कलकत्ता हाईकोर्ट ने सर्विस हथियार से अपने साथी जवान के साथ मारपीट में शामिल रहे केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के एक पूर्व कांस्टेबल की अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि किसी अनुशासित सशस्त्र बल के सदस्य का अपने ही सहयोगी के साथ हाथापाई करना और हथियार का इस्तेमाल करना घोर अशोभनीय आचरण के दायरे में आता है।
जस्टिस अजय कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने 9 सितंबर को सुनाए अपने फैसले में कहा कि ड्यूटी के दौरान या ड्यूटी समय के बाद भी किसी सहकर्मी से हिंसक टकराव करना और जारी किए गए सर्विस हथियार का सहारा लेना एक अनुशासित बल के तय मानकों के पूरी तरह खिलाफ है। अदालत ने पाया कि विभागीय जांच में सभी प्रक्रियाओं का सही ढंग से पालन किया गया था और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की कोई अनदेखी नहीं हुई थी।
कानून में ‘कदाचार’ की परिभाषा न होना राहत का आधार नहीं
याचिकाकर्ता की ओर से दी गई इस दलील को हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया कि सीआईएसएफ नियमों में ‘कदाचार’ (मिसकंडक्ट) शब्द की कोई स्पष्ट वैधानिक परिभाषा मौजूद नहीं है। जस्टिस गुप्ता ने टिप्पणी की कि किसी संहिताबद्ध परिभाषा के न होने मात्र से कदाचार का आरोप अस्पष्ट या निष्प्रभावी नहीं हो जाता, विशेषकर तब जब संबंधित आचरण सीधे तौर पर उस अनुशासन पर चोट करता हो जिसे बनाए रखने की अपेक्षा बल से की जाती है। अदालत ने कहा कि देश के प्रमुख अनुशासित बलों में शुमार सीआईएसएफ के किसी सदस्य से ऐसे हिंसक झगड़े की तनिक भी अपेक्षा नहीं की जा सकती।
साल 2013 में हुआ था विवाद, लकड़ी काटने वाले औजार और राइफल तक पहुंची थी बात
यह पूरा मामला 4 फरवरी 2013 की रात का है। याचिकाकर्ता कांस्टेबल की रात 9 बजे से ड्यूटी शुरू होनी थी। अपनी शिफ्ट शुरू होने से ठीक दस मिनट पहले, लगभग रात 8:50 बजे, उसका अपने एक साथी कांस्टेबल से व्यक्तिगत बात को लेकर विवाद हो गया, जो अपनी ड्यूटी पूरी करके लौटा ही था।
देखते ही देखते यह कहासुनी हाथापाई में बदल गई। मामले के विवरण के अनुसार, विवाद के दौरान दूसरे कांस्टेबल ने कथित तौर पर लकड़ी काटने का औजार उठा लिया, जिसके जवाब में याचिकाकर्ता ने अपनी सर्विस राइफल उठा ली। इस हिंसक झड़प में एक कांस्टेबल की अनामिका उंगली (रिंग फिंगर) टूट गई थी।
घटना के बाद हुई विभागीय जांच में दोनों जवानों को अनुशासनहीनता और आपसी झगड़े का दोषी पाया गया। जांच रिपोर्ट पर विचार करने के बाद अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने याचिकाकर्ता को सेवा से अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने का आदेश पारित किया, हालांकि उसे पेंशन का पात्र बनाए रखा गया।
अनुशासनात्मक इतिहास: पहले भी 12 बार मिल चुकी थी सजा
याचिकाकर्ता 4 जुलाई 1994 को सीआईएसएफ में शामिल हुआ था। अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश के खिलाफ उसने विभागीय स्तर पर अपील की थी, जिसे अपीलीय प्राधिकारी ने 28 फरवरी 2014 को खारिज कर दिया था। इसके बाद महानिरीक्षक (आईजी) के समक्ष दायर उसकी पुनर्विचार याचिका भी निरस्त कर दी गई, जिसके बाद उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
अदालत में याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता रबींद्रनाथ बाग और अधिवक्ता पियास चौधरी ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को बिना किसी ठोस आधार और पर्याप्त सबूत के झूठा फंसाया गया है।
इसके उलट, सीआईएसएफ की ओर से पेश अधिवक्ता देवप्रिया गुप्ता और मोनी शंकर सेनगुप्ता ने अदालत के सामने तथ्य रखा कि याचिकाकर्ता का पूर्व सेवाकाल भी गंभीर अनुशासनहीनता से भरा रहा है। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता को खराब आचरण और गैर-कानूनी कृत्यों के लिए उसके सेवाकाल के दौरान 12 बार अलग-अलग दंड दिए जा चुके थे, लेकिन लगातार चेतावनियों के बाद भी उसने अपने व्यवहार में कोई सुधार नहीं किया। हाईकोर्ट ने इस पूर्व अनुशासनात्मक रिकॉर्ड और आचरण को ध्यान में रखते हुए पूर्व कांस्टेबल की याचिका खारिज कर दी।

