सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि अधूरी परिस्थितिजन्य साक्ष्य श्रृंखला, असत्यापित एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन (न्यायेतर इकबालिया बयान) और अस्वीकार्य डिस्क्लोजर स्टेटमेंट के आधार पर किसी भी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने संदेह का लाभ देते हुए अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302, 201 और 377 के तहत आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने अपीलकर्ता को तत्काल जेल से रिहा करने के अपने पहले के निर्देश की पुष्टि की और यह भी दर्ज किया कि वह पहले ही 16 साल और सात महीने से अधिक का कारावास भुगत चुका है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला हरियाणा के अंबाला जिले के बलदेव नगर थाने में 12 मार्च 2007 को दर्ज एफआईआर संख्या 70 से संबंधित था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 11 मार्च 2007 की रात करीब आठ बजे छह साल का एक बच्चा गांव में शादी समारोह में जाने के बाद लापता हो गया था। अगली सुबह गांव के डाकघर के बरामदे में बच्चे की चप्पल मिलने के बाद काकरू गांव के ही एक पुराने कुएं में उसका शव मिला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण गला घोंटने (स्मदरिंग) और गर्दन की रीढ़ की चोट के परिणामस्वरूप दम घुटना पाया गया। साथ ही उसके शरीर पर अप्राकृतिक यौन शोषण के निशान भी पाए गए थे।
अभियोजन का दावा था कि आरोपी को आखिरी बार पीड़ित बच्चे के साथ एक किराने की दुकान पर नमकीन और जुकाम की दो गोलियां खरीदते देखा गया था। अभियोजन के अनुसार, आरोपी ने बच्चे को गोली खिलाई, नमकीन दिया, उसके साथ अप्राकृतिक यौन अपराध किया, मुंह दबाकर उसकी हत्या कर दी और शव को कुएं में फेंक दिया। अभियोजन का यह भी आरोप था कि घटना के दो दिन बाद 14 मार्च 2007 को आरोपी ने गांव के सरपंच के पास जाकर अपना जुर्म कबूल किया (एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन) और इसके बाद पुलिस हिरासत में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत बयान दर्ज कराकर अपराध स्थल की शिनाख्त कराई।
अंबाला के सेशंस जज ने 24 अप्रैल 2010 को आरोपी को हत्या के लिए उम्रकैद, साक्ष्य मिटाने के लिए पांच साल और अप्राकृतिक अपराध के लिए दस साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 18 अक्टूबर 2022 को इस सजा को बरकरार रखा था। हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से ‘आखिरी बार साथ देखे जाने’ (लास्ट सीन टुगेदर) के सिद्धांत, सरपंच के सामने किए गए कथित इकबालिया बयान और कपड़ों पर मानव वीर्य मिलने की फोरेंसिक रिपोर्ट पर भरोसा जताया था।
पक्षों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि पूरा मामला पूरी तरह से कमजोर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है, जिसमें कई गंभीर खामियां हैं। बचाव पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि जिस दुकानदार (पीडब्लू-7) से नमकीन और दवा खरीदने की बात कही गई, उसने गवाही में स्वीकार किया कि पुलिस आरोपी को 12 मार्च 2007 को ही उसकी दुकान पर लेकर आई थी। यह तथ्य अभियोजन के उस दावे को पूरी तरह झुठला देता है कि आरोपी ने 14 मार्च 2007 को सरपंच के सामने आत्मसमर्पण और इकबालिया बयान दिया था। इसके अतिरिक्त, कपड़ों और रेक्टल स्वैब के नमूनों के मिलान के लिए कोई डीएनए जांच नहीं कराई गई थी। साथ ही धारा 27 के तहत दर्ज बयान से किसी नए तथ्य की खोज नहीं हुई, क्योंकि पुलिस घटना स्थल और कुएं का मुआयना पहले ही कर चुकी थी।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने निचली अदालतों के फैसलों का समर्थन करते हुए कहा कि गवाहों के बयान, घटनास्थल से नमकीन का पैकेट बरामद होना और सरपंच के समक्ष दिया गया इकबालिया बयान आरोपी के अपराध को साबित करने के लिए एक मजबूत और अटूट कड़ी बनाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद निर्णय दिया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। पीठ ने रेखांकित किया कि 12 मार्च को घटनास्थल से सामान्य ब्रांड की खुली नमकीन का पैकेट जब्त करना साक्ष्य गढ़ने का प्रयास प्रतीत होता है, क्योंकि नमकीन खरीदने की कहानी पहली बार 14 मार्च को आरोपी के कथित बयान में सामने आई थी। इसके अलावा, बच्चे को दी गई जुकाम की दवा का कोई खाली रैपर भी मौके से नहीं मिला था।
अदालत ने सरपंच (पीडब्लू-9) के सामने किए गए कथित इकबालिया बयान पर गंभीर सवाल उठाए और निचली अदालत के इस तर्क को खारिज कर दिया कि सरपंच एक तटस्थ गवाह था:
“निचली अदालत का तर्क हमें उचित नहीं लगता। इस बात की पूरी संभावना है कि सरपंच सच नहीं बोल रहा हो और इसके कई कारण हो सकते हैं। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि सरपंच किसी को बचाना चाहता था या पुलिस को यह दिखाने में मदद करना चाहता था कि अपराध सुलझ गया है। गांव के एक बच्चे की जान चली गई थी और मौत से पहले उसके साथ क्रूर बर्ताव किया गया था, ऐसे में ग्रामीणों का अत्यधिक आक्रोशित होना स्वाभाविक है। ग्रामीणों को शांत करने के उद्देश्य से यह संभव है कि पुलिस ने यह कहानी बनाई हो कि मामला सुलझ गया है और अपराधी पकड़ा गया है। दूसरी ओर, आरोपी एक गरीब मजदूर था और हो सकता है कि उसे ग्रामीणों की सहानुभूति हासिल न हो।”
सहदेवन बनाम तमिलनाडु राज्य (2012) के फैसले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन एक कमजोर साक्ष्य है और बिना किसी स्वतंत्र एवं पुख्ता संपुष्टिकारक परिस्थिति या साक्ष्य के केवल इसके आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। जब भी अदालत अभियोजन के संपूर्ण साक्ष्यों के उचित मूल्यांकन के बाद एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन के आधार पर सजा देना चाहती है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि वह विश्वास जगाने वाला हो और अभियोजन के अन्य साक्ष्यों से उसकी पुष्टि होती हो। हालांकि, यदि एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन में गंभीर विसंगतियां या अंतर्निहित असंभाव्यताएं पाई जाती हैं और वह अभियोजन के कथानक के अनुसार ठोस प्रतीत नहीं होता है, तो अदालत के लिए ऐसे इकबालिया बयान पर सजा तय करना कठिन हो सकता है। ऐसी परिस्थितियों में अदालत ऐसे साक्ष्य को विचार से बाहर करने में पूरी तरह उचित होगी।”
पीठ ने आगे कहा कि गवाह (पीडब्लू-8) के बयान में बाद में सुधार (इम्प्रूवमेंट) किया गया, क्योंकि पुलिस को दिए गए उसके मूल बयान में बच्चे के साथ होने का कोई जिक्र नहीं था। इसके अतिरिक्त, धारा 27 के तहत कथित खुलासे पर हाईकोर्ट की निर्भरता भी कानूनी रूप से गलत थी, क्योंकि शव 12 मार्च को ही निकाला जा चुका था, जबकि कथित डिस्क्लोजर 14 मार्च को दर्ज किया गया। धारा 27 (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 23(2) का परंतुक) के तहत केवल वही जानकारी स्वीकार्य होती है जिससे किसी नए अज्ञात तथ्य की खोज हुई हो। इस मामले में पुलिस 12 मार्च को ही नक्शा तैयार कर चुकी थी, इसलिए कोई नया तथ्य सामने नहीं आया।
फोरेंसिक साक्ष्यों पर अदालत ने कहा कि आरोपी के अंडरवियर पर मिले वीर्य और बच्चे के रेक्टल स्वैब के बीच कोई डीएनए मिलान नहीं कराया गया था। अदालत ने टिप्पणी की कि बिना किसी वैज्ञानिक मिलान के केवल आरोपी के अविवाहित होने के आधार पर उस पर वीर्य की मौजूदगी साबित करने का कानूनी भार नहीं डाला जा सकता।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी में कई महत्वपूर्ण कड़ियां गायब हैं, जिससे अभियोजन का पूरा ढांचा ढह जाता है। शीर्ष अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 18 अक्टूबर 2022 के फैसले और सेशन कोर्ट के 24 अप्रैल 2010 के दोषसिद्धि के फैसले को रद्द कर दिया। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपी को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: साहब सिंह उर्फ सतपाल बनाम हरियाणा राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4158 / 2026
पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा
निर्णय की तिथि: 02 सितंबर 2026

