केरल हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि जंगली जानवरों द्वारा नागरिकों को पहुंचाए गए किसी भी नुकसान या जनहानि की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। अदालत ने कहा कि चूंकि वन्यजीवों पर कानूनी रूप से राज्य का अधिकार और संरक्षण होता है, इसलिए जंगली जानवरों के रिहायशी इलाकों में घुसने से रोकने में विफलता सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को मिले जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।
जस्टिस मोहम्मद नियास सी. पी. ने 21 अगस्त के अपने आदेश में वन विभाग की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें 2001 में वायनाड में एक जंगली हाथी के हमले में मारे गए व्यक्ति के परिजनों को मुआवजा देने के अदालती निर्देशों को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने साफ किया कि प्रभावित नागरिक सरकारी योजनाओं, आदेशों या नियमों में अलग से प्रावधान न होने पर भी नुकसान की भरपाई पाने के हकदार हैं।
बचाव के उपाय न करना लापरवाही, सरकार दायित्व से नहीं बच सकती
हाईकोर्ट ने वन विभाग की इस दलील को सिरे से नकार दिया कि राज्य जंगली जानवरों का रखवाला नहीं हो सकता या खुले में घूमने वाले जानवरों पर उसका सीधा नियंत्रण नहीं रहता। अदालत ने रेखांकित किया कि पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ नागरिकों के जान-माल की रक्षा करना भी सरकार का बुनियादी संवैधानिक कर्तव्य है।
अदालत ने पाया कि वन सीमा पर खाई खोदने या तारबंदी जैसी जरूरी बाड़ लगाने में वन विभाग नाकाम रहा, जिसके कारण हाथी निजी क्षेत्र में घुस आया। फैसले में कहा गया कि यदि विभाग ने समय रहते पर्याप्त एहतियाती उपाय किए होते, तो इस जानलेवा घटना को टाला जा सकता था। जानवरों पर सीधा नियंत्रण न होने की बात कहकर प्रशासन अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकता।
सड़क पर हुआ था जानलेवा हमला, परिजनों ने लड़ी लंबी कानूनी लड़ाई
यह मामला 27 अप्रैल 2001 का है, जब वायनाड में चामाप्पारा पंचायत रोड से गुजर रहे एक व्यक्ति को जंगली हाथी ने कुचलकर मार डाला था। इसके बाद मृतक की पत्नी और बच्चों ने दीवानी अदालत का दरवाजा खटखटाया। परिजनों का आरोप था कि वन विभाग की लापरवाही और जंगली जानवरों को आबादी वाले क्षेत्रों में आने से रोकने में विफलता के कारण यह दुखद हादसा हुआ।
घटना के बाद सरकार ने पीड़ित परिवार को बतौर अनुग्रह राशि 20,000 रुपये का भुगतान किया था। हालांकि, परिजनों ने अतिरिक्त मुआवजे की मांग करते हुए अपने दीवानी मुकदमे में 1.80 लाख रुपये का दावा तय किया। इसके जवाब में वन विभाग ने तर्क दिया कि घटना जंगल के रास्ते पर हुई थी, मृतक नशे में था और उसकी खुद की लापरवाही से यह हुआ। विभाग ने मुआवजे की मांग को भी अत्यधिक और अनुचित बताया था।
निचली अदालतों का फैसला बरकरार, इंसान की जान की कीमत कम नहीं आंकी जा सकती
ट्रायल कोर्ट और जिला अदालत दोनों ने वन विभाग की आपत्तियों को खारिज कर दिया था। अदालतों ने तथ्यों के आधार पर पाया कि घटना जंगल के भीतर नहीं, बल्कि घरों के नजदीक स्थित पंचायत सड़क पर घटी थी। निचली अदालत ने कुल नुकसान का आकलन 1.98 लाख रुपये किया और पहले दिए जा चुके 20,000 रुपये घटाकर शेष 1.78 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के इस निर्णय को पूरी तरह उचित ठहराया। अदालत ने कहा कि न्यायिक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे ऐसा मुआवजा सुनिश्चित करें जो निष्पक्ष, तर्कसंगत और पीड़ित को पहुंचे वास्तविक नुकसान के अनुरूप हो। कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी इंसान के जीवन के मूल्य को ऐसे आंकड़े में नहीं समेटा जा सकता जो उसके वास्तविक नुकसान की गंभीरता को अनदेखा कर दे। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने वन विभाग की अपील खारिज कर दी।
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