रेगुलराइजेशन से पहले की तदर्थ सेवा भी पेंशन की अर्हक सेवा में जुड़ेगी, पुरानी पेंशन योजना का मिलेगा लाभ: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लंबे समय तक तदर्थ (एड-हॉक) या दैनिक वेतन पर कार्य करने के बाद नियमित (रेगुलराइज) किए गए कर्मचारी पेंशन लाभ के लिए अपनी पूर्व-नियमितीकरण सेवा को भी अर्हक सेवा (क्वालिफाइंग सर्विस) के रूप में जोड़ने के हकदार हैं, जिससे वे 1 जनवरी 2004 से पहले लागू पुरानी पेंशन योजना के दायरे में आएंगे। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने अपने नियमित कर्मचारियों के खिलाफ पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड द्वारा दायर अपील खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। शीर्ष अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सिंगल जज और डिवीजन बेंच के फैसलों की पुष्टि करते हुए कहा कि सेवा में आए प्रशासनिक या कृत्रिम ब्रेक को नजरअंदाज किया जाना चाहिए और सेवा को निरंतर माना जाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड एक्ट, 1969 के तहत गठित स्वायत्त वैधानिक संस्था पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड ने 1993 से 1996 के बीच प्रतिवादी-कर्मचारियों को क्लर्क और चपरासी के पदों पर अनुबंध, तदर्थ, दैनिक वेतन या वर्क-चार्ज आधार पर शुरू में 89 दिनों की अवधि के लिए तैनात किया था।

नियमित नियुक्तियों और सेवा समाप्ति को लेकर चले लंबे मुकदमेबाजी के बाद, पंजाब सरकार ने 23 जनवरी 2001 को एक अधिसूचना जारी की। इसमें तीन वर्ष की सेवा पूरी कर चुके वर्क-चार्ज, दैनिक वेतनभोगी और अन्य श्रेणियों के कर्मचारियों को नियमित करने की नीति में संशोधन किया गया। यद्यपि हाईकोर्ट ने 2001 में माना था कि जब तक स्वायत्त बोर्ड सरकारी निर्देशों को स्वीकार न करे, वे स्वतः उस पर बाध्यकारी नहीं होते, फिर भी बोर्ड ने इस मामले की जांच के लिए एक समिति का गठन किया।

9 जुलाई 2004 को समिति ने मानवीय आधार पर एकमुश्त उपाय के रूप में यथोचित परिवर्तनों (म्यूटैटिस म्यूटेंडिस) के साथ 23 जनवरी 2001 की सरकारी नीति को अपनाने की सिफारिश की। यह उन कर्मचारियों के लिए थी जो उस तिथि तक तीन वर्ष की सेवा पूरी कर चुके थे और सेवा में थे। बोर्ड ने 13 जुलाई 2004 को इस सिफारिश को मंजूरी दी, 18 जुलाई 2004 को अखबार में सार्वजनिक सूचना जारी की और अगस्त 2004 से नियुक्ति पत्र जारी करना शुरू कर दिया।

नियमित होने के बाद कर्मचारियों ने पुरानी पेंशन योजना के तहत पेंशन की मांग उठाई। 28 नवंबर 2011 को बोर्ड ने इस लाभ के विस्तार के लिए राज्य सरकार से अनुमति मांगी। लेकिन 9 दिसंबर 2011 को राज्य सरकार ने इस आधार पर मांग अस्वीकार कर दी कि 1 जनवरी 2004 से नई डिफाइंड कंट्रीब्यूटरी पेंशन स्कीम लागू हो चुकी है। बोर्ड ने बाद में नई अंशदायी योजना की अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया, जिसके बाद कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट के सिंगल जज और डिवीजन बेंच दोनों ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए माना कि कर्मचारियों का वास्तव में नियमितीकरण हुआ था और वे सेवानिवृत्ति लाभों के लिए अपनी पूर्व-नियमितीकरण सेवा की गणना कराने के हकदार हैं।

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दोनों पक्षों के तर्क

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता बोर्ड ने तर्क दिया कि मुकदमों के पिछले दौर कर्मचारियों के खिलाफ ‘रेस ज्यूडिकाटा’ (प्रांग्न्याय) के रूप में कार्य करते हैं। बोर्ड ने यह भी दलील दी कि अगस्त 2004 की नियुक्तियां नियमितीकरण नहीं बल्कि नई नियुक्तियां थीं, क्योंकि कर्मचारियों को “नियुक्ति” पत्र जारी किए गए थे, उन्हें टाइपराइटिंग परीक्षा पास करनी थी, एक वर्ष की परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि पूरी करनी थी और मेडिकल फिटनेस प्रमाण पत्र जमा करना था। इसके अलावा बोर्ड ने कहा कि एक स्वायत्त निकाय होने के नाते वह 1 जनवरी 2004 के बाद नई कंट्रीब्यूटरी पेंशन स्कीम से शासित था।

दूसरी ओर, प्रतिवादी-कर्मचारियों ने तर्क दिया कि केवल “नियुक्ति” पत्र की नामपद्धति (नोमेनक्लेचर) 1990 के दशक से चले आ रहे निरंतर सेवा संबंध को समाप्त नहीं कर सकती। उनका कहना था कि उनकी सेवाएं 23 जनवरी 2001 की नीति के तहत ही नियमित की गई थीं। पूर्व न्यायिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए कर्मचारियों ने कहा कि अनुबंध, तदर्थ या दैनिक वेतन पर की गई पूर्व-नियमितीकरण सेवा को सेवानिवृत्ति लाभों के लिए अर्हक सेवा में गिना जाना अनिवार्य है। चूंकि उनकी सेवा में प्रारंभिक प्रवेश 1 जनवरी 2004 से पहले का था, इसलिए वे पुरानी पेंशन व्यवस्था के हकदार हैं।

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कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने बोर्ड की ‘रेस ज्यूडिकाटा’ वाली प्रारंभिक आपत्ति को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पहले के मुकदमे नियमितीकरण की मांग को लेकर थे, जबकि वर्तमान विवाद बाद में हुए नियमितीकरण से उत्पन्न पेंशन संबंधी परिणामों से जुड़ा है।

नियुक्ति की प्रकृति पर पीठ ने स्पष्ट किया कि “प्रतिवादी-कर्मचारियों की नियुक्ति का सार उसके बाह्य स्वरूप पर प्रभावी होना चाहिए।” कोर्ट ने रेखांकित किया कि 18 जुलाई 2004 को जारी सार्वजनिक सूचना आम जनता के लिए नहीं थी, बल्कि उसमें केवल स्थायी रिक्त पदों पर पहले से काम कर रहे कर्मचारियों को नियमित आधार पर नियुक्त करने के निर्णय पर आपत्तियां मांगी गई थीं। कोर्ट ने 20 अक्टूबर 2011 को राज्य सरकार को लिखे गए बोर्ड के अपने पत्र का भी उल्लेख किया, जिसमें बोर्ड ने खुद स्वीकार किया था कि इन कर्मचारियों को लंबी सेवा के बाद नियमित किया गया था और उनकी भर्ती 1 जनवरी 2004 से बहुत पहले हुई थी।

पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड (कर्मचारी पेंशन, भविष्य निधि और ग्रेच्युटी) विनियम, 1991 के विनियम 3, 5(i) और 8(2) का परीक्षण करते हुए शीर्ष अदालत ने पेंशन अधिकारों पर कानून की स्थिति को दोहराया। डी.एस. नकारा एवं अन्य बनाम भारत संघ मामले में संविधान पीठ के निर्णय का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि “पेंशन न तो कोई खैरात है और न ही अनुग्रह राशि, बल्कि यह पिछली सेवा के बदले किया जाने वाला भुगतान है।” जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने टिप्पणी की:

“इस न्यायालय की संविधान पीठ ने डी.एस. नकारा (उपरोक्त) में यह भी सही कहा था कि पेंशन का भुगतान सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करने वाला एक सामाजिक कल्याण उपाय है। जैसा कि उपरोक्त प्रावधान भी संहिताबद्ध करते हैं, पेंशन एक आस्थगित वेतन (डेफर्ड वेज) है जिसे कर्मचारी द्वारा दी गई सेवा के आधार पर आंका और भुगतान किया जाना चाहिए। जब किसी कर्मचारी ने लंबी और निरंतर सेवा दी है और अंततः वह नियमित हो जाता है, तो तकनीकी या कृत्रिम आधारों पर पेंशन लाभों से इनकार करना आमतौर पर अनुचित है।”

पीठ ने हाईकोर्ट द्वारा हरबंस लाल बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य (जिसमें केसर चंद बनाम पंजाब राज्य के पूर्ण पीठ के फैसले पर भरोसा किया गया था) के निर्णय को सही ठहराया, जिसमें यह तय हुआ था कि नियमितीकरण से पहले की दैनिक वेतन सेवा को पेंशन के लिए अर्हक सेवा में गिना जाना चाहिए। सेवा में आए व्यवधानों पर कोर्ट ने माना:

“सेवा में आए ब्रेक या तो ‘काल्पनिक’ थे या कृत्रिम/प्रशासनिक ब्रेक थे, अथवा अदालती आदेशों के कारण बने थे। उन्हें नजरअंदाज किया जाना चाहिए और सेवा को निरंतर माना जाना चाहिए।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि बोर्ड का स्वायत्त दर्जा उसके बचाव में नहीं आ सकता, क्योंकि उसने सरकारी नियमितीकरण नीति को यथोचित परिवर्तनों के साथ स्वेच्छा से अपनाया था। प्रोबेशन या टाइपिंग टेस्ट जैसी शर्तें बोर्ड की जरूरतों के अनुकूल बनाई गई प्रक्रियात्मक व्यवस्था थीं, न कि कोई नई भर्ती।

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के सिंगल जज और डिवीजन बेंच के आदेशों को वैध ठहराते हुए माना कि कर्मचारियों का नियमितीकरण हुआ था और उन्हें 1 जनवरी 2004 से पहले सेवा में आया हुआ माना जाएगा।

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अदालत ने निर्देश दिया कि कर्मचारी डिफाइंड कंट्रीब्यूटरी पेंशन स्कीम के टियर II के तहत आते हैं और उन्हें पुरानी जीपीएफ पेंशन योजना या नई योजना में से किसी एक को चुनने का विकल्प प्राप्त है। तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड की अपील खारिज कर दी।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड एंड अनदर बनाम सतनाम सिंह एंड अदर्स
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 6865/2022
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा, जस्टिस श्री चंद्रशेखर
निर्णय की तिथि: 8 सितंबर 2026

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