दूसरी शादी से बच्चा होने पर भी विधवा को पारिवारिक पेंशन का अधिकार: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की निस्संदेह विधवा दोबारा विवाह करती है और दूसरी शादी से उसे संतान प्राप्त होती है, तो भी वह पारिवारिक पेंशन पाने के लिए कानून की नजर में ‘निःसंतान विधवा’ ही मानी जाएगी। अदालत ने कहा कि बाद में पैदा हुए बच्चे के कारण पेंशन के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ता।

न्यायमूर्ति ईश्वरन एस. की एकल पीठ ने दिवंगत सरकारी कर्मचारी की मां की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता मां ने मांग की थी कि कर्मचारी की विधवा द्वारा दूसरा विवाह कर बच्चा पैदा करने के बाद पेंशन का अधिकार उसे मिलना चाहिए। अदालत ने इस मांग को अस्वीकार करते हुए पेंशन वितरण अधिकारियों द्वारा मां की पेंशन रोकने के कदम को बिल्कुल सही ठहराया।

दिवंगत कर्मचारी से बाद के रिश्तों का कोई कानूनी नाता नहीं

10 अगस्त को जारी अपने आदेश में हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि पारिवारिक पेंशन का अधिकार व्यक्तिगत उत्तराधिकार कानूनों या सामान्य नागरिक अधिकारों के तहत नहीं, बल्कि पूरी तरह से संबंधित वैधानिक सेवा नियमों के आधार पर तय होता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि दिवंगत सरकारी सेवक के संदर्भ में ‘परिवार’ की परिभाषा का निर्धारण सीधे कर्मचारी के साथ उसके नजदीकी संबंध से होता है। कर्मचारी की मृत्यु के बाद बने नए रिश्तों की पारिवारिक पेंशन की पात्रता तय करने में कोई कानूनी भूमिका नहीं होती। पीठ ने कहा कि विधवा की दूसरी शादी से पैदा हुए बच्चे का मृतक सरकारी कर्मचारी से कानूनी तौर पर कोई संबंध नहीं होता। ऐसे में महज पुनर्विवाह और नई संतान होने से विधवा का कानूनी दर्जा नहीं बदलता।

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हाईकोर्ट ने अपने फैसले में केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियमावली, 1972 के प्रावधानों का हवाला दिया। इन नियमों के अनुसार, किसी निःसंतान विधवा को पुनर्विवाह के बाद भी पारिवारिक पेंशन मिलती रहेगी, बशर्ते अन्य स्रोतों से होने वाली उसकी कुल आय नियमों के तहत तय न्यूनतम पारिवारिक पेंशन से कम हो।

आश्रित माता-पिता के मुकाबले विधवा को प्राथमिकता

पेंशन के दावेदारों की वरीयता तय करते हुए अदालत ने कहा कि वैधानिक व्यवस्था के तहत आश्रित माता-पिता अंतिम श्रेणी में आते हैं। माता-पिता को पारिवारिक पेंशन का लाभ केवल उसी स्थिति में मिल सकता है, जब कर्मचारी अपने पीछे जीवित पत्नी या कोई पात्र बच्चा न छोड़ गया हो।

न्यायमूर्ति ईश्वरन ने साफ किया कि चूंकि दिवंगत कर्मचारी की विधवा जीवित है, इसलिए पारिवारिक पेंशन पाने का प्राथमिक अधिकार उसी का है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता मां केवल इस आधार पर विधवा की जगह पेंशन का दावा नहीं कर सकती कि उसने दूसरे विवाह से बच्चे को जन्म दिया है।

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क्या था पूरा विवाद

यह कानूनी विवाद एक सरकारी कर्मचारी की सेवाकाल के दौरान हुई मृत्यु के बाद शुरू हुआ था। कर्मचारी की मृत्यु के समय दंपती की कोई संतान नहीं थी। बाद में उसकी विधवा ने दूसरा विवाह कर लिया और उससे एक बच्चे को जन्म दिया।

दिवंगत कर्मचारी की मां ने यह दलील देते हुए अदालत का रुख किया कि दूसरी शादी से संतान होने के बाद अब वह ‘निःसंतान विधवा’ की श्रेणी में नहीं आती, इसलिए पारिवारिक पेंशन की पूरी राशि उसे दी जानी चाहिए। वहीं, विधवा के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि 1972 के पेंशन नियमों के तहत उनका अधिकार पूरी तरह सुरक्षित है। हाईकोर्ट ने मां की दलीलों को आधारहीन मानते हुए याचिका निरस्त कर दी।

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