सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई अधिवक्ता अपने क्लाइंट की गोपनीय जानकारियों या विशेषाधिकार प्राप्त संवाद को मीडिया में उजागर नहीं कर सकता, भले ही वह क्लाइंट बाद में उसका विरोधी ही क्यों न बन गया हो। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की तीन जजों की पीठ ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासन समिति के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एक अधिवक्ता को दो साल के लिए वकालत से निलंबित किया गया था और जुर्माना लगाया गया था। इसके साथ ही अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के लिए वकील और उनकी पूर्व क्लाइंट दोनों पर 5-5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया और दोनों की अपीलों को खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
वर्ष 2013 और 2014 के दौरान शिकायतकर्ता महिला ने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पर यौन उत्पीड़न के प्रयास का आरोप लगाते हुए संबंधित अधिवक्ता की कानूनी सेवाएं ली थीं। 15 जुलाई 2014 को अधिवक्ता के कार्यालय से पुलिस अधिकारी को एक कानूनी नोटिस भेजा गया। इसके बाद 24 जुलाई 2014 को महिला ने पुलिस अधिकारी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2), 376C, 354 और 354D के तहत एफआईआर दर्ज कराई, जिसमें उसने अधिवक्ता पर भी पुलिस अधिकारी के प्रभाव में काम करने का आरोप लगाया।
एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने अधिवक्ता का बयान दर्ज किया। 5 अगस्त 2014 को टीवी चैनलों ‘आज तक’ और ‘ज़ी न्यूज़’ पर अधिवक्ता के साक्षात्कार प्रसारित किए गए। इन प्रसारणों में वकील और महिला के बीच हुई बातचीत के रिकॉर्डेड ऑडियो और मैसेजिंग चैट को भी दिखाया गया। इसके बाद महिला ने बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा के समक्ष अधिवक्ता के खिलाफ अनुशासनहीनता और पेशेवर दुराचार की शिकायत दर्ज कराई, जिसे बाद में बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासन समिति को स्थानांतरित कर दिया गया।
11 अगस्त 2025 को बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासन समिति ने बिना सहमति कानूनी नोटिस भेजने, गोपनीय जानकारी सार्वजनिक करके महिला की पहचान उजागर करने और अपमानजनक जन-टिप्पणियां करने के लिए अधिवक्ता को पेशेवर दुराचार का दोषी पाया। समिति ने अधिवक्ता का लाइसेंस 2 साल के लिए निलंबित कर दिया, पीड़ित महिला को 3,00,000 रुपये का जुर्माना देने और 2,00,000 रुपये बार काउंसिल ऑफ इंडिया वेलफेयर फंड में जमा करने का निर्देश दिया। इस फैसले को दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी—महिला ने वकील को हमेशा के लिए डिबार करने और 2 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की, जबकि अधिवक्ता ने निलंबन रद्द करने की अपील की।
पक्षों की दलीलें
अदालत में खुद उपस्थित होकर महिला ने तर्क दिया कि अधिवक्ता ने विरोधी पक्ष के साथ सांठगांठ की और उसकी निजी व गोपनीय जानकारियों को मीडिया में जारी करके विश्वास के रिश्ते को तोड़ा है। उसने कहा कि वकील ने टीवी पर उसकी शिकायत को झूठा बलात्कार का मामला बताया और उस पर सनसनी फैलाने का आरोप लगाया, जिससे उसकी गरिमा, निजता और सामाजिक प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंची।
अधिवक्ता के वकील ने तर्क दिया कि कानूनी नोटिस महिला के निर्देशों और उसके द्वारा दिए गए ड्राफ्ट के आधार पर भेजा गया था, तथा उसने महिला को पहले ही सलाह दी थी कि मामले में कोई यौन अपराध नहीं बनता है। वकील का कहना था कि एफआईआर में नाम आने, मीडिया द्वारा परेशान किए जाने और दफ्तर की तलाशी के बाद उसने केवल सार्वजनिक आरोपों से अपना बचाव करने के लिए मीडिया में साक्षात्कार दिया था, क्योंकि उस समय वह महिला का वकील नहीं रह गया था। उसने यह भी दावा किया कि अंतिम सुनवाई का नोटिस न मिलने के कारण अनुशासन समिति का आदेश प्रक्रियात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण था।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के वकील ने अनुशासन समिति के आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि निष्कर्ष पूरी तरह से तथ्यों पर आधारित थे और दी गई सजा स्थिति के अनुकूल थी।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
निर्णय की शुरुआत करते हुए अदालत ने टिप्पणी की:
“कभी-कभी यह कहा जाता है कि मुकदमे में पक्षकार सच्चाई पहले से ही जानते हैं, और वास्तव में जज की परीक्षा हो रही होती है। यह एक गंभीर टिप्पणी है, और वर्तमान मामला दिखाता है कि ऐसा क्यों है। हमारे सामने दो ऐसे मुकदमेबाज हैं, जिनमें से प्रत्येक इस अदालत से पूर्ण न्याय की उम्मीद में आया है, लेकिन उनमें से कोई भी अदालत के प्रति ईमानदार नहीं रहा है। हर महत्वपूर्ण तथ्य को एक ऐसे रिकॉर्ड से खींचकर निकालना पड़ा है जिसमें छिपाव, बढ़ा-चढ़ाकर कहना और बाद की सोच दोनों पक्षों में आम बात है। न्याय की व्यवस्था पक्षकारों को अपने व्यक्तिगत हिसाब चुकता करने, अपनी ही बिगाड़ी हुई साख को बचाने या अपने ही बनाए विवाद से फायदा उठाने का साधन नहीं है। हम शुरुआत में ही कहते हैं, और आगे इसका कारण भी देंगे, कि न तो याचिकाकर्ता और न ही रेस्पोंडेंट इस अदालत से सम्मान के साथ बाहर जाते हैं।”
पीठ ने वकील की इस दलील को खारिज कर दिया कि उसे सुनवाई का मौका नहीं मिला, क्योंकि उसने पूरी कार्यवाही में भाग लिया था, लिखित जवाब दाखिल किए थे और अपने वकील के जरिए साक्ष्य पेश किए थे। गोपनीयता के उल्लंघन पर अदालत ने वकील के स्पष्टीकरण को खारिज करते हुए कहा:
“दी गई दलील यह है कि महिला ने 24 जुलाई 2014 की एफआईआर में वकील को नामजद किया था, वह अब उसका वकील नहीं रह गया था, मीडिया उसका पीछा कर रही थी, और उसने केवल अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देने के लिए बात की थी। यह दलील पर्याप्त नहीं है। एक अधिवक्ता का कर्तव्य अपने क्लाइंट के उसके प्रति निरंतर अच्छे व्यवहार पर निर्भर नहीं होता। एक अधिवक्ता अपने क्लाइंट से गोपनीयता में प्राप्त जानकारी का उपयोग उसके खिलाफ नहीं कर सकता, और इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह बाद में उसकी विरोधी बन गई है।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“जो अधिवक्ता यह मानता है कि उस पर झूठे आरोप लगाए गए हैं, उसके पास उपायों की कमी नहीं है। वह जांच एजेंसी के समक्ष अपना पक्ष रख सकता है, जैसा कि वकील ने 4 अगस्त 2014 को किया भी था, या वह मानहानि का मुकदमा कर सकता है। लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकता कि टीवी चैनल पर जाकर गोपनीय संवाद सार्वजनिक कर दे, अपनी पूर्व क्लाइंट के साथ रिकॉर्ड की गई बातचीत चलाए, और उसकी शिकायत को झूठा मामला बताते हुए उस पर पब्लिसिटी पाने का आरोप लगाए।”
सजा बढ़ाने की महिला की मांग पर कोर्ट ने कहा कि वह साफ हाथों से अदालत नहीं आई है। रिकॉर्ड से पता चलता है कि उसने अधिकारी को फंसाने के तरीकों पर वकील से चर्चा की थी, 28 जुलाई 2014 को स्वयं मीडिया के सामने आकर बयान दिया था और 4 दिसंबर 2015 को ट्रायल कोर्ट द्वारा पुलिस अधिकारी को बरी किए जाने के आदेश को कभी चुनौती नहीं दी।
दोनों पक्षों के रवैये पर नाराजगी जताते हुए पीठ ने कहा:
“आपस में मिलकर इन दोनों पक्षकारों ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का 11 साल का समय बर्बाद किया है। वह समय अन्य जरूरतमंद मुकदमों का था जो न्याय का इंतजार कर रहे थे। हम दोनों के आचरण पर अपनी सख्त नाखुशी दर्ज करते हैं।”
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासन समिति के 11 अगस्त 2025 के आदेश को सही ठहराते हुए सभी अपीलों को खारिज कर दिया। इसके अलावा, अदालत ने दोनों पक्षकारों को चार सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी में 5-5 लाख रुपये का जुर्माना जमा करने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: रेहाना खान बनाम रिजवान सिद्दीकी (और संबंधित मामले)
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 12256/2025 (स्थानांतरित मामला (सिविल) संख्या 30/2026 और सिविल अपील संख्या 7959/2026 के साथ)
पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता, जस्टिस विजय बिश्नोई
निर्णय की तिथि: 21 अगस्त 2026

