पुनर्विवाह करने वाली तलाकशुदा महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत ‘पत्नी’ की परिभाषा में नहीं आती, पूर्व पति से भरण-पोषण पाने की हकदार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जस्टिस प्रवीन कुमार गिरी की एकलपीठ के समक्ष सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई तलाकशुदा महिला पुनर्विवाह कर लेती है, तो वह दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125(1) के स्पष्टीकरण (ख) अथवा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 144(1) के स्पष्टीकरण के तहत “पत्नी” की परिभाषा के दायरे से बाहर हो जाती है। इसके साथ ही वह अपने पूर्व पति से भरण-पोषण (मेंटेनेंस) का दावा करने या उसे प्राप्त करना जारी रखने का अधिकार खो देती है। इस कानूनी सिद्धांत को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को आंशिक रूप से स्वीकार कर रद्द कर दिया, जिसमें पूर्व पति को पुनर्विवाहित महिला को मासिक भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, अदालत ने नाबालिग बेटे को मिलने वाले भरण-पोषण के आदेश में कोई बदलाव नहीं किया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला झांसी के फैमिली कोर्ट (अपर प्रधान न्यायाधीश, कुटुंब न्यायालय) में सीआरपीसी की धारा 125 के तहत दायर भरण-पोषण याचिका (मामला संख्या 621/2021) से शुरू हुआ था। यह याचिका पत्नी ने अपने और अपने नाबालिग बेटे के लिए पति के खिलाफ दायर की थी।

दोनों पक्षों के बीच विवाह को 30 जुलाई 2025 को फैमिली कोर्ट, झांसी द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की डिग्री पारित कर भंग कर दिया गया था। तलाक के इस फैसले के खिलाफ पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रथम अपील दायर की। उस अपील की कार्यवाही के दौरान पत्नी ने एक हलफनामा और नोटरी शपथपत्र दाखिल कर यह बात स्वीकार की कि उसने 3 सितंबर 2025 को दूसरा विवाह कर लिया है।

इसके बाद, पति ने 30 अक्टूबर 2025 को फैमिली कोर्ट में धारा 125 की कार्यवाही के तहत एक आपत्ति दर्ज कराई। उसने अदालत को पत्नी के 3 सितंबर 2025 को हुए पुनर्विवाह की जानकारी दी और तर्क दिया कि धारा 125(1) के स्पष्टीकरण (ख) के तहत पुनर्विवाहित महिला भरण-पोषण की हकदार नहीं है।

इस आपत्ति के बावजूद, फैमिली कोर्ट ने 10 मार्च 2026 को आदेश पारित करते हुए पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी को आवेदन की तिथि (29 जुलाई 2021) से 10,000 रुपये प्रति माह और नाबालिग बेटे को 5,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण दे। इस फैसले से व्यथित होकर पति ने हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर की।

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पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता पति की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने तर्क दिया कि 3 सितंबर 2025 को दूसरा विवाह कर लेने के बाद विपक्षी महिला पत्नी के रूप में भरण-पोषण पाने का अधिकार खो चुकी है। पति ने नाबालिग बेटे को 5,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण देने पर कोई आपत्ति नहीं जताई और उस हिस्से का पालन करने की सहमति व्यक्त की।

दूसरी ओर, हाईकोर्ट के समक्ष महिला के पिता ने 16 अगस्त 2026 को एक जवाबी हलफनामा दायर किया। हलफनामे के पैराग्राफ 13 में कहा गया कि भरण-पोषण का दावा केवल धारा 125 के तहत आवेदन दायर करने की तिथि से लेकर महिला के पुनर्विवाह की तिथि तक के लिए किया गया है, जिसकी कुल राशि 7,38,500 रुपये बनती है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष ऐसा कोई सीमित दावा करने वाला आवेदन दायर नहीं किया गया था, और वहां महिला खुद को याचिकाकर्ता की पत्नी के रूप में दर्शाते हुए ही भरण-पोषण का दावा करती रही। इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट में महिला के अधिवक्ता पुनर्विवाह की सटीक तिथि को स्पष्ट या साबित करने में असमर्थ रहे।

फैमिली कोर्ट का स्पष्टीकरण

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के पीठासीन अधिकारी से यह स्पष्टीकरण मांगा था कि पुनर्विवाह की आपत्ति के बावजूद भरण-पोषण का आदेश क्यों पारित किया गया। 15 जुलाई 2026 के अपने जवाब में फैमिली कोर्ट के जज ने कहा कि महिला ने अपनी याचिका या साक्ष्यों में पुनर्विवाह का उल्लेख नहीं किया था, और पति ने पुनर्विवाह साबित करने के लिए कोई औपचारिक साक्ष्य या गवाह पेश नहीं किए थे, जिसके कारण अदालत ने पुनर्विवाह को साबित नहीं माना।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

अदालत के समक्ष उपलब्ध अभिलेखों का मूल्यांकन करते हुए हाईकोर्ट ने नोट किया कि संबंधित अदालती कार्यवाहियों में महिला द्वारा स्वयं दाखिल किए गए हलफनामों से उसके पुनर्विवाह की बात निर्विवाद रूप से साबित होती है। भरण-पोषण के कानूनी प्रावधानों के मूल वैधानिक उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“दंड प्रक्रिया संहिता / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों के तहत भरण-पोषण एक ऐसा दायित्व है जिसका उद्देश्य आवारागर्दी और बेसहारापन को रोकना है, और यह कोई ऋण या कर्ज नहीं है।”

“इसलिए, दूसरे व्यक्ति के साथ विपक्षी संख्या 2 के पुनर्विवाह को देखते हुए, वह पुनरीक्षणकर्ता (पति) से भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार नहीं है।”

प्रासंगिक कानूनी प्रावधानों के तहत पात्रता का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

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“यह सुस्थापित है कि सीआरपीसी की धारा 125(1) के स्पष्टीकरण (ख) / बीएनएसएस की धारा 144(1) के स्पष्टीकरण के तहत, एक पत्नी अपने पति से भरण-पोषण का दावा करने की हकदार है, जो उसमें निर्धारित शर्तों की पूर्ति के अधीन है। हालांकि, अपने पुनर्विवाह के बाद, वह अपने पूर्व पति से भरण-पोषण का दावा करने के उद्देश्य से ‘पत्नी’ अभिव्यक्ति के दायरे से बाहर हो जाती है।”

“परिणामस्वरूप, अपने पुनर्विवाह के बाद, वह पुनरीक्षणकर्ता (पति) से भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती और न ही प्राप्त करना जारी रख सकती है।”

“इसलिए, विपक्षी संख्या 2 (पुनर्विवाहित पत्नी) को भरण-पोषण देने वाला आक्षेपित आदेश दिनांक 10.03.2026 सीआरपीसी की धारा 125(1) स्पष्टीकरण (ख) / बीएनएसएस की धारा 144(1) स्पष्टीकरण के तहत कायम नहीं रखा जा सकता और इसे तदनुसार रद्द किया जाता है।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट, झांसी के 10 मार्च 2026 के आदेश को संशोधित करते हुए निर्णय दिया कि याचिकाकर्ता पति अपनी पुनर्विवाहित पूर्व पत्नी को कोई भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग बेटे को 5,000 रुपये प्रति माह भुगतान करने का निर्देश यथावत रहेगा। इस प्रकार क्रिमिनल रिवीजन याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: राजेश चतुर्वेदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 3561/2026
पीठ: जस्टिस प्रवीन कुमार गिरी
निर्णय की तिथि: 18 अगस्त 2026

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