पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक चार साल के बच्चे की कस्टडी उसकी मां को सौंपते हुए कहा है कि मासूम उम्र के बच्चों के सुरक्षित और खुशहाल भविष्य के लिए मां का स्नेह और निरंतर देखभाल बेहद आवश्यक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के विवाद में बच्चे का हित और कल्याण ही सबसे महत्वपूर्ण पैमाना होता है।
जस्टिस जसजीत सिंह बेदी ने 21 अगस्त को यह फैसला सुनाते हुए मां की ओर से अपने पति के खिलाफ दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने कहा कि अलग रह रहे माता-पिता के बीच कस्टडी विवादों में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पूरी तरह विचारणीय है और अदालत को यह प्राथमिक आकलन करने का अधिकार है कि बच्चे का सर्वोत्तम हित कहां सुरक्षित है।
कानूनी प्रावधान और कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6 का उल्लेख करते हुए रेखांकित किया कि पांच वर्ष से कम आयु के बच्चे की कस्टडी सामान्यतः मां के पास ही रहनी चाहिए।
जस्टिस बेदी ने अपनी टिप्पणी में कहा कि पिता की भूमिका भी आवश्यक है, लेकिन इतनी छोटी उम्र में बच्चे के भावनात्मक और मानसिक विकास के लिए मां की निरंतर उपस्थिति अनिवार्य होती है। कोर्ट ने पाया कि लगभग चार साल और चार महीने की उम्र का यह बच्चा मां के प्यार और देखभाल का हकदार है।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
मां की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट कुणाल दावा और एडवोकेट श्रुति मंधोत्रा ने अदालत में तर्क दिया कि वैधानिक प्रावधानों के अनुसार पांच साल से कम उम्र के बच्चे का संरक्षण स्वाभाविक रूप से मां को मिलना चाहिए।
दूसरी ओर, पिता के वकीलों—सीनियर एडवोकेट अमित झांजी, एडवोकेट सय्यम गर्ग और एडवोकेट कुदरत सरा—ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि बच्चा एक साल से अधिक समय से अपने पिता के साथ एक सुरक्षित और स्थिर वातावरण में रह रहा है। पिता के पक्ष का कहना था कि मां को हेबियस कॉर्पस याचिका के बजाय अभिभावकता से जुड़े नियमित कानूनों के तहत राहत मांगनी चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस आपत्ति को खारिज कर दिया।
विवाद की पृष्ठभूमि
रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों का विवाह सितंबर 2019 में हुआ था और अप्रैल 2022 में उनके बेटे का जन्म हुआ।
याचिकाकर्ता मां के अनुसार, विवाद मार्च 2025 में उस समय गंभीर हो गया जब वह डॉक्टर के पास गई थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पति और ससुराल वालों ने बच्चे को उनके रिश्तेदार (अंकल) के घर पहुंचा दिया, उन्हें वहीं बुलवाया और इसके बाद उन्हें ससुराल लौटने से रोक दिया गया। मां ने दावा किया कि इसके बाद उन्हें कुछ सीमित मौकों को छोड़कर बच्चे से मिलने नहीं दिया गया। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि दोनों पक्षों के बीच पूर्व में हुई मध्यस्थता किसी स्थायी समाधान तक नहीं पहुंच सकी थी।

