राजस्थान हाईकोर्ट ने साइबर वित्तीय अपराधों की जांच के दौरान बैंक खातों को पूरी तरह फ्रीज (ब्लैंकेट फ्रीज) करने की प्रथा पर रोक लगा दी है। अदालत ने निर्देश दिया है कि जांच एजेंसियों और बैंकों को खाता फ्रीज करने की कार्रवाई केवल विवादित राशि तक ही सीमित रखनी होगी, जबकि शेष राशि के लेन-देन के लिए खाताधारक को छूट देनी होगी।
विवादित राशि तक ही सीमित रहेगी पाबंदी
जस्टिस आनंद शर्मा की पीठ ने 20 अगस्त को जारी अपने आदेश में कहा कि अगर साइबर अपराध की शिकायत में संदिग्ध लेन-देन की राशि स्पष्ट रूप से पहचान योग्य है, तो बैंक केवल उसी राशि पर रोक लगाएं। कोर्ट ने माना कि साइबर ठगी के पीड़ितों के पैसों को सुरक्षित रखना और अपराध की जांच करना पुलिस का कर्तव्य है, लेकिन इसके साथ ही निर्दोष खाताधारकों को मनमाने प्रतिबंधों से बचाना भी बेहद जरूरी है ताकि डिजिटल बैंकिंग प्रणाली पर लोगों का विश्वास बना रहे।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल जांच लंबित होने के आधार पर किसी खाते को अनिश्चितकाल के लिए बंद नहीं रखा जा सकता। बैंक किसी एक संदिग्ध लेन-देन की सूचना मिलने पर पूरे खाते को खुद ब खुद फ्रीज नहीं कर सकते, जब तक कि इसके लिए ठोस कानूनी आधार और सामग्री मौजूद न हो। हालांकि, अदालत ने कहा कि एफआईआर दर्ज न होने मात्र से शुरुआती जांच अवैध नहीं हो जाती, लेकिन केवल किसी अस्पष्ट या असत्यापित पत्र के आधार पर पूरे खाते को रोकना गलत है।
छोटे विवादों के कारण ठप पड़े बड़े खाते
यह आदेश उन कई व्यक्तियों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की याचिकाओं पर आया है, जिनके बैंक खातों को पुलिस अधिकारियों के पत्रों के आधार पर पूरी तरह ब्लॉक, डेबिट-फ्रीज या लीन (lien) के तहत रख दिया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने अपनी व्यथा रखते हुए बताया कि महज 100 रुपये, 1,000 रुपये, 5,000 रुपये या 10,000 रुपये जैसी मामूली संदिग्ध राशि के विवाद के कारण उनके ऐसे खातों को पूरी तरह ठप कर दिया गया जिनमें भारी रकम जमा थी। कई खाताधारकों ने कहा कि साइबर अपराध में उनकी कोई संलिप्तता नहीं थी, फिर भी उनके खाते बंद कर दिए गए। कुछ मामलों में तो पुलिस जांच में क्लीन चिट मिलने या क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने के बाद भी खातों पर लगी रोक नहीं हटाई गई। इसके अलावा, नेशनल साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (एनसीआरपी) पर कोई शिकायत या एफआईआर न होने के बावजूद भी सिर्फ जांच अधिकारी के पत्र पर खाते फ्रीज कर दिए गए।
नियमित समीक्षा और केंद्रीय एसओपी का पालन जरूरी
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने 2 जनवरी को जारी केंद्र सरकार के मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का हवाला दिया। इस एसओपी में खाताधारकों की शिकायतों के निवारण और खातों पर लगी रोक हटाने के लिए समयबद्ध प्रक्रिया तय की गई है। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि जांच में देरी के कारण नागरिकों को उनकी संपत्ति और आजीविका से अनिश्चितकाल के लिए वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि अब जांच अधिकारी और उनके पर्यवेक्षी अधिकारियों को खाता फ्रीज रखने की जरूरत का मूल्यांकन करने के लिए समय-समय पर समीक्षा करनी होगी।
पुलिस और बैंकों की दलीलें
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और जांच एजेंसियों ने व्यापक प्रतिबंधों का बचाव करते हुए कहा कि साइबर अपराधों में रकम बहुत तेजी से कई खातों में ट्रांसफर की जाती है। यदि खाते को चालू रहने दिया जाए, तो संदिग्ध रकम के गायब होने या निकाल लिए जाने का गंभीर जोखिम रहता है।
वहीं, बैंकों ने अदालत को बताया कि उन्हें सक्षम प्राधिकारी के कानूनी निर्देशों के तहत खाते संचालित करने में कोई आपत्ति नहीं है। बैंकों ने यह भी स्पष्ट किया कि संदिग्ध लेन-देन पैटर्न, अधूरी केवाईसी (KYC) या आय के स्रोतों के दस्तावेजों में कमी होने पर वे स्वतंत्र रूप से भी खातों पर आवश्यक प्रतिबंध लगा सकते हैं।
हाईकोर्ट ने अपने निर्देशों में स्पष्ट किया कि इन नियमों से निष्पक्ष आपराधिक जांच या बैंकिंग नियामकों की वैध कार्रवाइयों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। साथ ही, कोर्ट ने राजस्थान पुलिस और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को खाता फ्रीज करने की प्रक्रियाओं की निगरानी, समीक्षा और अधिकारियों के प्रशिक्षण में सुधार करने के आदेश दिए हैं।

