कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि शादी के वादे के आधार पर बनाए गए और जारी रखे गए शारीरिक संबंधों को सहमति से बने संबंध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने बलात्कार, धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी के मामले में एक व्यक्ति को बरी करने वाला ट्रायल कोर्ट का 2018 का फैसला रद्द करते हुए उसे दोषी ठहराया और बलात्कार के अपराध में उम्रकैद की सजा सुनाई।
जस्टिस एच.पी. संदेश और जस्टिस बी. प्रमोद की डिवीजन बेंच ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 417, 376 और 506 के तहत दोषी ठहराया।
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने शादी के वादे, पीड़िता की शिकायत और उस DNA रिपोर्ट पर उचित विचार नहीं किया था, जिसमें आरोपी के पीड़िता के बच्चे का जैविक पिता होने की पुष्टि हुई थी।
क्या था मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने पीड़िता से शादी करने का वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए थे। दोनों के बीच जुलाई 2012 तक संबंध जारी रहे।
इस दौरान पीड़िता गर्भवती हो गई। जब उसने आरोपी को गर्भावस्था के बारे में बताया, तो उसने गर्भपात कराने के लिए कहा।
पीड़िता ने गर्भपात कराने से इनकार कर दिया और आरोपी से शादी करने के लिए कहा। लेकिन आरोपी ने शादी करने से इनकार कर दिया और उसे जान से मारने की धमकी दी।
मामले की सुनवाई करने वाले तिपटूर के पांचवें अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने 3 अक्टूबर 2018 को आरोपी को बरी कर दिया था।
ट्रायल कोर्ट का मानना था कि आरोपी और पीड़िता एक-दूसरे से प्रेम करते थे और उनके बीच शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बने थे।
ट्रायल कोर्ट ने डॉक्टर के उस बयान पर भी भरोसा किया था, जिसमें कहा गया था कि पीड़िता के शरीर पर जबरन शारीरिक संबंध बनाए जाने के निशान नहीं मिले थे।
इस फैसले को पीड़िता ने सीआरपीसी की धारा 372 के तहत कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
पीड़िता की ओर से न्यायमित्र (Amicus Curiae) नियुक्त एडवोकेट संपंगी रमैया और राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट गवर्नमेंट प्लीडर सुहास गौड़ा एम. ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद महत्वपूर्ण साक्ष्यों पर विचार किए बिना आरोपी को बरी कर दिया।
उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया था।
दूसरी ओर, आरोपी के वकील ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से बने थे और मामले में IPC की धारा 376 तथा 417 लागू नहीं होतीं।
प्रेम संबंध होना आरोपी को बरी करने का आधार नहीं: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता की शिकायत और उसके बयान का उचित दृष्टिकोण से परीक्षण नहीं किया था।
पीड़िता ने लगातार अपने बयानों में कहा था कि आरोपी फोन पर बार-बार उससे केवल उसी से शादी करने का वादा करता था।
इस पहलू पर विचार करते हुए डिवीजन बेंच ने कहा,
“दोनों के बीच प्रेम संबंध होना आरोपी को बरी करने का आधार नहीं हो सकता।”
कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने केवल इस आधार पर संबंधों को सहमति से बना हुआ माना था कि दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते थे।
शादी के वादे पर शारीरिक संबंध बनाने से चोट के निशान होना जरूरी नहीं
हाईकोर्ट ने डॉक्टर के उस बयान पर भी विचार किया जिसमें पीड़िता के निजी अंगों पर जबरदस्ती के निशान नहीं मिलने की बात कही गई थी।
इस पर बेंच ने कहा,
“जब आरोपी ने पीड़िता से शादी का वादा किया हो और उस वादे के आधार पर उसकी सहमति प्राप्त करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए हों, तो कोर्ट पीड़िता के निजी अंगों पर चोट के निशान होने की अपेक्षा नहीं कर सकता।”
हाईकोर्ट ने आगे कहा,
“शादी के वादे के आधार पर दोनों के बीच लगातार बनाए गए शारीरिक संबंधों को सहमति से बने शारीरिक संबंध नहीं माना जा सकता।”
DNA रिपोर्ट से आरोपी के बच्चे का पिता होने की पुष्टि
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले के पैराग्राफ 42 में स्वयं यह माना था कि DNA रिपोर्ट के अनुसार आरोपी पीड़िता के बच्चे का जैविक पिता था।
इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने IPC की धारा 417 के दायरे पर चर्चा किए बिना आरोपी को बरी कर दिया।
बेंच ने यह भी पाया कि ट्रायल कोर्ट ने IPC की धारा 506 के संबंध में कोई चर्चा नहीं की थी।
जबकि पीड़िता ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि आरोपी ने दुपट्टे से उसकी जान लेने की कोशिश की थी।
कोर्ट ने इस बात का भी उल्लेख किया कि शिकायत दाखिल करते समय पीड़िता की उम्र करीब 19 वर्ष थी।
पीड़िता के साक्ष्य के अनुसार, आरोपी ने उससे शादी का वादा उस समय किया था जब वह नाबालिग थी और दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे।
ट्रायल कोर्ट ने महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मल्लप्पा एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य, (2024) 3 SCC 544 और पी. युवप्रकाश बनाम राज्य (18 जुलाई 2023) के फैसलों पर भरोसा किया।
बेंच ने कहा कि यदि ट्रायल कोर्ट ने ठोस साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया है, तो अपीलीय अदालत आरोपी को बरी करने वाले फैसले को दोषसिद्धि में बदल सकती है।
हाईकोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामले में ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के विपरीत और स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण थे।
इसी आधार पर बेंच ने आरोपी को बरी करने वाला फैसला रद्द कर दिया।
आरोपी ने सजा के बजाय 5 लाख रुपये मुआवजा देने की पेशकश की
सजा के सवाल पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने रिकॉर्ड किया कि आरोपी ने दोषसिद्धि और सजा स्वीकार करने के बजाय 5 लाख रुपये मुआवजा देने की पेशकश की थी।
हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि आरोपी ने पीड़िता से शादी करने की अदालत की सलाह मानने से इनकार कर दिया था।
इसके अलावा, ट्रायल कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पीड़िता और उसके बच्चे के लिए अलग-अलग 2,000 रुपये मासिक भरण-पोषण देने का आदेश दिया था, लेकिन आरोपी ने वह राशि भी नहीं चुकाई थी।
हाईकोर्ट ने बलात्कार के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई
हाईकोर्ट ने आरोपी को तीन अपराधों में अलग-अलग सजा सुनाई।
- IPC की धारा 417 (धोखाधड़ी): एक वर्ष की कैद और 1 लाख रुपये जुर्माना।
- IPC की धारा 376 (बलात्कार): आजीवन कारावास और 5 लाख रुपये जुर्माना।
- IPC की धारा 506 (आपराधिक धमकी): दो वर्ष की कैद और 1 लाख रुपये जुर्माना।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तीनों सजाएं एक साथ चलेंगी।
आरोपी को बेंगलुरु की सेंट्रल जेल भेज दिया गया।
जुर्माने की राशि पीड़िता और बच्चे को मिलेगी
हाईकोर्ट ने कुल 7 लाख रुपये के जुर्माने के इस्तेमाल को लेकर भी निर्देश दिए।
कोर्ट ने कहा कि इसमें से 5 लाख रुपये पीड़िता के बच्चे के नाम फिक्स्ड डिपॉजिट में रखे जाएंगे। यह राशि बच्चे के 18 वर्ष का होने तक जमा रहेगी।
शेष 2 लाख रुपये पीड़िता को उसके जीवनयापन और बच्चे की शिक्षा के लिए दिए जाएंगे।
बरी होने पर भी पीड़िता मुआवजे की हकदार हो सकती है
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सीआरपीसी की धारा 357A के तहत उपलब्ध अधिकारों का इस्तेमाल नहीं किए जाने पर भी आपत्ति जताई।
बेंच ने कहा,
“आरोपी के बरी होने की स्थिति में भी पीड़िता मुआवजे की हकदार है, क्योंकि पीड़िता ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन किया था।”
हाईकोर्ट ने तुमकुरु जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह चार महीने के भीतर पीड़िता और उसके बच्चे को अधिकतम मुआवजा प्रदान करे।
इसके अलावा, कोर्ट ने रजिस्ट्री को पीड़िता की ओर से नियुक्त न्यायमित्र को 10,000 रुपये फीस देने का निर्देश दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: एम. बनाम डी. एवं अन्य
केस नंबर: आपराधिक अपील संख्या 2047/2018
बेंच: जस्टिस एच.पी. संदेश और जस्टिस बी. प्रमोद
फैसले की तारीख: 17 अक्टूबर 2026
