अदालत परिसर से बेटी का अपहरण: कर्नाटक हाईकोर्ट ने पिता पर लगाया 5 लाख रुपये का जुर्माना, 25 अगस्त तक बच्ची को पेश करने का निर्देश

बेंगलुरु की पारिवारिक अदालत परिसर से अपनी नाबालिग बेटी को जबरन ले जाने वाले एक व्यक्ति पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए 5 लाख रुपये का भारी जुर्माना लगाया है। हाईकोर्ट ने पिता को निर्देश दिया है कि वह 25 अगस्त तक बच्ची को हर हाल में बेंगलुरु की फैमिली कोर्ट के समक्ष पेश करे।

जस्टिस डॉ. चिल्लाकुर सुमलता की पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक पिता जुर्माना जमा करने का सबूत पेश नहीं करता, तब तक उसे अपनी बेटी की कस्टडी से जुड़े मुकदमे की कानूनी कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अदालत के निर्देश के अनुसार, जुर्माने की 5 लाख रुपये की राशि में से 1 लाख रुपये आर्मी वेलफेयर फंड में जमा कराए जाएंगे, जबकि शेष 4 लाख रुपये नाबालिग बेटी के नाम से बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के रूप में जमा किए जाएंगे।

पारिवारिक अदालत के बाहर से गाड़ी में ले गया था पिता

यह घटना 18 जुलाई की है, जब पुणे में कार्यरत महिला अपनी बेटी के साथ वर्ष 2015 से लंबित तलाक के मुकदमे की सुनवाई में शामिल होने बेंगलुरु फैमिली कोर्ट आई थी। अदालती प्रक्रिया पूरी होने के बाद, पति ने परिसर के बाहर से बच्ची को जबरन अपनी कार में बैठाया और अपनी बहन के घर ले गया। पुलिस के हस्तक्षेप और निर्देशों के बाद भी उसने बच्ची को मां को सौंपने से इनकार कर दिया।

इसके बाद महिला ने अपनी बेटी को वापस पाने और कस्टडी बहाल कराने के लिए फैमिली कोर्ट में अर्जी दी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। फैमिली कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

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अनुच्छेद 21 के तहत बच्चों को भी सम्मान से जीने का अधिकार

पिता के आचरण पर कड़ी आपत्ति व्यक्त करते हुए जस्टिस सुमलता ने कहा कि वयस्कों की भांति बच्चों के भी समान मानवाधिकार होते हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि पिता ने बच्ची को इस प्रकार अचानक छीन लिया मानो वह कोई बेजान वस्तु या सामान हो।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि गरिमा के साथ जीवन व्यतीत करना, सुरक्षित वातावरण में रहना, अपनी इच्छा अनुसार शिक्षा पाना तथा सभी प्रकार के शोषण से संरक्षित रहना बच्चे का मौलिक अधिकार है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीवन के अधिकार का ही एक अभिन्न अंग है। पीठ ने कहा कि बच्चे समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग हैं, इसलिए उनके साथ सहानुभूति, संवेदनशीलता और करुणा का व्यवहार किया जाना चाहिए। कस्टडी से जुड़ा कोई भी कदम कानून के नियमों के तहत और उचित परामर्श के साथ ही उठाया जाना चाहिए।

पुणे शिफ्ट होने के बाद बदला गया था मुलाकात का नियम

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यह कानूनी विवाद 2015 में महिला द्वारा तलाक की याचिका दाखिल करने के बाद शुरू हुआ था, जिसके जवाब में पति ने बेटी की स्थायी कस्टडी की मांग की थी। 17 अप्रैल को फैमिली कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश में पिता को एक दिन छोड़कर फोन पर बातचीत करने, हर महीने के चौथे रविवार को दिन में मिलने और दूसरे शुक्रवार की शाम से रविवार शाम तक बच्ची को अपने पास रखने की अनुमति दी थी। उस समय दोनों पक्ष बेंगलुरु में रह रहे थे।

हालांकि, जून 2021 से बच्ची लगातार अपनी मां के साथ रह रही थी और बाद में महिला रोजगार के सिलसिले में पुणे स्थानांतरित हो गई, जहां उसने बच्ची का दाखिला स्थानीय स्कूल में कराया। मां ने इस अंतरिम व्यवस्था को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ ने दोनों शहरों के बीच 838 किलोमीटर की दूरी और लगभग डेढ़ घंटे की हवाई यात्रा को ध्यान में रखते हुए मुलाकात के नियमों में बदलाव किया था। हाईकोर्ट ने पिता को महीने में एक बार सप्ताहांत (वीकेंड) पर दो दिनों के लिए बच्ची की कस्टडी दी थी, जिसके तहत वह महीने के दूसरे शुक्रवार को स्कूल खत्म होने के बाद बच्ची को ले जा सकता था और रविवार रात 8 से 9 बजे के बीच उसे पुणे में मां के पास वापस छोड़ना होता था।

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