मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत नाबालिग पत्नी से शादी भी पॉक्सो और आईपीसी की धारा 376 के तहत रेप के आरोपों से नहीं बचा सकती: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने बाल संरक्षण कानूनों की सर्वोच्चता को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया है कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाना पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत अपराध होने के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत बलात्कार का अपराध भी बनता है, भले ही पीड़िता की शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आरोपी से ही क्यों न हुई हो। आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन ने निर्णय दिया कि पर्सनल लॉ या आईपीसी की धारा 375 का अपवाद 2 किसी पति को नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने पर आपराधिक मुकदमों से राहत नहीं दिला सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला पलक्कड़ के मन्नारक्कड़ पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध संख्या 461/2022 से जुड़ा है, जो वर्तमान में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट, पट्टाम्बी के समक्ष सत्र मामला संख्या 779/2023 के रूप में लंबित है। 27 वर्षीय याचिकाकर्ता पर आईपीसी की धारा 366 और 376(2)(n) के साथ-साथ पॉक्सो एक्ट की धारा 6(1) सपठित धारा 5(1) और धारा 15(1) के तहत मुख्य आरोपी के रूप में आरोप तय किए गए थे।

प्रथम सूचना विवरण (FIS) के अनुसार, 23 अक्टूबर 2021 को आरोपी 17 वर्ष एक महीने की पीड़िता को कपड़े दिलाने के बहाने मारुति ऑल्टो कार में बैठाकर थोत्तारा स्थित अपने घर ले गया। जब लड़की ने आरोपी की मां के कमरे में सोने की इच्छा जताई, तो आरोपी के माता-पिता ने कथित तौर पर उसे बाहर से बंद करके आरोपी के बेडरूम में रोक दिया। इसके बाद आरोपी ने उस रात और अगले चार दिनों तक लगातार उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए।

याचिकाकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर अंतिम रिपोर्ट (चार्जशीट) और आगे की सभी कार्यवाहियों को रद्द करने की मांग की थी।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यह आपराधिक कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और प्रतिशोध की भावना से शुरू की गई है। उन्होंने तर्क दिया कि पीड़िता याचिकाकर्ता की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है, जिससे उसका विवाह 23 जुलाई 2021 को दोनों परिवारों की मौजूदगी में इस्लामिक रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। इस विवाह की पुष्टि पीड़िता, उसके भाई और स्थानीय काजी द्वारा पुलिस को दिए गए बयानों में भी की गई है। याचिकाकर्ता ने आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 का हवाला देते हुए कहा कि यदि पत्नी 15 वर्ष से कम उम्र की न हो, तो पति द्वारा उसके साथ बनाया गया शारीरिक संबंध बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता।

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इसके विपरीत, पीड़िता के वकील और वरिष्ठ लोक अभियोजक (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 17 वर्ष थी, जो पॉक्सो एक्ट की धारा 2(1)(d) के तहत ‘बच्चे’ (चाइल्ड) की परिभाषा में आती है। उन्होंने कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ बार-बार संबंध बनाना पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत गंभीर प्रवेशन यौन उत्पीड़न (Aggravated Penetrative Sexual Assault) और आईपीसी की धारा 376 के तहत बलात्कार का अपराध है। उन्होंने जोर दिया कि एफआईएस के आरोप प्रथम दृष्टया अपराध के सभी तत्वों को स्पष्ट करते हैं।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

बीएनएसएस की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों के दायरे पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि इस असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग बहुत सतर्कता और संयम के साथ किया जाना चाहिए, न कि प्रारंभिक स्तर पर सबूतों की बारीक जांच करने या ‘मिनी-ट्रायल’ चलाने के लिए। एफआईएस के सीधे अवलोकन से कथित अपराधों के आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से सामने आते हैं।

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अदालत ने टिप्पणी की कि क्या वास्तव में कोई वैध विवाह हुआ था, यह ट्रायल के दौरान तय होने वाला विषय है क्योंकि विवाह से जुड़ा कोई दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं किया गया था। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार विवाह संपन्न हुआ भी मान लिया जाए, तो भी यह आरोपी को आपराधिक दायित्व से मुक्त नहीं कर सकता।

पॉक्सो एक्ट को पर्सनल लॉ और प्रथागत कानूनों से ऊपर बताते हुए हाईकोर्ट ने अपने पूर्व फैसले खालेदुर रहमान बनाम केरल राज्य और अन्य [2022 KHC Online 913] का उल्लेख किया:

“पॉक्सो एक्ट बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए विशेष रूप से बनाया गया एक विशेष कानून है। बच्चे के खिलाफ हर तरह के यौन शोषण को अपराध माना गया है। विवाह इस कानून के दायरे से बाहर नहीं है और यदि वैधानिक प्रावधानों में प्रथागत या पर्सनल लॉ को विशेष रूप से अलग नहीं रखा गया है, तो कानून ही प्रभावी होगा, तथा पर्सनल लॉ या प्रथागत कानून असंगति की सीमा तक निष्प्रभावी रहेगा।”

कोर्ट ने रेखांकित किया कि पॉक्सो एक्ट की धारा 2(1)(d) के तहत 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति बच्चा है और धारा 42A इस कानून को अन्य कानूनों पर प्राथमिकता (ओवरराइडिंग इफेक्ट) देती है। इसलिए, 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर पॉक्सो एक्ट लागू होगा, और इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि पीड़िता आरोपी की पत्नी है या नहीं।

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आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 पर याचिकाकर्ता के भरोसे को खारिज करते हुए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ और अन्य [(2017) 10 SCC 800] का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस अपवाद की व्याख्या को सीमित (Read Down) करते हुए माना था कि 15 से 18 वर्ष की विवाहित लड़की के साथ शारीरिक संबंध को बलात्कार के दायरे से बाहर रखना असंवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ संबंध बनाना केवल तभी बलात्कार नहीं है जब पत्नी की उम्र 18 वर्ष से कम न हो। इस प्रकार, 18 वर्ष से कम आयु की लड़की के साथ संबंध बनाने वाला व्यक्ति आईपीसी की धारा 376 के तहत अभियोजन से नहीं बच सकता।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने पाया कि अंतिम रिपोर्ट के आरोप प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध दर्शाते हैं, इसलिए अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करके कार्यवाही को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल याचिका के निपटारे तक सीमित हैं और ट्रायल कोर्ट मामले के गुण-दोष पर फैसला करते समय इनसे प्रभावित नहीं होगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: XXXXX बनाम XXXXX और अन्य

वाद संख्या: Crl.M.C. No. 8899 of 2024

पीठ: जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन

निर्णय की तिथि: 19 अगस्त 2026

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