केरल हाईकोर्ट ने 22 वर्षीय एक युवक का बैंक खाता अनफ्रीज करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने पाया कि महज 15 दिनों के भीतर खाते के जरिए 50 लाख रुपये से अधिक की रकम का संदिग्ध लेन-देन किया गया और इस खाते का इस्तेमाल ‘मनी म्यूल’ के रूप में हुआ। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने पुलिस को संबंधित खाताधारक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 111 के तहत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया है।
वकीलों की भूमिका पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
17 अगस्त के अपने आदेश में जस्टिस एम ए अब्दुल हकीम ने याचिकाकर्ता के वकीलों के आचरण पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। कोर्ट ने कहा कि वकील अदालत के अधिकारी होते हैं और उन्हें अपने मुवक्किलों को न्यायिक प्रणाली को दूषित करने की अनुमति बिल्कुल नहीं देनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब वकीलों को उपलब्ध दस्तावेजों से भली-भांति जानकारी हो कि उनका मुवक्किल झूठे दावे कर रहा है, तब भी अदालत के समक्ष झूठे हलफनामे प्रस्तुत कराना अत्यंत आपत्तिजनक है।
निष्क्रिय खाते में अचानक शुरू हुआ भारी लेन-देन
मामले के विवरण के अनुसार, याचिकाकर्ता ने जनवरी 2023 में फेडरल बैंक में अपना खाता खुलवाया था, जो शुरुआत में महीनों तक लगभग निष्क्रिय रहा। हालांकि, 15 मई 2023 से खाते में अचानक भारी उछाल दर्ज किया गया और महज दो सप्ताह के भीतर 50 लाख रुपये से अधिक का लेन-देन हुआ।
बैंक ने अदालत को बताया कि खाते में आई पूरी रकम को तुरंत निकाल लिया गया, जिससे 5 जून 2023 तक खाते में केवल 1 रुपया ही बचा था। लेन-देन के इस असामान्य पैटर्न और विभिन्न आपराधिक जांचों के सिलसिले में कानून प्रवर्तन एजेंसियों से कुल 21 लाख रुपये के लिए पांच फ्रीज व डेबिट-फ्रीज नोटिस मिलने के बाद बैंक ने खाते को संदिग्ध करार दिया।
व्यापार और वेतन का दावा साबित हुआ असत्य
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष तर्क दिया था कि वह दो व्यावसायिक फर्मों—रिपी फूड्स (ड्राई फ्रूट्स का थोक व्यापार) और निपोल्टा मीडिया (एलईडी वॉल व मीडिया व्यवसाय)—में वर्किंग पार्टनर है। उसने दावा किया कि उसे इन व्यवसायों से क्रमशः 35,000 रुपये और 40,000 रुपये मासिक वेतन तथा लाभ का हिस्सा मिलता है। उसने यह भी कहा कि गल्फ में कार्यरत उसके पिता भी कभी-कभी खाते में पैसे भेजते हैं और व्यावसायिक ग्राहक नियमित भुगतान करते हैं।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकीलों ने अनुरोध किया था कि 21 लाख रुपये की राशि पर लीन बरकरार रखते हुए बैंक को खाता संचालित करने की अनुमति देने का आदेश दिया जाए। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता इतनी बड़ी रकम के अचानक आगमन का कोई वैध स्पष्टीकरण नहीं दे सका। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज यह साबित करते हैं कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत दावे पूरी तरह असत्य हैं।

