सड़क हादसे में मौत के बाद क्लेम खारिज करने पर एसबीआई लाइफ को झटका, उपभोक्ता आयोग ने विधवा को 41 लाख रुपये चुकाने का दिया आदेश

आंध्र प्रदेश के काकीनाडा जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी की दलील खारिज करते हुए एक मृतक की पत्नी के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया है कि वह सड़क हादसे में जान गंवाने वाले व्यक्ति की विधवा को बीमा राशि, ब्याज और मुआवजे के रूप में लगभग 41 लाख रुपये का भुगतान करे। कंपनी ने यह दावा करते हुए क्लेम खारिज कर दिया था कि पॉलिसीधारक ने पहले से मौजूद बीमारियों की जानकारी छिपाई थी, जिसे आयोग ने पूरी तरह आधारहीन करार दिया।

आयोग के अध्यक्ष रघुपति वसंत कुमार और सदस्य चक्का सूसी व चागंती नागेश्वर राव की पीठ ने माना कि मृतक की पत्नी बीमा राशि पाने की पूरी हकदार हैं। पीठ ने कहा कि एसबीआई लाइफ यह साबित करने में नाकाम रही कि मृतक ने दुर्भावना या जानबूझकर तथ्य छिपाए थे, जिसके आधार पर क्लेम को निरस्त किया जा सके।

उपभोक्ता फोरम ने असंदिग्ध बकाया प्रीमियम काटने के बाद 39.87 लाख रुपये की शुद्ध बीमा राशि 31 अक्टूबर 2025 से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ चुकाने का आदेश दिया। इसके अलावा, मानसिक प्रताड़ना, परेशानी और कानूनी खर्च के एवज में पीड़िता को 1.05 लाख रुपये का अतिरिक्त हर्जाना देने का भी निर्देश दिया गया।

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सड़क हादसे में मौत और क्लेम खारिज होने का मामला

मामले के अनुसार, कोमारा नानाजी राव ने 23 अक्टूबर 2024 को एसबीआई लाइफ की ‘ई-शील्ड इंस्टा प्लान ए पॉलिसी’ ली थी। 40 लाख रुपये की बीमा राशि वाली इस पॉलिसी का प्रीमियम सीधे उनके बैंक बचत खाते से कटता था और उन्होंने अपनी पत्नी को इसमें नॉमिनी बनाया था।

पॉलिसी लेने के महज तीन महीने बाद, 27 जनवरी 2025 की रात नानाजी राव मोटरसाइकिल से काकीनाडा के तटीय इलाके उप्पाडा जा रहे थे। रास्ते में काकीनाडा ग्रामीण मंडल के सूर्यरावपेटा स्थित नैरो ब्रिज के पास उनकी बाइक अनियंत्रित होकर नहर में गिर गई। अगली सुबह गोताखोरों ने नहर से उनका शव बरामद किया।

इस घटना के बाद थिम्मापुरम पुलिस स्टेशन ने प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की। रंगराया मेडिकल कॉलेज के फॉरेंसिक मेडिसिन एंड टॉक्सिकोलॉजी विभाग द्वारा किए गए पोस्टमार्टम में मौत की वजह पानी में डूबने से दम घुटना (एस्फिक्सिया) बताई गई। रासायनिक परीक्षक की डायटम टेस्ट रिपोर्ट में भी डूबने की पुष्टि हुई। पुलिस ने विस्तृत जांच में किसी भी तरह की साजिश या संदेहास्पद स्थिति से इनकार करते हुए केस बंद कर दिया।

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पति की असामयिक मृत्यु के बाद जब उनकी विधवा ने आवश्यक दस्तावेजों के साथ दावा पेश किया, तो एसबीआई लाइफ ने 30 अक्टूबर 2025 को एक पत्र भेजकर क्लेम खारिज कर दिया। साथ ही, कंपनी ने 6,898 रुपये का प्रीमियम वापस लौटा दिया।

बीमारी छिपाने के आरोप पर बीमा कंपनी की दलील

दावा निरस्त करने के पीछे बीमा कंपनी ने दलील दी कि पॉलिसीधारक ने आवेदन के समय ‘अत्यंत सद्भाव के सिद्धांत’ का उल्लंघन किया था। कंपनी का कहना था कि फॉर्म भरते समय उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) और डायबिटीज (मधुमेह) से जुड़े सवालों के जवाब में नानाजी राव ने ‘ना’ का विकल्प चुना था।

कंपनी ने दावा किया कि जांच के दौरान अस्पताल के ऐसे रिकॉर्ड और पर्चे मिले, जिनसे पता चला कि पॉलिसी लेने से पहले उनका ब्लड शुगर और बीपी का इलाज चल रहा था। बीमा कंपनी का तर्क था कि यदि पॉलिसीधारक ने अपनी इन बीमारियों का खुलासा किया होता, तो उनका बीमा प्रस्ताव ही स्वीकार नहीं किया जाता।

इसके विपरीत, मृतक की पत्नी ने आयोग में तर्क दिया कि कंपनी की यह कार्रवाई मनमानी, सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का स्पष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा कि उनके पति की मृत्यु एक अप्रत्याशित हादसे में डूबने से हुई थी, जिसका कथित बीमारियों से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था।

आयोग का रुख: मेडिकल रिकॉर्ड मात्र से गलत इरादा साबित नहीं होता

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उपभोक्ता आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद विधवा के पक्ष में फैसला दिया। पीठ ने रेखांकित किया कि पीड़िता ने यह साबित करने के लिए ठोस और सुसंगत साक्ष्य पेश किए हैं कि यह पूरी तरह से एक दुर्घटना थी, जिसमें डूबने से मौत हुई।

पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल पुराने मेडिकल पर्चे या बढ़े हुए ब्लड प्रेशर और शुगर से ठीक होने के रिकॉर्ड पेश कर देने से यह साबित नहीं हो जाता कि पॉलिसीधारक ने धोखाधड़ी की मंशा से तथ्य छिपाए थे।

आयोग ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि बीमा कंपनी के अनुचित रवैये के कारण शिकायतकर्ता को अनावश्यक मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न और आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। पीठ ने माना कि पीड़िता बीमा की पूरी हकदार हैं और कंपनी को तुरंत तय राशि का भुगतान करने का आदेश दिया।

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