गौहाटी हाईकोर्ट ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के एक कांस्टेबल को कलर ब्लाइंडनेस के कारण सेवा से हटाए जाने के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि भर्ती के समय दिया गया सहमति पत्र (अंडरटेकिंग) बाध्यकारी है और बल में ऐसा कोई पद मौजूद नहीं है जिसे सैन्य या कॉम्बैट जिम्मेदारियों से पूरी तरह अलग माना जा सके। जस्टिस कौशिक गोस्वामी ने मई 2017 के बर्खास्तगी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए कहा कि सेवा नियमों के विपरीत जाकर याचिकाकर्ता के लिए कोई नया पद बनाने या ढूंढने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
नीतिगत नियम और अंडरटेकिंग का हवाला
कोर्ट ने 12 अगस्त को जारी अपने आदेश में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रशिक्षण पूरा कर लेना और कुछ समय तक सेवा देना, नीति के विपरीत बल में बने रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं देता। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि गृह मंत्रालय की 2013 की नीति में यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि गलती से किसी ऐसे व्यक्ति की भर्ती हो जाती है जिसमें बाद में कलर ब्लाइंडनेस का पता चलता है, तो उसे बीमारी सामने आते ही तुरंत सेवा से मुक्त कर दिया जाएगा।
नवंबर 2014 में गुवाहाटी स्थित CRPF की 11वीं बटालियन में सामान्य ड्यूटी (GD) कांस्टेबल के रूप में शामिल हुए इस जवान ने महाराष्ट्र में एक साल का कड़ा प्रशिक्षण पूरा किया था। इसके बाद उसकी पहली तैनाती झारखंड में हुई। साल 2016 में नियमित मेडिकल जांच के दौरान उसमें कलर ब्लाइंडनेस की पुष्टि हुई। इसके बाद अप्रैल 2017 में उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और मई 2017 में उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
वैकल्पिक पद की मांग और सरकारी पक्ष
याचिकाकर्ता के वकील एस. के. मेधी ने तर्क दिया था कि उनके मुवक्किल ने लगभग दो साल तक निष्ठापूर्वक सेवा दी थी, इसलिए उसे नौकरी से निकालने के बजाय किसी ऐसे वैकल्पिक पद पर समायोजित किया जाना चाहिए था जहां आंखों की यह समस्या काम में बाधा न बने।
इसके जवाब में केंद्र सरकार के वकील के. के. पराशर ने स्पष्ट किया कि गृह मंत्रालय के 2013 के दिशा-निर्देशों के अनुसार केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) और असम राइफल्स में कलर ब्लाइंडनेस भर्ती और सेवा में बने रहने दोनों के लिए पूर्ण अयोग्यता है। उन्होंने कहा कि जवान ने सेवा में शामिल होते समय खुद अंडरटेकिंग दी थी कि यदि करियर के किसी भी पड़ाव पर वह कलर ब्लाइंड पाया जाता है, तो वह सेवामुक्ति के नियम को स्वीकार करेगा।
सभी पदों के लिए कॉम्बैट ट्रेनिंग अनिवार्य
हाईकोर्ट ने सरकार के इस रुख को स्वीकार किया कि CRPF एक सशस्त्र बल है, जहां सभी पदों पर तैनात कर्मियों को हथियार चलाने और आपात स्थिति में कॉम्बैट भूमिका निभाने की आवश्यकता होती है। सरकारी वकील ने कोर्ट को अवगत कराया कि संगठन में कोई भी पद गैर-कॉम्बैट श्रेणी का नहीं है, क्योंकि साधारण और प्रशासनिक कार्यों में लगे कर्मचारियों को भी अनिवार्य रूप से हथियारों का प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें मोर्चे पर तैनात किया जा सके।
जस्टिस गोस्वामी ने कहा कि नियुक्ति और बीमारी का पता चलने के बीच बीते समय से नीतिगत नियम शिथिल नहीं होते। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि याचिका में 2013 की नीति की वैधता को चुनौती नहीं दी गई थी, और जवान द्वारा दी गई अंडरटेकिंग पूरी तरह स्पष्ट और पारदर्शी थी।

