मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पत्नी और नाबालिग बेटे को याचिका दायर करने की तिथि से ही भरण-पोषण राशि देने के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोर्ट की कार्यवाही में छह साल से अधिक का समय लगने की वजह से आश्रित पत्नी और बच्चे को उनके वित्तीय अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस गजेन्द्र सिंह की पीठ ने पति की उस संशोधन याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने बढ़ा हुआ भरण-पोषण भत्ता पिछली तारीख के बजाय आदेश की तारीख से लागू करने की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट के नज़ीर का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट द्वारा संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत स्थापित कानूनी सिद्धांतों का संदर्भ दिया। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, भरण-पोषण के मामलों में सहायता राशि आवेदन जमा करने की तिथि से ही दी जानी चाहिए। जस्टिस गजेन्द्र सिंह ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दायर यह आवेदन छह साल और छह महीने से अधिक समय तक लंबित रहा। लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण किसी पत्नी और मासूम बच्चे के वित्तीय हितों को खतरे में नहीं डाला जा सकता।
अदालत ने पति के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि पिछली तारीख से भुगतान करने का आदेश उस पर अनियंत्रित वित्तीय बोझ डालता है या यह उसका उत्पीड़न है। इसके विपरीत, हाईकोर्ट ने कहा कि यदि भरण-पोषण राशि केवल आगे की तिथि से लागू की जाएगी, तो इसका सीधा नुकसान पत्नी और नाबालिग बेटे को उठाना पड़ेगा।
अंतरिम भरण-पोषण का हिसाब
पति की ओर से पेश एडवोकेट संगीता चौधरी ने तर्क दिया था कि उनके मुवक्किल वर्ष 2018 से ही नियमित रूप से अंतरिम भरण-पोषण का भुगतान कर रहे हैं। ऐसे में 30 अक्टूबर 2018 से बढ़ा हुआ भत्ता देने का निर्देश उनके लिए आर्थिक संकट खड़ा करेगा और यह एक तरह का उत्पीड़न है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि पति द्वारा 2018 से अब तक दिए गए अंतरिम भरण-पोषण और अन्य संबंधित कानूनी कार्यवाहियों में दी गई राशि को कुल बकाया में से घटा दिया जाएगा। पीठ ने यह भी ध्यान दिलाया कि शुरुआत में तय की गई अंतरिम सहायता राशि बहुत कम थी।
मामले की पृष्ठभूमि और अदालती घटनाक्रम
यह विवाद 30 जनवरी 2013 को इंदौर में हुए एक विवाह से जुड़ा है। दंपती के बेटे का जन्म 10 अप्रैल 2017 को हुआ था। पत्नी और बेटे ने 30 अक्टूबर 2018 को इंदौर के फैमिली कोर्ट में धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण की याचिका दायर की थी।
फैमिली कोर्ट ने 8 अप्रैल 2025 को फैसला सुनाते हुए पत्नी के लिए 7,000 रुपये प्रति माह और बच्चे के लिए 3,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण तय किया, जो आदेश जारी होने की तिथि से लागू होना था। इस फैसले के खिलाफ दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने 17 अप्रैल को फैसला सुनाते हुए पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और पत्नी की याचिका आंशिक रूप से स्वीकार कर ली। अदालत ने पत्नी का भत्ता 7,000 रुपये पर बरकरार रखा, जबकि बच्चे का भत्ता 3,000 रुपये से बढ़ाकर 9,000 रुपये प्रति माह कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि मूल और बढ़ी हुई दोनों राशियां 30 अक्टूबर 2018 से ही देय होंगी। पति ने इसी निर्देश में संशोधन की मांग की थी, जिसे हाईकोर्ट ने अब अंतिम रूप से खारिज कर दिया है।

