कर्नाटक हाईकोर्ट ने खारिज की मृत व्यक्ति के नाम पर चली 33 साल पुरानी याचिका, 10 हजार का जुर्माना भी लगाया

कर्नाटक हाईकोर्ट ने जमीन से जुड़े एक पुराने विवाद में बड़ा फैसला सुनाते हुए याचिका खारिज कर दी है और याचिकाकर्ताओं पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत की जांच में सामने आया कि वर्ष 1993 में जिस व्यक्ति के नाम पर यह मुकदमा शुरू किया गया था, उसका निधन उससे पांच साल पहले यानी 1988 में ही हो चुका था। जिस पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए यह मामला दायर किया गया था, वह भी व्यक्ति की मृत्यु के साथ कानूनी रूप से समाप्त हो चुकी थी।

न्यायमूर्ति ई. एस. इंद्रेश की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि मृत व्यक्ति के नाम पर शुरू की गई कानूनी प्रक्रिया और उसके आधार पर पूर्व में जारी अदालती निर्देश कानून की नजर में पूरी तरह शून्य और अमान्य हैं। इस फैसले के बाद राज्य के श्रीरंगपट्टण तालुक स्थित बेलवाड़ी गांव की 4.21 एकड़ जमीन पर किरायेदार सी. निंगम्मा को मिले अधिकार अब पूरी तरह बहाल हो गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट के नजीरों का दिया हवाला

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित कानूनी सिद्धांतों के तहत ऐसी किसी भी याचिका पर जारी आदेश कानूनी अस्तित्व नहीं रखते। पीठ ने पाया कि 1993 में दायर की गई मूल याचिका ही अवैध थी, इसलिए उस याचिका पर वर्ष 2001 में हाईकोर्ट द्वारा मामले को वापस ट्रिब्यूनल भेजने का निर्देश भी स्वतः निष्प्रभावी हो गया। अदालत ने मौजूदा याचिका में कोई ठोस आधार न पाते हुए इसे खारिज कर दिया।

चार दशक पुराना है जमीन का विवाद

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यह पूरा मामला श्रीरंगपट्टण तालुक के बेलवाड़ी गांव की 4.21 एकड़ जमीन से जुड़ा है। श्रीरंगपट्टण लैंड ट्रिब्यूनल ने 9 नवंबर 1981 को एक आदेश पारित कर किरायेदार सी. निंगम्मा को इस जमीन का कब्जा और मालिकाना हक दिया था। इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जिसके बाद 2001 में हाईकोर्ट ने मामले पर दोबारा विचार करने के लिए इसे ट्रिब्यूनल को वापस भेज दिया था।

उत्तराधिकारियों की नई याचिका भी नामंजूर

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बाद में इस मामले में नया मोड़ तब आया जब मरियप्पा की बेटियों और कानूनी वारिसों—सुमालम्मा, तुलसम्मा और वेंकटलक्ष्मम्मा—ने ट्रिब्यूनल के मार्च 2023 के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में एक नई रिट याचिका दाखिल की। उनका आरोप था कि ट्रिब्यूनल ने नियमों की अनदेखी की और उनकी जानकारी के बिना, यानी पीठ पीछे यह फैसला सुना दिया।

हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि 1988 में मरियप्पा के निधन के साथ ही पावर ऑफ अटॉर्नी खत्म हो गई थी, इसलिए 1993 की पूरी कार्यवाही अवैध थी। इसी आधार पर अदालत ने बेटियों की याचिका खारिज करते हुए साफ किया कि 1981 में निंगम्मा के पक्ष में जारी लैंड ट्रिब्यूनल का मूल फैसला ही अंतिम माना जाएगा।

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