राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह प्रदेश में चल रहे करीब 3,000 मदरसों के प्रभावी प्रबंधन, निगरानी और संचालन के लिए उठाए जा सकने वाले कदमों पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करे।
जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश उन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया, जिनमें राजस्थान में मदरसों के संचालन और उन्हें नियंत्रित करने वाले नियमों तथा व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए गए हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाओं में मदरसों के संचालन और नियमन से जुड़ा गंभीर मुद्दा उठाया गया है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि राज्य सरकार या शिक्षा क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाले सक्षम अधिकारियों और संस्थाओं की ओर से प्रभावी नियंत्रण, निगरानी और नियामक व्यवस्था का अभाव दिखाई देता है।
खंडपीठ ने एडिशनल एडवोकेट जनरल बी एल भाटी को निर्देश दिया कि वह विस्तृत हलफनामा दाखिल कर बताएँ कि राजस्थान में मदरसों के बेहतर प्रबंधन, नियंत्रण और संचालन के लिए कौन-कौन से प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं। 28 सितंबर के आदेश में कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार मदरसों की कार्यप्रणाली सुधारने के लिए याचिकाकर्ता की ओर से दिए गए सुझावों पर विचार कर सकती है।
मौजूदा व्यवस्था को बताया अपर्याप्त
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मदरसों के संचालन के लिए वर्तमान दिशानिर्देश प्रभावी प्रशासन और संचालन सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए राज्य में एक प्रभावी तंत्र बनाए जाने की जरूरत है।
यह भी कहा गया कि राजस्थान मदरसा बोर्ड अधिनियम, 2020 में मदरसों में दी जा रही शिक्षा को उचित तरीके से नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त प्रावधान या प्रभावी व्यवस्था नहीं है।
याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार को मदरसों के उचित प्रबंधन के लिए एक ढांचा तैयार करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की कि वहां शिक्षा योग्य शिक्षकों के माध्यम से दी जाए।
रजिस्ट्रेशन की समीक्षा और कॉमन परीक्षा का सुझाव
कोर्ट के सामने रखे गए सुझावों में उन मदरसों की रिपोर्ट तैयार करना शामिल है, जहां सेकेंडरी और सीनियर सेकेंडरी स्तर की शिक्षा दी जा रही है। साथ ही उनके रजिस्ट्रेशन और संबद्धता की समीक्षा करने का भी सुझाव दिया गया।
याचिकाकर्ता ने ऐसे संस्थानों को दी जा रही वित्तीय सहायता पर भी दोबारा विचार करने की मांग की, जो सेकेंडरी स्कूल के रूप में काम कर रहे हैं, लेकिन मदरसा बोर्ड के साथ पंजीकृत हैं।
इसके अलावा प्राइमरी और अपर प्राइमरी मदरसों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने तथा जिला स्तर के शिक्षा अधिकारियों की निगरानी में कॉमन परीक्षा कराने का भी सुझाव दिया गया।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के अनुरूप स्कूली शिक्षा मिलनी चाहिए।
राज्य अधिकारियों से यह भी मांग की गई कि वे पंजीकृत और गैर-पंजीकृत मदरसों की निर्धारित शैक्षणिक मानकों के आधार पर जांच करें और जो संस्थान इन मानकों को पूरा नहीं करते, उनके खिलाफ उचित कार्रवाई करें।
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह मदरसों के प्रबंधन और नियमन को बेहतर बनाने के लिए उठाए जा सकने वाले कदमों का विस्तृत ब्यौरा कोर्ट के सामने रखे। इसमें याचिकाकर्ता की ओर से दिए गए सुझावों पर विचार भी शामिल हो सकता है।
मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी।

