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज की

आंतरिक जांच के बाद डीटीसी ने 29 मई 1998 को आदेश जारी कर कंडक्टर की तीन सालाना वेतन वृद्धियां (इन्क्रीमेंट) रोक दी थीं। कंडक्टर ने इस सजा के खिलाफ विभागीय अपील की, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उसने औद्योगिक ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया।

अगस्त 2005 में ट्रिब्यूनल ने फैसला सुनाया कि यह सजा अवैध और अनुचित थी, इसलिए कर्मचारी रोके गए वेतन के बकाये का हकदार है।

डीटीसी ने ट्रिब्यूनल के इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान निगम की ओर से वकील मनीषा त्यागी पेश हुईं, जबकि कंडक्टर की तरफ से कोई वकील उपस्थित नहीं हुआ। हाईकोर्ट ने सभी पहलुओं की समीक्षा के बाद निगम की याचिका को खारिज करते हुए कंडक्टर को राहत देने वाले ट्रिब्यूनल के आदेश पर मुहर लगा दी।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles