एचपीवी टीकाकरण अभियान को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को वापस लेने की अनुमति दी

सुप्रीम कोर्ट ने किशोरियों के लिए चलाए जा रहे राष्ट्रव्यापी ह्यूमन पेपिलोमावायरस (एचपीवी) टीकाकरण कार्यक्रम में अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की मांग करने वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत के कड़े रुख के बाद याचिकाकर्ता संगठन ने अपनी अर्जी वापस ले ली। याचिका में यह दावा किया गया था कि एचपीवी टीका प्रजनन क्षमता को प्रभावित करता है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने दिल्ली के डॉक्टरों और शिक्षाविदों के मंच ‘यूनिवर्सल हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन’ (यूएचओ) द्वारा दायर इस याचिका पर सुनवाई की। संगठन ने आरोप लगाया था कि यह टीकाकरण अभियान अभिभावकों की समुचित और सूचित सहमति लिए बिना चलाया जा रहा है। हालांकि, पीठ ने याचिका के आधार पर असहमति जताई, जिसके बाद संगठन ने इसे वापस लेने का फैसला किया।

टीके की वैश्विक स्वीकृति पर अदालत की टिप्पणी

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सुनवाई के दौरान जस्टिस जोयमाल्या बागची ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए याचिका के औचित्य पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि डब्ल्यूएचओ अपने सामाजिक चिकित्सा अभियान के तहत खुद एचपीवी वैक्सीन की सिफारिश करता है। ऐसे में डॉक्टरों के संगठन की ओर से इस तरह की याचिका लेकर अदालत आना समझ से परे है।

निगरानी तंत्र और मुआवजे की मांग

यूएचओ की ओर से पेश वकील शिवन रघुवंशी ने अदालत में स्पष्ट किया कि वे टीकाकरण के खिलाफ नहीं हैं। उन्होंने दलील दी कि उनका पहला विरोध कार्यक्रम को लागू करने के तौर-तरीकों को लेकर है। इसके अलावा, टीका लगने के बाद सामने आने वाले किसी भी प्रतिकूल प्रभाव की निगरानी के लिए एक पुख्ता तंत्र तैयार किया जाना चाहिए और ऐसे मामलों में उचित मुआवजा नीति भी लागू होनी चाहिए।

अदालत के सख्त रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता ने याचिका को आगे न बढ़ाने का फैसला किया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसे वापस लेने की अनुमति देते हुए खारिज कर दिया।

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