केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने ग्रीन कॉफी अर्क के उत्पादों को लेकर वजन घटाने, ब्लड शुगर नियंत्रण और बॉडी डिटॉक्स के भ्रामक दावे करने पर एक वेलनेस कंपनी पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। इसके साथ ही नियामक ने कंपनी को निर्देश दिया है कि वह प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सभी माध्यमों से इन भ्रामक विज्ञापनों को तत्काल प्रभाव से हटाए।
मुख्य आयुक्त निधि खरे और आयुक्त अनुपम मिश्रा की पीठ ने 5 अक्टूबर को यह आदेश पारित किया। यह कार्रवाई एक उपभोक्ता संगठन की शिकायत पर हुई है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कंपनी बिना किसी ठोस वैज्ञानिक प्रमाण के कैप्सूल और पाउडर के रूप में ग्रीन कॉफी उत्पादों को वजन घटाने वाले सप्लीमेंट के तौर पर बेच रही है। शिकायत में यह भी कहा गया था कि बाजार में ऐसे विज्ञापनों की बाढ़ आ गई है, जबकि अब तक के वैज्ञानिक अध्ययनों में ग्रीन कॉफी और वजन घटाने के बीच कोई निर्णायक संबंध साबित नहीं हुआ है।
नियामक ने अपने आदेश में कहा कि कंपनी ने ‘इंसुलिन सुधार, ब्लड शुगर प्रबंधन और डिटॉक्सिफिकेशन’ जैसे विज्ञापनों के जरिए उत्पाद के वास्तविक गुणों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और उसके प्रभावों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया। उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण के अनुसार, यह भ्रामक रणनीति तंदुरुस्ती के नाम पर उपभोक्ताओं की कमजोरियों का फायदा उठाने और उन्हें गुमराह करने के मकसद से अपनाई गई थी।
आयुष मंत्रालय ने खारिज किए दावे, जांच में वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिले
मामले की सुनवाई के दौरान सीसीपीए ने केंद्रीय आयुष मंत्रालय से भी राय ली। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम के तहत सूचीबद्ध आयुर्वेद, सिद्ध या यूनानी चिकित्सा पद्धति के किसी भी अधिकृत ग्रंथ में ग्रीन कॉफी अर्क का कोई उल्लेख नहीं है।
जांच में यह भी सामने आया कि कंपनी कॉफी के वास्तविक गुणों का उल्लेख किए बिना केवल ‘ग्रीन’ शब्द की आड़ में वजन घटाने का प्रचार कर रही थी। हालांकि, कंपनी ने कारण बताओ नोटिस के जवाब में कहा था कि कई शोध संस्थानों के अध्ययन ग्रीन कॉफी से वजन घटने, ब्लड शुगर नियंत्रण और मेटाबॉलिज्म में सुधार की पुष्टि करते हैं। कंपनी ने यह दलील भी दी कि उसके पास विज्ञापनों के उच्च नैतिक मानकों को सुनिश्चित करने के लिए एक आंतरिक आचार एवं अनुपालन समिति मौजूद है।
विस्तृत जांच रिपोर्ट में कंपनी के ये दावे खोखले पाए गए। रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी अपने दावों के समर्थन में कोई स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन या क्लीनिकल ट्रायल का डाटा प्रस्तुत नहीं कर सकी। कंपनी द्वारा जमा किए गए शोध पत्र सीधे तौर पर उत्पाद से मेल नहीं खाते थे, क्योंकि उन अध्ययनों में खुद यह माना गया था कि सीमित डाटा और छोटे सैंपल साइज के कारण ग्रीन कॉफी अर्क के असर को निर्णायक रूप से साबित नहीं किया जा सकता।
2025 में उत्पादन रोकने के बाद भी ऑनलाइन सक्रिय थी बिक्री
कंपनी की ओर से पेश अधिवक्ता प्रत्यूष कुमार यादव ने पीठ के समक्ष दलील दी कि उत्पाद को भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) से निर्माण और बिक्री का वैध लाइसेंस मिला हुआ है और इसमें इस्तेमाल सामग्री न्यूट्रास्युटिकल नियमों के दायरे में आती है। अधिवक्ता ने बताया कि यह उत्पाद टैबलेट के रूप में पोषण और स्वास्थ्य लाभ देने वाला सप्लीमेंट है, जिसकी रोजाना एक गोली लेने की सलाह दी जाती है। उन्होंने कहा कि कंपनी ने साल 2025 में ही इसका निर्माण बंद कर दिया था और ई-कॉमर्स वेबसाइटों से इसे हटाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी।
नियामक को सौंपे गए बिक्री के ब्योरे के अनुसार, कंपनी ने अब तक इस उत्पाद की 3,318 यूनिट बेचीं, जिससे उसे 6.54 लाख रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ।
उपभोक्ता प्राधिकरण ने कंपनी के तर्कों को खारिज करते हुए रेखांकित किया कि साल 2025 में निर्माण बंद करने के बावजूद कंपनी ई-कॉमर्स मंचों पर एक्टिव डिजिटल लिस्टिंग बनाए रखकर मुनाफा कमाने में लगी रही। नियामक ने पाया कि ग्राहकों की दिलचस्पी बनाए रखने के लिए ‘नोटिफाई मी’ जैसे इंटरफेस का इस्तेमाल किया गया, जो उपभोक्ताओं को गुमराह करने और अनुचित व्यापार व्यवहार का हिस्सा है।

