सेवाएं लेने के बाद राज्य वकील की फीस देने से मुकर नहीं सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने मप्र सरकार को ₹78.65 लाख चुकाने का दिया निर्देश

राज्य सरकार किसी वरिष्ठ वकील की सेवाएं लेने और सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के समक्ष उसका लाभ उठाने के बाद पेशेवर फीस देने की अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस सचिन दत्ता ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मध्य प्रदेश सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें तथ्यात्मक विवाद का हवाला देकर रिट याचिका को विचारणीय न मानने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश के पूर्व महाधिवक्ता और सीनियर एडवोकेट अनूप जॉर्ज चौधरी की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह उन्हें ₹78,65,000 की बकाया फीस याचिका दायर करने की तारीख से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ छह सप्ताह के भीतर अदा करे।

मामले की पृष्ठभूमि

वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 (2013 एक्ट) की धारा 24(2) की व्याख्या से जुड़े मामलों की अंतिम सुनवाई शुरू की। इस बैच का मुख्य मामला इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम मनोहर लाल व अन्य (आईडीए मामला) था, जो मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर हुआ था और इसमें राज्य सरकार का सीधा व महत्वपूर्ण हित जुड़ा था। इसके साथ मप्र हाउसिंग बोर्ड बनाम मालवा आईटी पार्क लिमिटेड व अन्य (हाउसिंग बोर्ड मामला) भी टैग किया गया था, जिसमें मध्य प्रदेश सरकार प्रतिवादी के तौर पर शामिल थी।

याचिकाकर्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप जॉर्ज चौधरी ने राज्य की ओर से संविधान पीठ के समक्ष पैरवी की। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड ऑफ प्रोसीडिंग्स के अनुसार, अक्टूबर से दिसंबर 2019 के बीच कुल 14 तारीखों पर उनकी उपस्थिति दर्ज की गई। सुनवाई के दौरान ही 1 दिसंबर 2019 को याचिकाकर्ता ने मध्य प्रदेश के तत्कालीन स्टैंडिंग काउंसिल हर्ष पाराशर को कुल 35 फीस बिल भेजे, जिनकी कुल राशि ₹1,76,55,000 थी। इसमें प्रति उपस्थिति ₹6,05,000 (10 प्रतिशत क्लर्केज सहित) और प्रति कॉन्फ्रेंस ₹1,65,000 की मांग की गई थी।

स्टैंडिंग काउंसिल ने 8 जनवरी 2020 को लिखित पत्र भेजकर सूचित किया कि बिल प्राप्त हो गए हैं और उन्हें भुगतान के लिए प्रमुख सचिव (विधि) और प्रमुख सचिव (राजस्व) को “जैसे पेश किए गए हैं” (as raised) वैसे ही भेज दिया गया है। इसके बावजूद राज्य सरकार ने कोई भुगतान नहीं किया। अंततः वर्ष 2021 में याचिकाकर्ता ने अपने पेशेवर बकाए और ब्याज की मांग को लेकर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

दोनों पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से दलीलें: याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आधिकारिक रिकॉर्ड इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि याचिकाकर्ता को नियुक्त किया गया था और उन्होंने 14 तारीखों पर राज्य के स्टैंडिंग काउंसिल और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के ब्लॉक में पेश होकर बहस की। संविधान पीठ के रिपोर्टेड फैसले (2020) 8 SCC 129 के पैरा 8 में भी राज्य की ओर से उनकी मौखिक दलीलों का स्पष्ट उल्लेख है।

READ ALSO  धारा 14 HMA | असाधारण कठिनाई या अनैतिकता के मामले में आपसी सहमति से तलाक के लिए अनिवार्य एक साल की प्रतीक्षा को माफ किया जा सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

यह भी दलील दी गई कि राज्य ने कभी भी सुप्रीम कोर्ट में उपस्थिति रिकॉर्ड को संशोधित या दुरुस्त कराने के लिए कोई अर्जी नहीं लगाई। इसके अलावा, 1 नवंबर 2025 को महाधिवक्ता की अध्यक्षता में हुई बैठक में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव एस.आर. मोहंती ने खुद स्वीकार किया था कि एक अन्य वरिष्ठ वकील के उपलब्ध न होने पर याचिकाकर्ता को राज्य की ओर से पेश होने के लिए कहा गया था और उनके बिलों का तत्कालीन प्रचलित दरों पर निपटारा किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने कहा कि सुनवाई से पहले ही फीस तय कर दी गई थी और स्टैंडिंग काउंसिल द्वारा बिना शर्त बिल आगे भेजना उसकी समकालीन स्वीकृति थी।

मध्य प्रदेश सरकार की ओर से दलीलें: मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने याचिका की विचारणीयता पर प्राथमिक आपत्ति उठाई। उन्होंने तर्क दिया कि अनुच्छेद 226 का इस्तेमाल विवादित वित्तीय और संविदात्मक दावों को लागू कराने के लिए नहीं किया जा सकता, जिनके लिए साक्ष्य और गवाही की आवश्यकता होती है। राज्य ने इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट, रोपड़ बनाम एस. तेजिंदर सिंह गुजराल, एबीएल इंटरनेशनल लिमिटेड बनाम एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम ए.के. सक्सेना और सुप्रीम कोर्ट के विजय कुमार शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के आदेश का हवाला दिया।

तथ्यों के आधार पर राज्य ने कहा कि विधि एवं विधायी कार्य विभाग द्वारा कोई औपचारिक नियुक्ति आदेश या लिखित निर्देश जारी नहीं किया गया था। राज्य ने यह भी दावा किया कि याचिकाकर्ता ने केवल दो तारीखों पर ही प्रभावी रूप से बहस की थी और उनके द्वारा दावा किया गया फीस स्ट्रक्चर कभी मंजूर नहीं हुआ था। इसके अतिरिक्त, राज्य ने 4 जुलाई 2012 की एक अधिसूचना का हवाला दिया, जिसमें सीनियर पैनल एडवोकेट्स के लिए ₹5,000 प्रति केस प्रतिदिन (अधिकतम ₹15,000 की दैनिक सीमा के साथ) की दर तय की गई थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस सचिन दत्ता ने राज्य सरकार की प्राथमिक आपत्ति को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि केवल किसी पक्ष द्वारा विवाद खड़ा कर देने से हाईकोर्ट का रिट क्षेत्राधिकार समाप्त नहीं हो जाता, खासकर तब जब मुख्य तथ्य आधिकारिक और समकालीन रिकॉर्ड से साबित होते हों।

कोर्ट ने कहा कि आत्म-संयम का नियम केवल तभी लागू होता है जब वास्तव में ट्रायल की जरूरत हो, गढ़े गए विवादों पर नहीं:

“जो सिद्धांत सामने आता है वह यह नहीं है कि तथ्यात्मक विवाद का अस्तित्व रिट क्षेत्राधिकार को समाप्त कर देता है, बल्कि यह है कि रिट अदालत ऐसे मामले की सुनवाई से इनकार करती है जिसमें वास्तव में ट्रायल की आवश्यकता होती है। लेकिन जहां महत्वपूर्ण तथ्य समकालीन आधिकारिक रिकॉर्ड और प्रतिवादी के अपने अधिकारियों के बयानों से स्थापित होते हैं, वहां ऐसा कोई तथ्यात्मक विवाद नहीं रह जाता जिसके लिए सबूत की आवश्यकता हो, और वहां आत्म-संयम का नियम लागू नहीं होता।”

राज्य द्वारा इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट, रोपड़ मामले में दी गई इस दलील पर कि “वकीलों के लिए कोई अलग कानून नहीं है”, कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की:

“यह टिप्पणी दोनों तरफ लागू होती है, यानी एक वकील न तो किसी विशेष छूट का हकदार है और न ही उसे किसी विशेष अयोग्यता का शिकार बनाया जा सकता है।”

कोर्ट ने राज्य सरकार के बदलते और विरोधाभासी बयानों पर गहरी नाराजगी जताई—जिसमें पहले वैधानिक निकायों पर जिम्मेदारी डाली गई, फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद उपस्थिति रिकॉर्ड न होने की बात कही गई, और अंत में औपचारिक आदेश के अभाव का तर्क दिया गया:

“सामने आने वाली स्थिति यह है कि राज्य ने याचिकाकर्ता की पेशेवर सेवाओं को स्वीकार किया और उनका लाभ उठाया। उसने अपने ही एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के माध्यम से और अपने स्टैंडिंग काउंसिल के साथ संविधान पीठ के समक्ष 14 तारीखों पर उनकी उपस्थिति दर्ज होने दी; उन्हें पीठ को संबोधित करने दिया; उस फैसले का लाभ लिया जिसमें उनकी दलीलें दर्ज हैं; और 14 में से किसी भी ऑर्डर शीट या रिपोर्टेड फैसले में सुधार की मांग कभी नहीं की।”

आर.एन. गोसाईं बनाम यशपाल धीर और पंजाब राज्य बनाम धनजीत सिंह संधू में प्रतिपादित “एक साथ स्वीकार और अस्वीकार न करने” (Approbate and Reprobate) के सिद्धांत का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

“राज्य से एक आदर्श वादी होने की अपेक्षा की जाती है। इसके विपरीत इस मामले में उसका बचाव केवल नौकरशाही द्वारा पल्ला झाड़ने का उदाहरण रहा है, जहां प्रत्येक विभाग और संस्था जिम्मेदारी से मुकरते हुए दूसरे की ओर इशारा कर रही है, जबकि याचिकाकर्ता की सेवाओं का प्रत्यक्ष लाभार्थी भुगतान करने से इनकार कर रहा है। ऐसे आचरण की कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए।”

रवि प्रकाश मेहरोत्रा बनाम डीडीए, पवित्र रायचौधरी बनाम वैट कमिश्नर, उत्तर प्रदेश राज्य बनाम गोपाल के. वर्मा और केरल हाईकोर्ट के मैथ्यू बी. कुरियन बनाम एनसीटीई फैसलों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने जोर दिया कि वकीलों को अपनी जायज फीस के लिए अपने ही मुवक्किल पर मुकदमा करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए:

“वकील की फीस एक ही समय में सम्मान का विषय भी है और कानूनी अधिकार का विषय भी। कानूनी उपचार की मौजूदगी सम्मान के दायित्व को कम नहीं करती; बल्कि यह वह अंतिम साधन प्रदान करती है जिसके माध्यम से उस दायित्व को पूरा कराया जा सके।”

“यह अदालत यह टिप्पणी करने के लिए विवश है कि डीडीए जैसे सार्वजनिक प्राधिकरणों से अपने ही वकीलों के साथ व्यवहार में फीस और परिलब्धियों के भुगतान से बचने के लिए अनुचित और बेईमानी भरा आचरण करने की अपेक्षा नहीं की जाती। ऐसा आचरण न केवल संबंधित सार्वजनिक प्राधिकरण की बदनामी कराता है, बल्कि कानून के शासन की बुनियाद पर भी चोट करता है, क्योंकि वकील और मुवक्किल के रिश्ते की शुचिता इसका सबसे मौलिक पहलू है।”

कोर्ट का निर्णय और फीस का निर्धारण

फीस की राशि तय करते हुए कोर्ट ने माना कि प्रति उपस्थिति ₹6,05,000 की दर चल रही सुनवाई के दौरान ही बता दी गई थी, जिसे स्टैंडिंग काउंसिल ने बिना किसी आपत्ति के “जैसे पेश किए गए हैं” वैसे ही भुगतान हेतु आगे बढ़ाया था और वर्षों तक इस पर कोई विवाद नहीं उठाया गया। इसके अलावा, 2012 की पैनल वकीलों वाली अधिसूचना संविधान पीठ के लिए विशेष रूप से नियुक्त सीनियर एडवोकेट पर लागू नहीं होती।

READ ALSO  SARFAESI अधिनियम के तहत DRT 10 लाख रुपये से कम राशि के दावे पर विचार नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

हालांकि, कोर्ट ने उसी दिन एक साथ सुने जा रहे हाउसिंग बोर्ड मामले के लिए अलग से लगाए गए डुप्लिकेट बिलों को खारिज कर दिया। साथ ही, पुख्ता आधिकारिक रिकॉर्ड न होने के कारण कॉन्फ्रेंस फीस के दावे को भी अस्वीकार कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में दर्ज 13 सत्यापित तारीखों (15 अक्टूबर 2019 की तारीख को छोड़कर जिसका रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था, और 11 दिसंबर 2019 को छोड़कर जिसका बिल पेश नहीं किया गया था) के आधार पर कोर्ट ने ₹6,05,000 प्रति दिन की दर से कुल ₹78,65,000 की राशि तय की।

READ ALSO  ‘Not Here to Run the Govt’: Delhi High Court Refuses to Intervene in LPG Shortage PIL, Cites West Asia War Fallout

हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को ₹78,65,000 की राशि याचिका दायर होने की तारीख से भुगतान होने तक 9 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज के साथ छह सप्ताह के भीतर अदा करे।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: अनूप जॉर्ज चौधरी बनाम मध्य प्रदेश राज्य

वाद संख्या: डब्ल्यूपी (सी) 13196/2021, सीएम एपीपीएल. 72314/2025, सीएम एपीपीएल. 23670/2026, सीएम एपीपीएल. 23681/2026

पीठ: जस्टिस सचिन दत्ता

निर्णय की तिथि: 31.08.2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles